किसे घर पर रहना चाहिए...?

punjabkesari.in Sunday, Sep 13, 2026 - 04:05 AM (IST)

कोचीन में एक कॉन्फ्रैंस के दौरान, एक सुन्नी धर्मगुरु ने कथित तौर पर कहा कि उनके धार्मिक ग्रंथ महिलाओं को घर के अंदर रहने की सीख देते हैं और उन्हें सार्वजनिक जगहों पर लाने से भारी तबाही मच सकती है।  मैंने घबराहट में बाहर देखा। हर तरफ औरतें ही औरतें थीं। एक महिला बस चला रही थी। दूसरी सर्जरी कर रही थी। तीसरी अदालत में केस लड़ रही थी। कई औरतें बच्चों को पढ़ा रही थीं, कंपनियां चला रही थीं, हवाई जहाज उड़ा रही थीं और जिलों का प्रशासन संभाल रही थीं।
अजीब बात है कि इमारतें अभी भी खड़ी थीं।
‘‘वह भारी तबाही कहां है?’’ मैंने पास खड़े एक सज्जन से पूछा।
‘‘वह आएगी,’’् उन्होंने धीरे से कहा, ‘‘हो सकता है कि कोई औरत जल्द ही आजाद हो जाए।’’
‘‘बहुत बुरा,’’ मैंने कहा, ‘‘हो सकता है कि वह सोचना भी शुरू कर दे।’’
यह सुनकर वह सिहर उठे।

सदियों से औरतें बराबरी का इंसान माने जाने के मामूली अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं। फिर भी, जब भी वे आगे बढ़ती हैं, कोई न कोई धार्मिक किताब उठाता है, उसमें से अपनी सुविधा का एक वाक्य निकालता है और उन पर थोप देता है।
उस किताब को शायद ही कभी उसके संदर्भ को समझने के लिए खोला जाता है। उसका इस्तेमाल बस एक ईंट की तरह किया जाता है।
‘‘घर पर रहो।’’ धर्मगुरु मंच से कहते हैं।
‘‘क्यों?’’ औरत पूछती है।
‘‘क्योंकि परमात्मा ऐसा कहते हैं।’’
‘‘कहां?’’
‘‘ज़्यादा सवाल मत पूछो। इससे भी तबाही होती है।’’

पुराने जमाने के कई नियम ऐसे समाजों में बने थे, जहां जिंदगी बिल्कुल अलग थी। पुरुष शिकार करते थे, लड़ाइयां लड़ते थे, खतरनाक इलाकों से गुजरते थे और घर से बाहर रह कर कमाते थे। औरतें आम तौर पर बच्चों की सुरक्षा करती थीं और घर संभालती थीं। वे नियम उस दौर के हालात के हिसाब से थे।
लेकिन आज लड़ाइयां सैटेलाइट, कम्प्यूटर, इंटैलिजैंस और टैक्नोलॉजी से लड़ी जाती हैं। औरतें सेना में सेवा देती हैं, हवाई जहाज उड़ाती हैं, मिसाइलें डिजाइन करती हैं और सरकारें चलाती हैं। अब शारीरिक ताकत यह तय नहीं करती कि समाज में कौन योगदान दे सकता है।
दिमाग तय करता है।
और शायद यही बात कुछ पुरुषों को डराती है।

एक पढ़ी-लिखी औरत सवाल कर सकती है। एक आजाद औरत अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा सकती है। एक आत्मविश्वास से भरी औरत यह पूछ सकती है कि जो पुरुष उसे धर्मग्रंथों का हवाला दे रहा है, उसने कभी उन बातों का जिक्र क्यों नहीं किया, जिनमें दया, न्याय, विनम्रता और संयम बरतने की सीख दी गई है। धर्म को लोगों को ऊपर उठाना चाहिए, न कि उन्हें कमरों में बंद करना चाहिए। हर धर्म में सम्मान, करुणा और न्याय के बारे में सुंदर बातें कही गई हैं। लेकिन जब धर्मग्रंथों को उनके संदर्भ से अलग करके पुरुषों के विशेषाधिकार को बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो इससे धर्म मजबूत नहीं होता। इससे धर्म ऐसा लगने लगता है जैसे वह ज्यादती करने वालों का साथ दे रहा हो।  ऐसी बातें इसलिए भी खतरनाक हैं क्योंकि ये उन परिवारों पर असर डालती हैं, जहां शिक्षा कम है। एक कंट्रोल करने वाला पति इन्हें सुनकर सोचता है कि उसके बर्ताव को परमात्मा की मंजूरी मिल गई है। एक डरी हुई बेटी को पढ़ाई से रोक दिया जाता है। एक काबिल पत्नी को काम करने से रोका जाता है। जुल्म को अचानक धार्मिक भाषा मिल जाती है।

अगर महिलाओं के सार्वजनिक जगहों पर आने से भारी तबाही होती है, तो शायद जो चीज तबाह हो रही है, वह समाज नहीं, बल्कि पुरुषों का दबदबा है। और प्यारे पाठको, यह तबाही तो जश्न मनाने लायक हो सकती है। तो सज्जनों, महिलाओं को घर पर रहने के लिए कहने से पहले, याद रखें कि आपकी जान बचाने वाला डॉक्टर, आपके अधिकारों की रक्षा करने वाला जज, या आपका प्लेन उड़ाने वाला पायलट कोई महिला हो सकती है।और अगर इससे भी आपको परेशानी होती है, तो शायद आपको ही घर पर रहना चाहिए...!-दूर की कौड़ी राबर्ट क्लीमैंट्स
 


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