चीन के विश्वविद्यालयों के उदय से सीख सकता है भारत
punjabkesari.in Friday, Jul 31, 2026 - 05:52 AM (IST)
नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विरोध प्रदर्शनों के बाद भारत के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे ने शिक्षा सुधार को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है। हाल ही में एक लेख में लेखिका और पत्रकार पल्लवी अय्यर ने भारत और चीन को ‘परीक्षाओं के राष्ट्र’ बताया है। बड़े, असमान समाजों में, प्रतियोगी सार्वजनिक परीक्षा बेहतर जीवन का जरिया है। यह एक ऐसा वादा है कि जन्म, धन, जाति, क्षेत्र और संबंध जैसी चीजों को मेहनत से कुछ हद तक बेअसर किया जा सकता है। इसीलिए किसी भी तरह की जानकारी लीक होना भरोसे का एक विनाशकारी उल्लंघन है।
चीन की गाओकाओ परीक्षा, जिसमें इस वर्ष 133.5 करोड़ छात्रों ने भाग लिया, केंद्रीय रूप से तैयार और प्रांतों द्वारा प्रशासित की जाती है। परीक्षा के प्रश्नपत्र जी.पी.एस. ट्रैकिंग और पुलिस सुरक्षा के तहत भेजे जाते हैं, प्रश्न तैयार करने वालों को सुरक्षित स्थानों पर अलग रखा जाता है, परीक्षा हॉल में चेहरे की पहचान और सिग्नल जैमर का उपयोग किया जाता है और यहां तक कि ए.आई. कंपनियां परीक्षा अवधि के दौरान कुछ उपकरणों को सीमित कर देती हैं। यह तंत्र इस आम धारणा को और मजबूत करता है कि प्रगति प्रभाव की बजाय नियमों द्वारा नियंत्रित होती है।
चीनी उच्च शिक्षा के परिवर्तनकारी अनुभव से कई सबक मिलते हैं। चीन में विश्वविद्यालयों का उदय 3 दशकों से चली आ रही राज्य नीति का परिणाम था। 2004 में, वैश्विक विश्वविद्यालयों की अकादमिक रैंकिंग के शीर्ष 100 में चीन का कोई भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं था। 2025 तक, सिंघुआ और पीकिंग विश्वविद्यालय वैश्विक शीर्ष श्रेणी में प्रवेश कर चुके थे और कम से कम 6 चीनी विश्वविद्यालय शीर्ष 100 में शामिल थे। भारत के लिए पहला सबक है क्रमबद्धता। हमारी उच्च शिक्षा को विद्यालय स्तर पर साक्षरता, अंक ज्ञान और शिक्षकों की गुणवत्ता की मजबूत नींव की आवश्यकता है। चीन में, 2010 तक 9 वर्षीय अनिवार्य शिक्षा सार्वभौमिक हो गई, जिससे उच्च शिक्षा के लिए योग्य छात्रों का एक बड़ा समूह तैयार हुआ।
दूसरा सबक है एकाग्रता। चीन ने प्रोजैक्ट 211, प्रोजैक्ट 985 और बाद में अपने डबल फस्र्ट-क्लास कार्यक्रम के माध्यम से चुङ्क्षनदा विश्वविद्यालयों और विषयों पर अपने संसाधनों को केंद्रित किया। प्रोजैक्ट 985 की शुरुआत केवल 9 विश्वविद्यालयों से हुई और बाद में इसका विस्तार 39 विश्वविद्यालयों तक हुआ, जिसका स्पष्ट उद्देश्य हार्वर्ड, एम.आई.टी., ऑक्सफोर्ड और टोक्यो के साथ प्रतिस्पर्धा करना था। 2009 और 2013 के बीच, प्रोजैक्ट 985 के विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय अनुसंधान निधि का लगभग 70 प्रतिशत प्राप्त हुआ, जबकि उनमें चीनी विश्वविद्यालय के छात्रों के 5 प्रतिशत से भी कम छात्र नामांकित थे। यह रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारत की समस्या अपर्याप्त वित्त पोषण है, जो कि असमान रूप से वितरित है। इसमें ‘व्यापकता तो है लेकिन गहराई नहीं’। ए.