अमरीका-ईरान युद्ध और भारत: पूर्व सैनिक की चिंता
punjabkesari.in Friday, Mar 20, 2026 - 04:59 AM (IST)
आज की दुनिया की सबसे बड़ी चिंता है तेल का दाम। पैट्रोल, डीजल, रसोई गैस और हर चीज महंगी हो रही है। क्यों? क्योंकि अमरीका और इसराईल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया। ईरान ने जवाब दिया, मिसाइलें और ड्रोन दागे। अब युद्ध 2 सप्ताह से ज्यादा चल रहा है। तेल 110 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। होर्मुज की खाड़ी, जहां से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है, पर भी खतरा मंडरा रहा है। भारत की बात करें तो रिटायर्ड मेजर जनरल जी.डी. बख्शी ने सोशल मीडिया और टी.वी. पर बार-बार कहा, ‘‘यह हमला गलत था। अमरीका-इसराईल ने ईरान को बहुत कम आंका।’’ जनरल बख्शी ने अपने एक पोस्ट में लिखा, ‘‘सब सोच रहे थे कि ये केकवॉक होगा लेकिन मैंने शुरू से चेतावनी दी थी कि ईरान को कम मत समझो। ये असीमित युद्ध लड़ेगा।’’
एक टी.वी. इंटरव्यू में उन्होंने सरल भाषा में समझाया कि क्या गलती हुई। ईरान के पास सस्ते ड्रोन (20,000 डॉलर का एक) हैं, जबकि अमरीका-इसराईल के महंगे इंटरसैप्टर मिसाइल (20 लाख डॉलर का एक) खत्म हो रहे हैं। ईरान ने हाइपरसोनिक मिसाइलें दागीं, जो राडार से बच सकती हैं। इन मिसाइलों ने कतर के राडार, थाड बैटरी, अमरीकी बेस और इसराईल के कई शहरों पर हमले किए। 15 दिन में 650 मिसाइलें और 2600 ड्रोन तबाह हुए, 21 अमरीकी सैनिक मारे गए। इस सबका अंदाजन खर्च करीब 21 अरब डॉलर से ज्यादा हुआ। जनरल बख्शी के अनुसार, ‘‘ट्रम्प ने सोचा था कि खामेनेई के मरते ही युद्ध खत्म हो जाएगा लेकिन ईरान का हौसला बहुत ऊंचा है। 8 साल के ईरान-इराक युद्ध में 10 लाख मौतें हुईं, फिर भी ईरान नहीं झुका। अब यह अस्तित्व की लड़ाई है।’’
वह आगे कहते हैं, ‘‘होर्मुज खाड़ी बंद करने से पूरी दुनिया में मंदी आ जाएगी। तेल 150 डॉलर से भी ऊपर जा सकता है। अमरीका के लिए बॉडी बैग्स (सैनिकों की मौत) मिडटर्म चुनाव में आफत बन सकते हैं। ट्रम्प फंस गए हैं। यह युद्ध शुरू करना आसान था लेकिन खत्म करना मुश्किल। यह 21वीं सदी का सबसे बड़ा संघर्ष है।’’ हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक हैं। 80 प्रतिशत तेल बाहर से आता है। यदि होर्मुज बंद हुआ तो पैट्रोल 150-200 रुपए लीटर हो जाएगा। रसोई गैस भी महंगी हो जाएगी। वहीं खाड़ी देशों में काम करने वाले 9 लाख भारतीयों की नौकरी भी खतरे में आ जाएगी। ईरान के साथ भारत का ‘चाबहार बंदरगाह प्रोजैक्ट’ ठप्प पड़ सकता है। अफगानिस्तान और मध्य एशिया का मार्ग भी बंद हो सकता है। महंगाई आम आदमी की जेब काटेगी।
गौरतलब है कि भारत ने हमेशा युद्ध की स्थिति में संतुलन बनाए रखा। इस युद्ध की बात करें, तो ईरान से हमें सस्ता तेल, इसराईल से हथियार और टैक्नोलॉजी और अमरीका से व्यापार मिलता रहा है। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने अमरीका-इसराईल के साथ खुलकर खड़ा होने का फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी फरवरी में इसराईल गए। वहां उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ ‘स्पैशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ की घोषणा की। युद्ध शुरू होते ही भारत ने ईरान के हमलों की निंदा की। खाड़ी देशों के राजाओं को फोन कर समर्थन जताया। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के खिलाफ प्रस्ताव का समर्थन किया। खामेनेई की मौत पर ईरानी दूतावास में श्रद्धांजलि देरी से दी।
हम ब्रिक्स के अध्यक्ष हैं। रूस-चीन-ईरान हमारे साथी हैं। लेकिन अमरीका के दबाव में हम ईरान के खिलाफ खड़े हो गए। भारत इसराईल और ईरान से अच्छे संबंध रखता है। हम युद्धविराम के मध्यस्थ बन सकते हैं लेकिन सरकार ने मध्यस्थता की बजाय एकतरफा रुख अपनाया। भारत को तटस्थ रहना चाहिए था, दोनों पक्षों से बात कर युद्धविराम की अपील करनी चाहिए थी। संयुक्त राष्ट्र में ‘शांति और संवाद’ का प्रस्ताव लाना चाहिए था। ईरान से तेल खरीदना जारी रखना चाहिए था। चाबहार प्रोजैक्ट को मजबूत करना चाहिए था। सरकार ने सोचा कि अमरीका-इसराईल के साथ खड़े होने से फायदा होगा लेकिन भूल गए कि ईरान हमारा पुराना दोस्त है। चाबहार बंदरगाह अमरीका के खिलाफ हमारा रणनीतिक कदम था। सस्ता ईरानी तेल हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत करता था। अब तेल महंगा होने से मुद्रास्फीति बढ़ेगी। विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ पड़ेगा। यदि भारत क्वाड और ब्रिक्स दोनों का सदस्य है तो हमारी आवाज दोनों तरफ सुनी जाती। लेकिन क्या एकतरफा रुख अपनाकर हमने अपनी ताकत कम कर दी?
मेजर जनरल बख्शी के अनुसार, ‘‘यह मूर्खतापूर्ण युद्ध है। यह जल्द खत्म हो।’’ भारत को अब अपनी गलती सुधारनी चाहिए। भारत की विदेश नीति हमेशा ‘सभी के साथ, किसी के खिलाफ नहीं’ रही है। मोदी सरकार को इस सिद्धांत पर लौटना चाहिए। क्योंकि अंत में भारत का हित सबसे ऊपर है-सस्ता तेल, सुरक्षित नौकरियां और मजबूत अर्थव्यवस्था। युद्ध में किसी एक का पक्ष नहीं, बल्कि शांति का पक्ष लेना चाहिए।-रजनीश कपूर
