महिलाएं और आधुनिकता, क्या समय बदल रहा है

10/13/2021 3:14:21 AM

पिछले सप्ताह भारत में एक प्रिय विषय सुर्खियों में रहा और वह विषय है भारतीय महिलाएं। यह ऐसा विषय है जिसके बारे में नेतागण समझते हैं कि उन्होंने इसमें पी.एच.डी. की डिग्री ले रखी है। इस संबंध में कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री का हालिया बयान उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा, ‘‘भारत में अनेक आधुनिक महिलाएं अकेली रहना चाहती हैं। यदि वे विवाह भी करती हैं तो बच्चे पैदा करना नहीं चाहतीं। वे सरोगेसी चाहती हैं। यह अच्छी बात नहीं है।’’

प्रश्न उठता है कि क्या महिलाओं की सोच में बदलाव आ रहा है? क्या ऐसे बयान देकर सारी महिलाओं को एक जैसा माना जा सकता है? बिल्कुल नहीं। इसके विपरीत क्या महिलाओं की मुख्य भूमिका प्रजनन करना और मां बनना है? संविधान द्वारा महिलाओं को समानता, राज्य द्वारा भेदभाव न करने, अवसरों की समानता, समान कार्य के लिए समान वेतन की गारंटी देने के बावजूद कितनी महिलाओं के पास यह विकल्प है? 

नि:संदेह कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री ने जो कहा है वह आधुनिक शिक्षित कामकाजी महिलाओं के बारे में आंशिक रूप से सच है। ये महिलाएं आॢथक और सामाजिक रूप से अपने लिए समान अवसरों की मांग करती हैं। वे एक विशिष्ट सोच से नहीं बंधी कि महिलाओं से यह अपेक्षा नहीं है। यदि वे अपने पुरुष सहयोगियों के समान बराबर जिम्मेदारियां उठा रही हैं तो फिर पुरुष को घर की जिम्मेदारियां क्यों नहीं उठानी चाहिएं? इस बदलती वैश्विक स्थिति में वे अब अपने को मूक दर्शक नहीं समझतीं अपितु वे चाहती हैं कि उनके कार्यों में भी सहयोग किया जाए और वे परंपराओं, संकीर्ण सामाजिक सोच और नैतिकता के दोहरे मानदंडों से अलग होना चाहती हैं। इस तरह वह अब अपने खोए हुए अधिकार प्राप्त करने के लिए अत्यंत उत्साहित रहती हैं। यहीं पर ‘आधुनिक भारत’ बनाम ‘असली भारत’ में मतभेद देखने को मिलता हैै। 

आधुनिक भारत में महिलाओं को शिक्षा, रोजगार में समान अवसर दिए जाते हैं। वह आजीविका अर्जक है और अपने परिवार के लिए उत्पादक पूंजी जाड़ती है किंतु फिर भी जब सामाजिक स्थिति की बात आती है तो उसके साथ परंपरागत व्यवहार होता है क्योंकि उसके माता-पिता चाहते हैं कि वह शादी कर अपनी घर गृहस्थी बसाए और परिवार बढ़ाए। पति अभी भी अपनी कामकाजी पत्नी पर नियंत्रण रखना चाहता है और मुख्य रूप से महिलाओं की भूमिका घर चलाना, खाना बनाना, साफ-सफाई करना और परिवार बढ़ाना है, जैसे उसकी माता करती आई है। असली भारत में बेचारी और अशिक्षित महिला प्रतिष्ठा का प्रतीक है तथा परिवार की पवित्रता और उसमें सामंजस्य बनाए रखने के लिए उसे पर्दे में रखना आवश्यक है, जो अपने पति की काम पिपासा शांत करने, बच्चे पैदा करने, तथा घरेलू कामकाज करने के लिए बनी है। दु:खद तथ्य यह है कि वह इस स्थिति से हर कदम पर जूझती है। 