एस.पी.आई. द्वारा निगरानी की जाने वाली 74 महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में से लगभग 50 में भारत वैश्विक शीर्ष 5 में शामिल है लेकिन किसी में भी अग्रणी नहीं है। हमें एक व्यापक शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है, साथ ही ए.आई., सैमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी, सामग्री विज्ञान, ऊर्जा भंडारण, कृषि और जलवायु प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कुछ विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी संस्थानों की भी आवश्यकता है।
तीसरा सबक प्रदर्शन-आधारित स्वायत्तता है। वित्तपोषण परिणामों, आवधिक समीक्षा और पदावनति की संभावना से जुड़ा हुआ है। डबल फस्र्ट क्लास कार्यक्रम ने एक ऐसी प्रणाली में प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया, जहां विशिष्ट दर्जा एक स्थायी अधिकार बन गया था। भारतीय विश्वविद्यालयों को नियमित नौकरशाही नियंत्रण से स्वायत्तता की भी आवश्यकता है लेकिन साथ-साथ शिक्षण परिणामों, अनुसंधान की गुणवत्ता, शासन और रोजगार क्षमता के लिए जवाबदेही भी होनी चाहिए। चौथा सबक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बिठाना है। चीन के विशिष्ट विश्वविद्यालय औद्योगिक समूहों और प्रौद्योगिकी मिशनों से जुड़े हुए थे। इससे महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में इसकी मजबूती को बल मिला। पांचवां सबक है पाठ्यक्रम में लचीलापन। 2025 में, चीन के शिक्षा मंत्रालय ने 2025-27 के दौरान शैक्षणिक विषयों और पाठ्यक्रमों को समायोजित करने के लिए एक कार्य योजना शुरू की। इसमें अत्याधुनिक तकनीकों में नए विषयों की स्थापना, कम मांग या घटती गुणवत्ता वाले कार्यक्रमों में सुधार, मजबूत अंतॢवषयक एकीकरण, शैक्षिक सामग्री में ए.आई. उपकरणों का समावेश, शिक्षकों की क्षमता निर्माण और उद्योग-विश्वविद्यालय के बीच घनिष्ठ सहयोग का आह्वान किया गया है।
भारतीय विश्वविद्यालय समितियों, स्वीकृतियों और पुराने पाठ्यक्रम के अनुसार चल रहे हैं। ए.आई., जैव प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स, जलवायु जोखिम और भू-राजनीतिक आपूर्ति शृंखला में बदलाव के इस युग में, पाठ्यक्रमों में निरंतर परिवर्तन आवश्यक है। हमें भारत में क्या करना चाहिए? पहला, परीक्षा की सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करें, विश्वास के बिना, पिरामिड संरचना ध्वस्त हो जाती है। दूसरा, परीक्षा सुधार को तत्काल लागू करें। तीसरा, 50-100 विश्वविद्यालयों और विषयों की पहचान करें, जिनमें गहन और दीर्घकालिक निवेश किया जा सके। चौथा, उन्हें भर्ती, पाठ्यक्रम, सहयोग और अनुसंधान सांझेदारी में स्वायत्तता दें। पांचवां, विश्वविद्यालयों को स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ें और विकेंद्रीकरण को मजबूत करें। छठा, कृत्रिम बुद्धिमता, डाटा और अंत:विषयक समस्या-समाधान को प्रत्येक गंभीर डिग्री का अभिन्न अंग बनाएं। चीन का उदाहरण दर्शाता है कि जब नीति रणनीतिक, धैर्यपूर्ण और गंभीर हो तो परिवर्तन संभव है।-अजीत रानाडे
