महामारी का किसी भी धर्म से कोई लेना-देना नहीं

2021-04-19T03:55:01.033

पिछले वर्ष कोरोना ने जब अचानक दस्तक दी तो पूरी दुनिया थम गई थी। सदियों में किसी को कभी एेसा भयावह अनुभव नहीं हुआ था। तमाम तरह की अटकलें और अफवाहों के बाजार गर्म हो गए। एक-दूसरे देशों पर कोरोना फैलाने के आरोप लगने लगे। चीन को सबने निशाना बनाया। पर कुछ तो राज की बात है कोरोना की दूसरी लहर में, जब भारत की स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था लगभग अस्त-व्यस्त हो गई है तो चीन में इस दूसरी लहर का कोई असर क्यों नहीं दिखाई दे रहा? क्या चीन ने इस महामारी की रोकथाम के लिए अपनी पूरी जनता को टीके लगवा कर सुरक्षित कर लिया है? 

कोविड की पिछली लहर आने के बाद से ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इसके मूल कारण और उसका तोड़ निकालने की मुहिम छेड़ दी थी। पर भारत में जिस तरह कुछ टी.वी. चैनलों और राजनीतिक दलों ने कोविड फैलाने के लिए तबलीगी जमात को जिम्मेदार ठहराया और उसके सदस्यों को शक की नजर से देखा जाने लगा वो बड़ा अटपटा था। प्रशासन भी उनके पीछे पड़ गया। 

जमात के प्रांतीय अध्यक्ष के खिलाफ गैर-जिम्मेदाराना भीड़ जमा करने के आरोप में कई कानूनी नोटिस भी जारी किए गए। दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र को छावनी में तबदील कर दिया गया। यही मान लिया गया कि चीन से निकला यह वायरस सीधे तबलीगी जमात के कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए ही आया था। यह बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैया था। माना कि मुसलमानों को लक्ष्य करके भाजपा लगातार ङ्क्षहदुआें को अपने पक्ष में संगठित करने में जुटी है पर इसका मतलब यह तो नहीं कि जनता के बीच गैर-वैज्ञानिक अंधविश्वास फैलाया जाए। 

जो भी हो शासन का काम प्रजा की सुरक्षा करना और समाज में सामंजस्य स्थापित करना होता है। इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना रवैये से समाज में अशांति और अराजकता तो फैली ही, जो ऊर्जा और ध्यान कोरोना के उपचार और प्रबंधन में लगना चाहिए था वो ऊर्जा इस बेसिर-पैर के अभियान में बर्बाद हो गई। हालात जब बेकाबू होने लगे तो सरकार ने कड़े कदम उठाए और लॉकडाऊन लगा डाला। उस समय लॉकडाऊन का उस तरह लगाना भी किसी के गले नहीं उतरा। सबने महसूस किया कि लॉकडाऊन लगाना ही था तो सोच-समझ कर व्यावहारिक दृष्टिकोण से लगाना चाहिए था क्योंकि उस समय देश की स्वास्थ्य सेवाएं इस महामारी का सामना करने के लिए तैयार नहीं थीं इसलिए देश भर में काफी अफरा-तफरी फैली। जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा करोड़ों गरीब मजदूरों को झेलना पड़ा। 

बेचारे अबोध बच्चों को लेकर सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर अपने गांव पहुंचे। लॉकडाऊन में सारा ध्यान स्वास्थ्य सेवाआें पर ही केंद्रित रहा। जिसकी वजह से धीरे-धीरे स्थिति नियंत्रण में आती गई। उधर वैज्ञानिकों ने गहन शोध के बाद कोरोना की वैक्सीन तैयार कर ली और टीका अभियान भी चालू हो गया जिससे एक बार फिर समाज में एक उम्मीद की किरण जागी। इसलिए सभी देशवासी वही कर रहे थे जो सरकार और प्रधानमंत्री उनसे कह रहे थे। फिर चाहे कोरोना भागने के लिए ताली पीटना हो या थाली बजाना। पूरे देश ने उत्साह से किया। यह बात दूसरी है कि इसके बावजूद जब कोरोना का प्रकोप नहीं थमा तो देश में इसका मजाक भी खूब उड़ा। क्योंकि लोगों का कहना था कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। 

महामारी का किसी धर्म से न पहले कुछ लेना देना था न आज है। सारा मामला सावधानी बरतने, अपने अंदर प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने और स्वास्थ्य सेवाआें के कुशल प्रबंधन का है जिसमें कोताही से ये भयावह स्थिति पैदा हुई है। इस अफरातफरी के लिए लोग चुनाव आयोग, केंद्र व राज्य सरकारों, राजनेताआें और धर्मगुरुआें को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। जिन्होंने चुनाव लडऩे या बड़े धार्मिक आयोजन करने के चक्कर में सारी मर्यादाआें को तोड़ दिया। आम जनता में इस बात का भी भारी आक्रोश है कि देश में हुक्मरानों और मतदाताआें के लिए कानून के मापदंड अलग-अलग हैं। जिसके मतों से सरकार बनती है उसे तो मास्क न लगाने पर पीटा जा रहा है या आॢथक रूप से दंडित किया जा रहा है जबकि हुक्मरान अपने स्वार्थ में सारे नियमों को तोड़ रहे हैं। 

सोशल मीडिया पर नार्वे का एक उदाहरण काफी वायरल हो रहा है वहां सरकार ने आदेश जारी किया था कि 10 से ज्यादा लोग कहीं एकत्र न हों पर वहां की महिला प्रधानमंत्री ने अपने जन्मदिन की दावत में 13 लोगों को आमंत्रित कर लिया। इस पर वहां की पुलिस ने प्रधानमंत्री पर 1.75 लाख रुपए का जुर्माना ठोक दिया, यह कहते हुए अगर यह गलती किसी आम आदमी ने की होती तो पुलिस इतना भारी दंड नहीं लगाती। लेकिन प्रधानमंत्री ने नियम तोड़ा, जिनका अनुसरण देश करता है, इसलिए भारी जुर्माना लगाया। पर क्या एेसा कभी भारत में हो सकता है? हो सकता तो आज जनता इतनी बदहाली और आतंक में न जी रही होती।-विनीत नारायण
 


Content Writer

Pardeep

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