डाक्टरी सेवाओं में लूट की जिम्मेदारी सरकार पर
punjabkesari.in Saturday, Feb 14, 2026 - 03:49 AM (IST)
कहावत है कि धन की हानि चिंता का विषय नहीं लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं तो यह घातक है। पैसा तो फिर भी कमाया जा सकता है, लेकिन सेहतमंद शरीर गंवा दिया तो उसे दोबारा पाना संभव नहीं। जीवन भर डाक्टरों की निगरानी और दवाइयों का सहारा जरूरी हो जाने से जीवन बोझ बन जाता है।
डाक्टर बनने की अलौकिक कथा : मैडीकल की पढ़ाई करने वाले विद्याॢथयों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है और उनकी पढ़ाई के लिए उपलब्ध कालेज भी गत 10 वर्षों में लगभग दोगुने हो गए हैं। शानदार बिल्डिंग, आलीशान कमरे और अन्य निर्माण दिखाकर डाक्टरी पढऩे के इच्छुक विद्यार्थियों को मोटी फीस लेकर एडमिशन दे दिया जाता है। बढिय़ा टाइम टेबल बना दिया और अब जब वे क्लासरूम या लाइब्रेरी या लैबोरेटरी में गए तो वहां न तो शिक्षित और प्रशिक्षित शिक्षक मौजूद हैं और न ही लैब टैक्नीशियन या विशेषज्ञ जो टैस्ट आदि करने की विधि सिखा सकें। यह विडंबना नहीं बल्कि खिलवाड़ है कि मैडीकल की पढ़ाई के लिए सही शिक्षक न मिले तो प्रबंधकों ने किसी अन्य विषय में पी.एच-डी. करने वालों को पढ़ाने के लिए नियुक्त कर दिया क्योंकि कहलाते तो वे भी डाक्टर ही हैं।
चिकित्सा शिक्षा में शिक्षकों की कमी को लेकर जनवरी 2026 में एक याचिका की सुनवाई के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि इन शिक्षण संस्थानों में विशेष रूप से शिक्षकों और प्रबंधन के खाली पदों पर अगले 4 महीनों में नियुक्ति हो जानी चाहिए। निश्चय ही यह नहीं हो सकता क्योंकि जैसी कछुआ चाल हमारे देश में है, उसमें यह असंभव है। उसके बाद और अधिक समय मांगा जाएगा जिसकी कड़ी वर्षों तक खिंचती चली जाएगी क्योंकि सरकार की कोशिशों में गंभीरता और पारदर्शिता नहीं है। वह असली-नकली आंकड़ों के आधार पर जनता को भ्रम में डाले रखती है वरना सोचिए कि इस बात में क्या तुक है कि पढ़ाने वाले हैं नहीं और पढऩे वालों को दाखिला दे दिया!
हर साल मैडीकल में दाखिलों की सीटें बढ़ रही हैं और आने वाले वर्षों में जनसंख्या के अनुपात में डाक्टरों की संख्या भी बढ़ेगी। प्रश्न यह है कि क्या कालेजों और शिक्षकों की जरूरत पूरी करने की व्यवस्था की जा रही है? जी नहीं, इन दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं है। फैकल्टी की कमी विशेषकर तेलंगाना, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में नए खुले सरकारी कॉलेजों में 50 प्रतिशत तक है। जरूरी सुविधाएं भी नहीं हैं। इस कारण जहां शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ पडऩे से पढ़ाई की क्वालिटी गिर रही है, वहीं मामलों में अनक्वालीफाइड तथा नॉन मैडीकल फैकल्टी विद्यार्थियों का भविष्य तबाह कर रही है। जब ये मरीजों का इलाज करेंगे तो क्या होगा, सोचकर भी डर लगता है। क्या लोगों का जीवन खतरे में डालने वाले डाक्टर पैदा होने से देश का भला होगा? जाति आधारित आरक्षण के कारण दाखिला देने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसके लिए न्यूनतम अंकों की अनिवार्यता समाप्त करना घातक है। नागरिकों को स्वस्थ बनाए रखने की जितनी जिम्मेदारी स्वयं की है उतनी ही स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिए आवश्यक प्रबंध करने के लिए सरकार की है। बड़े शहरों में तो फिर भी गनीमत है लेकिन गांव-देहात और दूरदराज के क्षेत्रों में आवश्यक सुविधाएं नदारद हैं। इन इलाकों में अगर कानूनन सर्विस करने की मजबूरी न हो तो कोई भी डाक्टर यहां न आए।
