भारत में सस्ता और सुलभ न्याय कब मिलेगा

punjabkesari.in Monday, Dec 06, 2021 - 05:29 AM (IST)

प्रसिद्ध ब्रिटिश विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा था कि देर से दिया गया न्याय तो अन्याय ही है। हमारे देश में आज भी अंग्रेजों की चलाई हुई न्याय-पद्धति ही चल रही है। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं लेकिन भारत में एक भी प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ, जो विश्व की सबसे प्राचीन न्याय पद्धति, जो कि भारतीय ही है, को लागू करने की कोशिश करता। 

इसका दुष्परिणाम है कि आज भारत की अदालतों में लगभग 5 करोड़ मुकद्दमे लटके पड़े हैं। जो न्याय कुछ ही दिनों में मिल जाना चाहिए, उसे मिलने में 30-30 और 40-40 साल लग जाते हैं। कई मामलों में तो जज, वकील और मुकद्दमेबाज- सभी का निधन भी हो जाता है। कई लोग सालों साल जेल में सड़ते रहते हैं और जब उनका फैसला आता है तो मालूम पड़ता है कि वे निर्दोष थे। 

ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए भी होता है कि बेचारे जज क्या करें? एक ही दिन में वे कितने मुकद्दमे सुनें? देश की अदालतों में अभी 5500 पद खाली पड़े हैं। 400 से ज्यादा पद तो उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों में ही खाली हैं। वर्तमान सरकार ने इधर इन पदों को भरने में थोड़ी मुस्तैदी जरूर दिखाई है लेकिन जरूरी यह है कि वह पत्तों पर पानी छिड़कने की बजाय जड़ों में लगे कीड़ों का इलाज करे। 

विधि आयोग का कहना है कि भारत में अभी लगभग 20,000 जज हैं। उनकी संख्या 2 लाख होनी चाहिए। इतने जजों की जरूरत ही नहीं होगी, यदि विधि आयोग की समझ ठीक हो जाए तो। उसे पता ही नहीं है कि हमारी संपूर्ण न्याय-व्यवस्था आंख मींच कर चल रही है। यदि भारत की अदालतें भारतीय भाषाओं में बहस और फैसले करने लगें तो फैसले भी जल्दी होंगे और 20-30 हजार जज ही भारत के लिए काफी होंगे। भारत में 18 लाख वकील हैं। वे कम नहीं पड़ेंगे। यदि अदालतों में भारतीय भाषाएं चलेंगी तो मुवक्किलों को बहस और फैसले समझना भी आसान होगा और उनकी ठगाई भी कम होगी। 

लेकिन यह क्रांतिकारी परिवर्तन करने की हिम्मत कौन कर सकता है? वही नेता कर सकता है, जो अपनी हीन-ग्रंथि का शिकार न हो और जिसके पास भारत को महाशक्ति बनाने की दृष्टि हो। यदि स्वतंत्र भारत में हमारे पास ऐसे कोई बड़े नेता होते तो भारत की न्याय-व्यवस्था कभी की सुधर जाती। लेकिन हमारे ज्यादातर नेता तो नौकरशाहों की गुलामी करते हैं। यह गुलामी गुप्त और अदृश्य होती है। जनता को यह आसानी से पता नहीं चलती। नेताओं को भी यह स्वाभाविक ही लगती है। यदि उन्हें भी इसकी समझ हो जाती तो क्या भारत की संसद अब भी अपने मूल कानून अंग्रेजी में बनाती रहती? 

जो देश अंग्रेज के गुलाम नहीं रहे, यदि आप उन पर नजर डालें तो पाएंगे कि वे अपने कानून अपनी भाषा में ही बनाते हैं। इसीलिए उनकी जनता को मिलने वाला न्याय सस्ता, सुलभ और त्वरित होता है। पता नहीं, भारत में वह दिन कब आएगा?-डा. वेदप्रताप वैदिक
 


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