हमें प्रासंगिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए

punjabkesari.in Thursday, May 19, 2022 - 04:31 AM (IST)

बढ़ रही महंगाई को लेकर आने वाले बुरे समाचारों का कोई अंत नजर नहीं आता। पैट्रोलियम पदार्थों, बिजली, सब्जियों, फलों, दूध, आटा तथा अन्य सभी आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तीव्र वृद्धि के साथ अप्रैल में बैंचमार्क थोक मूल्य सूचकांक 15.1 प्रतिशत की रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। 

थोक मूल्य सूचकांक गत एक वर्ष से अधिक समय से ऊंचा तथा दोहरे अंकों में बना हुआ है और इसका स्वाभाविक असर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर पड़ा है जिसने अप्रैल में 7.79 प्रतिशत की ऊंचाई को छू लिया। जहां ये आधिकारिक आंकड़े हैं, उपभोक्ताओं के तौर पर हम कई महीनों से इसकी पीड़ा महसूस कर रहे हैं। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि मुद्रास्फीति यूक्रेन पर रूसी हमले के कारण बढ़ी है लेकिन यह रुझान हमले से काफी पहले कोविड महामारी के साथ शुरू हो गया था जिसने गंभीर स्थिति पैदा कर दी। 

महामारी के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था पर बड़ा विपरीत असर पड़ा जिसके परिणामस्वरूप व्यवसाय बंद हो गए, बड़ी संख्या में नौकरियां  समाप्त हो गईं जिससे लाखों लोग गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिए गए। रोजगार में वृद्धि और यहां तक कि स्थिर रोजगार दर के विपरीत उपलब्ध रोजगारों की संख्या वास्तव में कम हुई है। व्यवसाय तथा शिक्षा जैसे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आया व्यवधान कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनका देश को सामना करना पड़ रहा है और सामान्य स्थितियां बहाल करने के लिए प्रयासों को दोगुना करने की जरूरत है। 

हालांकि दुर्भाग्य से हमारे ध्यान का केंद्र अतीत को खोदने तथा साम्प्रदायिक विवादों में उलझे रहने में बना हुआ है। आप इन दिनों में कोई भी चैनल देखो और आप उन पर ङ्क्षहदू-मुस्लिम मुद्दों को लेकर अंतहीन चर्चाएं पाएंगे। तथाकथित विशेषज्ञ अन्य नजरिए को समझने का प्रयास किए बिना बड़े जोर-शोर से अपनी राय पेश करते हैं। यदि दूसरे पक्ष की दलीलें तर्कपूर्ण भी हैं तो उनके अपने स्टैंड से हटने की बात को दर-किनार कर दिया जाता है। साम्प्रदायिक मुद्दों पर बने वीडियो तथा चित्रों को चलाए रखने का रुझान केवल आग में घी डालता है। 

यहां तक कि प्रिंट मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी इस दौड़ में शामिल हो गया है तथा देश के सामने मौजूद वास्तविक मुद्दों पर ध्यान नहीं देता। जहां यह सच है कि समाचार एक समाचार ही है तथा और मीडिया भी इससे परे नहीं देख सकता लेकिन जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि ऐसी कवरेज भावनाएं न भड़काए तथा उन लोगों पर विपरीत प्रभाव न डाले जो  जल्दी प्रभावित हो जाते हैं और जिनको मुद्दों तथा राजनीति की सीमित समझ होती है। 

नवीनतम मुद्दा, जो समाचार कवरेज में छाया हुआ है, ज्ञानवापी मस्जिद विवाद का है। बहुत से लोगों का यह मानना था कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मुद्दे का समाधान साम्प्रदायिक विवाद को समाप्त कर देगा। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर सुप्रीमकोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय वाले दिन कहा था कि यह एक ऐसा दिन है जब आपको किसी भी कड़वाहट को भुला देना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि यह एक अपवाद था और यह आंदोलन हमारे लिए एक ङ्क्षचता नहीं रहेगा। 

यहां तक कि राम जन्म भूमि मामले में निर्णय सुनाते हुए सुप्रीमकोर्ट ने पूजा के स्थान (विशेष प्रावधान) कानून 1991 का हवाला दिया था और कहा था कि  यह हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की एक आवश्यक विशेषता है। यह कानून पूजा स्थलों की 15 अगस्त 1947 यथास्थिति बनाए रखने का प्रावधान करता है। 

हालांकि एक सर्वेक्षण दल द्वारा मस्जिद परिसर के भीतर एक ‘शिवङ्क्षलग’ पाने के बाद ज्ञानवापी मस्जिद पर अदालत के हस्तक्षेप के ऊपरांत भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने अपने सुर बदल लिए। अब यह स्पष्ट है कि ‘गौरव बहाल करने’ का यह अभियान अयोध्या मंदिर के साथ समाप्त नहीं हुआ और न ही यह ज्ञानवापी तथा ऐसे अन्य स्थानों के साथ समाप्त होगा। 

बहुत समय पहले कार्ल माक्र्स ने एक अलग संदर्भ में कहा था कि धर्म जनता के लिए अफीम की तरह है। भारत में हमें यह सच साबित होता दिखाई देता है और देश व इसके लोगों के सामने खड़े वास्तविक मुद्दों को भुलाकर यह सबसे आगे खड़ा है। विश्व में हम एकमात्र ऐसे देश होंगे जो अपने भविष्य को खराब करने के लिए अपने अतीत को खोद कर बाहर निकाल रहे हैं।-विपिन पब्बी 
 


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