हम चरम स्थितियों में रह रहे हैं, जहां पर बालिका के जन्म को खराब खबर माना जाता है और उसे हमेशा भय के साथ पाला जाता है, उस पर अनेक सीमाएं लगाई जाती हैं, जहां पर पिता नियम बनाता है, पति-पुरुष उन्हें लागू करने पर बल देता है। बंद घरों में पुरुष रिश्तेदारों द्वारा बालिकाओं का बलात्कार किया जाता है और उससे कहा जाता है कि वह चुप रहे और इसका कारण यह होता है कि अगर इस बात का पता चले तो लोग क्या कहेंगे और उसके साथ कोई विवाह नहीं करेगा। अनेक महिलाएं, जिन्हें कार्यस्थल पर यौन शोषण का सामना करना पड़ता है, वे और उत्पीडऩ और उसकी आेर अनावश्यक ध्यान खिंचने की वजह से चुप रहती हैं कि लोग उसे चरित्रहीन कहेंगे किंतु उसका नुक्सान हर स्थिति में होता है। 

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक 5 मिनट में महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, प्रत्येक 77 मिनट में दहेज के कारण एक महिला की मौत होती है तथा प्रत्येक 9 मिनट में पति या रिश्तेदारों द्वारा उसके विरुद्ध अत्याचार किए जाते हैं। इसीलिए शायद देश में बालिका भ्रूण हत्या और लिंग की पहचान कर गर्भपात कराने की घटनाएं बढ़ रही हैं। अभिनेत्री खुशबू पर इसलिए मुकद्दमा चलाया गया कि उसने विवाह पूर्व सैक्स के बारे में टिप्पणी की कि किसी भी शिक्षित व्यक्ति को यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि उसकी दुल्हन कुंवारी होगी और जो लोग विवाह पूर्व सैक्स करते हैं उन्हें कंडोम का प्रयोग करना चाहिए। सानिया मिर्जा द्वारा सुरक्षित सैक्स की वकालत करने के लिए उसके पुतले जलाए जाते हैं। शायद इसका कारण हमारी पितृ सत्तात्मक सोच है। 

हमारे मंत्रियों को ही देखें। हाल ही में महाराष्ट्र के मंत्री ने टिप्पणी की कि शराब की बिक्री बढ़ जाएगी यदि शराब के ब्रांडों का नाम बॉबी, जूली आदि रखा जाए। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने फटी जींस पहनने के कारण महिलाओं के विरुद्ध अपराध की बढ़ती घटनाओं को जिम्मेदार बताया। बिहार के एक नेता ने महिलाओं को सलाह दी कि वे अपने साथ कंडोम रखें और बलात्कार को सहें। राजस्थान के एक मंत्री ने टी.वी. और मोबाइल फोन को महिलाओं में चरित्रहीनता बढऩे का दोषी बताया। हरियाणा के एक खाप नेता ने बताया कि चीनी चाउमीन खाने से बलात्कार की घटनाएं बढ़ती हैं। परंपरागत दृष्टिकोण और कठोर रीति-रिवाजों के चलते आज भी महिलाओं के कल्याण के लिए बनाए गए कानून केवल कागजों में बने हुए हैं। या तो उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता है या जागरूकता के अभाव में वे अभी भी महिलाओं की पहुंच से बाहर हैं। दहेज, द्विपत्नी और बहुपत्नी प्रथा आज भी जारी है। कानून का उल्लंघन करते हुए आज भी बाल विवाह होते हैं। 

महिलाओं के विरुद्ध विशेषकर यौन हिंसा गंभीर चिंता का विषय है। महिला साक्षरता 6.6 प्रतिशत है जबकि पुरुष साक्षरता 81.3 प्रतिशत है। स्कूलों में पंजीकरण में बालिकाओं की संख्या कम है और अधिक बालिकाएं बीच में विद्यालय छोड़  देती हैं। तथापि अनेक महिलाएं सरकार में उच्च पदों तक पहुंची हैं और वे बड़े उत्साह से चुनाव में भाग लेती हैं और राजनीति को प्रभावित करती हैं। हमें महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण, परिवार और समाज में उनकी भूमिका आदि के बारे में अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। इसका एक विकल्प यह है कि इस संबंध में महिलावादी विचारों को बढ़ावा दिया जाए ताकि महिलाओं की सुरक्षा सहित उनसे जुड़े मुद्दों पर सामाजिक प्रभाव पड़ सके। केवल महिला स्वतंत्रता की बात करने से काम नहीं चलेगा, उनको केवल पुरुषों के आनंद की वस्तु के रूप में देखने की प्रवृति पर रोक लगानी होगी। क्या महिलाएं अबला बनी रहेंगी? समय आ गया है कि हम आत्मावलोकन करें और कहें कि वास्तव में समय बदल रहा है।-पूनम आई. कौशिश
 


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Content Writer

Pardeep

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