क्या कांग्रेस रोक पाएगी के.सी.आर. की हैट्रिक

punjabkesari.in Saturday, Dec 02, 2023 - 05:00 AM (IST)

अलग -अलग रणनीति के तहत भी कांग्रेस और भाजपा ने ऐसी घेराबंदी की कि जीत की हैट्रिक कर तीसरी बार तेलंगाना का मुख्यमंत्री बनने की के. चंद्रशेखर राव की राह आसान नहीं लगती। उनके 2 सीटों से चुनाव लडऩे को भी इसका संकेत माना जा रहा है। वर्ष 2018 में के.सी.आर. की तेलंगाना राष्ट्र समिति (टी.आर.एस.) ने 119 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी से भी ज्यादा 88 सीटें जीत कर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी, जो वर्ष 2014 में पृथक राज्य बनने के बाद हुए पहले चुनाव से भी 25 ज्यादा थीं। दूसरे स्थान पर कांग्रेस थी, जिसे 19 सीटें मिली थीं। 

टी.आर.एस. और कांग्रेस की सीटों के बीच का फासला बताता है कि तब के.सी.आर. की कैसी लहर रही होगी। टी.आर.एस. को मिले 47 प्रतिशत मत भी के.सी.आर. की लोकप्रियता का संकेत रहे। उस लहर में सबसे ज्यादा नुकसान तेलुगू देशम को हुआ था, जिसकी सीटें वर्ष 2014 के मुकाबले 15 से घट कर 2 रह गईं। भाजपा ने अपनी चार विधानसभा सीटें गंवाई थीं, तो कांग्रेस को भी 2 सीटों का नुकसान हुआ था। अब जबकि के.सी.आर. तीसरी बार जनादेश मांग रहे हैं, राजनीतिक समीकरण बदले नजर आए। कर्नाटक में भाजपा से सत्ता छीन लेने के बाद कांग्रेस को लगता है कि वह तेलंगाना में भी सत्ता में वापसी कर सकती है। कांग्रेसी उम्मीदें उसके 2 विश्वासों पर टिकी हैं एक, भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने लंबा समय तेलंगाना में गुजारा। दो, कर्नाटक में कांग्रेस की जीत का पूरे दक्षिण भारत में मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है। 

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डी.के. शिव कुमार ने तेलंगाना में चुनाव प्रचार भी किया कि कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा दी गई पांचों गारंटियां पूरी कर दी गई  हैं, इसलिए तेलंगाना के मतदाताओं को भी उसकी 6 गारंटियों पर विश्वास करना चाहिए। के.सी.आर. ने कांग्रेस के दावों को झूठा बताते हुए न सिर्फ अपनी जन कल्याणकारी योजनाओं का रिपोर्ट कार्ड पेश किया, बल्कि और अधिक लुभावने वायदे भी किए। परिणाम तो कल 3 दिसंबर को पता चलेगा, पर कांग्रेस की तैयारियों, तेवरों और आक्रामक प्रचार से संदेश यही गया कि वह टी.आर.एस. को बी.आर.एस. (भारत राष्ट्र समिति) बनाने वाले के.सी.आर. को टक्कर दे चुकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चंद्रबाबू नायडू के जेल में बंद होने के कारण चुनाव मैदान में तेलुगू देशम की गैर-मौजूदगी का लाभ किसको मिलेगा। 

माना जा रहा है कि नायडू की गिरफ्तारी की निंदा न करने के चलते तेलुगू देशम समर्थक के.सी.आर. से खफा थे। उधर आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ वाई.एस.आर.सी.पी. की तेलंगाना इकाई के नेताओं ने भी कांग्रेस के प्रति नर्म रुख दिखाया। ऐसे छोटे दलों के समर्थन से भी कांग्रेस के हौसले बढ़े। कांग्रेस ने चुनाव जिताऊ कसौटी के चलते अन्य दलों से आए नेताओं को टिकट देने में भी संकोच नहीं किया था। वैसे दल बदलुओं पर मेहरबानी से परहेज बी.आर.एस. और भाजपा ने भी नहीं किया। रुझानों से पता चल रहा है कि तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने की के.सी.आर. की राह मुश्किल नजर आ रही है तो इसका एक बड़ा कारण चुनाव मैदान में भाजपा की उपस्थिति और रणनीति है। 

हालांकि वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 6.98 प्रतिशत मतों के साथ मात्र एक सीट ही मिली थी, लेकिन अगले ही साल हुए लोकसभा चुनाव में वह 19.65 प्रतिशत वोट पा कर चार सीटें जीतने में सफल रही। दरअसल ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनावों में मिली सफलता से भाजपा के हौसलों को ऊंची उड़ान मिली है। भाजपा 150 में से 48 वार्ड जीतने में सफल रही। इसलिए उसने भी चुनाव जीतने की संभावना के आधार पर पुराने निष्ठावानों से ज्यादा टिकट दूसरे दलों से आए नेताओं को दिए। भाजपा को ज्यादा उम्मीदें उत्तरी तेलंगाना से हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि लगभग 40 सीटों पर मुकाबले में नजर आ रही भाजपा 7-8 सीटें जीत सकती है। 

निजी बातचीत में भाजपा नेताओं की टिप्पणी कि हम ‘किंग’ नहीं तो ‘किंगमेकर’ अवश्य बनेंगे, बताती है कि बहुमत मिलने की खुशफहमी पार्टी को नहीं है, पर परिवारवाद पर प्रहार तथा पिछड़े वर्ग का मुख्यमंत्री बनाने के वायदे की आक्रामक रणनीति से वह बी.आर.एस. और कांग्रेस, दोनों को नुकसान पहुंचाते हुए इतनी सीटें अवश्य जीत लेना चाहती है कि के.सी.आर. अपने नूराकुश्ती-मित्र असदुद्दीन ओवैसी की ए.आई.एम.आई.एम. के सहयोग के बावजूद, उसके समर्थन के बिना मुख्यमंत्री न बन पाए। भाजपा का आकलन है कि ए.आई.एम.आई.एम. 6-7 सीट से ज्यादा नहीं जीत सकती। अगर बी.आर.एस. को 50 सीटों तक रोका जा सके तो के.सी.आर. को भाजपा से हाथ मिलाना ही पड़ेगा, जिसका असर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी होगा। बेशक तब बी.आर.एस. और भाजपा में मिलीभगत के कांग्रेसी आरोप की पुष्टि भी हो जाएगी। 

चुनाव जिताऊ कसौटी के दबाव में बी.आर.एस. ने भी दलबदलुओं को टिकट देने से परहेज नहीं किया। कड़े मुकाबले में राज्य के अल्पसंख्यक मतदाताओं की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है, जो 40-45 सीटों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक आरक्षण बड़ा मुद्दा बन गया है, जिस पर कांग्रेस और बी.आर.एस., दोनों ने ही अपनी-अपनी पीठ थपथपाई। बी.आर.एस. की सत्ता में वापसी की संभावनाएं इसलिए बेहतर मानी जा सकती हैं कि उसके पास समर्थन लेने के विकल्प होंगे, जबकि कांग्रेस के पास नहीं।-राजकुमार सिंह
 


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