इसका कारण एकमात्र यह नहीं है कि वे आना नहीं चाहते बल्कि यह है कि वहां स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज करने, टैस्ट करने की सुविधाएं और आधुनिक उपकरण नहीं हैं। लोगों की आॢथक स्थिति ऐसी नहीं है कि बड़े शहरों में बीमारी का इलाज करवा सकें। यह सरकारी नीतियों की विफलता ही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप डाक्टरों का बोलबाला और नीम हकीम खतरा-ए-जान की कहावत सिद्ध हो रही है। केवल जन स्वास्थ्य केंद्र, आयुष्मान भारत और योग संस्थान की बदौलत लोगों की स्वास्थ्य रक्षा नहीं हो सकती। प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों और उनके तीमारदारों की सच्ची कहानियां और सरकार की बेरुखी इस बात का प्रमाण हैं कि मैडीकल की पढ़ाई की व्यवस्था और गुणवत्ता प्रश्नों के घेरे में है। सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए कोई भी दावा कर सकती है और उस पर यकीन करना युवा पीढ़ी के लिए घातक साबित होगा।
चिकित्सा व्यवसाय का लुटेरा पहलू : मेधावी विद्यार्थी एम.बी.बी.एस. करने के बाद सरकारी या निजी अस्पतालों में तुरंत नौकरी पा जाते हैं और जो सफल नहीं रहते वे अपना क्लीनिक खोल लेते हैं। उनकी योग्यता के बारे में मरीजों को संदेह रहता है लेकिन वे इतना तो समझ ही जाते हैं कि इस व्यवसाय में दूसरे खेल खेल कर आसानी से रुपया कमाया जा सकता है। यह धंधा बड़े और नामी अस्पतालों में भी होता है और मुफ्त की कमाई का साधन है। एक उदाहरण से समझिए। आपको मामूली सर्दी, खांसी, बुखार, जुकाम, थकावट, बदन दर्द है तो डाक्टर साहब ढेरों दवाई, एंटीबायोटिक देने के साथ तरह-तरह के टैस्ट करने की हिदायत देते हैं जिन पर 100-200 नहीं, 10, 20, 50 हजार तक खर्चा आता है। खांसी है तो टी.बी. तक के टैस्ट, बुखार है तो मलेरिया, टायफॉइड के लिए, दर्द के लिए एम.आर.आई. तक और कमजोरी से चक्कर आ गया तो उसके लिए तरह-तरह की मशीनों से गुजरने की जरूरत, मतलब यह कि चाहे उधार लो, अपनी बचत खत्म करो या जेवर, घर, जमीन बेचो, ये सब कराने के लिए मजबूरी की हद तक जाना पड़ता है।
सच यह है कि 90-95 प्रतिशत टैस्टों में कोई गंभीर बीमारी नहीं निकलती। एक और कलाकारी यह है कि सभी लैबोरेटरीज अनेक डाक्टरों के संपर्क या सांझेदारी से चलती हैं। यही हाल दवाओं का है। डाक्टर मरीज से पहले दवा कम्पनियों के प्रतिनिधियों से सौदा करने को प्राथमिकता देते हैं। अधिकतर दवाएं एक जैसी ही होती हैं लेकिन डाक्टर साहब एक विशेष किस्म की दवा के लिए पर्ची बनाकर देते हैं। ऐसा नहीं है कि ये टैस्ट निराधार हैं बल्कि जानलेवा बीमारियों का पता इन्हीं से चलता है लेकिन समझदार और काबिल डाक्टर जांच तभी करवाता है जब मरीज की बीमारी का इतिहास, अब तक की गई चिकित्सा का विवरण और शरीर के अंगों की स्वयं की गई प्राथमिक जांच और चिकित्सा के बाद भी हालत में कोई सुधार न हो। ऐसा कोई कानून भी नहीं है जो गैर-जरूरी टैस्ट और इलाज करने वाले डाक्टर को कटघरे में खड़ा कर सके। कोई जवाबदेही नहीं और अब तो मैडीकल लापरवाही को भी डाक्टर के विवेक की दलील से सही ठहरा दिया जाता है। अब शरीर है तो वह किसी भी कारण से अस्वस्थ तो होगा ही लेकिन इस कारण प्राणी का शोषण किया जाना तो अपराध ही माना जाएगा।-पूरन चंद सरीन
