बजट ‘बौद्धिक सुस्ती’ का एक उदाहरण

punjabkesari.in Sunday, Feb 08, 2026 - 03:35 AM (IST)

रविवार को बजट 2026-27 पेश होने के बाद, सरकारी प्रवक्ताओं, संपादकीय लेखकों, कमैंटेटर्स और पत्रकारों ने बजट का वर्णन करने के लिए ‘सतर्क’ शब्द और ‘मामले को न बिगाड़ें’ वाक्यांश का इस्तेमाल किया। मुझे लगता है कि उन्होंने एक अमरीकी कहावत का पालन किया, ‘अगर कुछ खराब नहीं है, तो उसे ठीक न करें’।

कई चुनौतियां : आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (ई.एस.) ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने आने वाली चुनौतियों की पहचान की थी। उनमें से कुछ हैं :

-राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा शुरू किया गया टैरिफ युद्ध। हालांकि उन्होंने घोषणा की कि भारतीय सामानों पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया जाएगा, ऐसा लगता है कि यह कमी इस शर्त पर है कि भारत अमरीकी सामानों पर टैरिफ को शून्य कर दे, गैर-टैरिफ बाधाओं को हटा दे, 500 बिलियन अमरीकी डॉलर का अमरीकी सामान खरीदे और अन्य शर्तें, जिन्हें पूरा करना भारत के लिए मुश्किल हो सकता है।
-विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का प्रवाह ‘अपनी क्षमता से कम बना हुआ है’। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक पैसा निकाल रहे हैं। भारतीय प्रोमोटर, हालांकि पैसे वाले हैं, निवेश करने में हिचकिचा रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि सकल निश्चित पूंजी निर्माण (जी.एफ.शी.एफ.) जी.एस.टी. के लगभग 30 प्रतिशत पर अटका हुआ है।
-असंतोषजनक नॉमिनल जी.डी.पी. वृद्धि : एन.एस.ओ. द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली और राष्ट्रीय खातों पर संदेह ने वास्तविक जी.डी.पी. वृद्धि दरों पर एक छाया डाल दी है। नॉमिनल जी.डी.पी. एक बेहतर संकेतक है। यह 2023-24, 2024-25 और 2025-26 में क्रमश: 12 प्रतिशत, 9.8 प्रतिशत और 8 प्रतिशत बढ़ा है। वृद्धि की गति धीमी हो रही है।

-गंभीर बेरोजगारी की स्थिति। जून 2025 में युवा बेरोजगारी दर 15 प्रतिशत थी। कुल कार्यबल का केवल 21.7 प्रतिशत ही नियमित, वेतनभोगी रोजगार में है। लाखों युवा बेरोजगार हैं। संख्याएं स्वरोजगार की ओर बदलाव दिखाती हैं।
-कोई भी देश विनिर्माण शक्ति बने बिना मध्यम आय वाला देश नहीं बना। भारत के विनिर्माण क्षेत्र ने पिछले 10 वर्षों में जी.डी.पी. में मुश्किल से 15-16 प्रतिशत का योगदान दिया है। मेक इन इंडिया, पी.एल.आई. और अन्य योजनाएं नौकरियां पैदा करने में विफल रही हैं। राजकोषीय मजबूती बहुत धीमी गति से हो रही है- राजकोषीय घाटा 2025-26 में 4.4 प्रतिशत से घटकर 2026-27 में 4.3 प्रतिशत हो जाएगा और राजस्व घाटा 1.5 प्रतिशत पर बना रहेगा। इस दर से, एफ.आर.बी.एम. लक्ष्यों तक पहुंचने में 12 साल या उससे ज्यादा लगेंगे और हमें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। 2025-26 का टैक्स का दाव बुरी तरह असफल हो गया है। बजट का हिसाब आर.बी.आई. ने बचाया, जिसने 2025-26 में लगभग 3,04,000 करोड़ रुपए का बड़ा डिविडैंड दिया। पिछले 2 सालों में, इसने 2,10,874 करोड़ रुपए और 2,68,590 करोड़ रुपए दिए थे। यू.पी.ए. सरकार (2004-2014) के दौरान आर.बी.आई. से मिला सबसे ज्यादा डिविडैंड 2013-14 में 52,679 करोड़ रुपए था।

सी.ई.ए. की सलाह नजरअंदाज की : ई.एस. के चैप्टर 1 में, सी.ई.ए. ने ‘सावधानी बरतने, लेकिन निराशावादी न होने’ की सलाह दी। यही लहजा पूरी रिपोर्ट में बना रहा। एक और चैप्टर में उन्होंने राजकोषीय मजबूती के लिए एक भरोसेमंद रास्ते की वकालत की। सी.ई.ए. ने सिर्फ शहरीकरण के मामले में एक साहसिक दृष्टिकोण की वकालत की, जहां उन्होंने ‘मजबूत मैट्रोपॉलिटन गवर्नैंस, अनुमानित प्रवर्तन और एक भरोसेमंद नागरिक समझौता, जो नागरिकों और राज्य के बीच प्रोत्साहन को संरेखित करता है’ की सलाह दी। शहरों को बेहतर वित्त के साथ सशक्त बनाने की भी जरूरत होगी...।

वित्त मंत्री का अपने मुख्य सलाहकार के प्रति जवाब गैर-बौद्धिक और टालमटोल वाला था। अपने 85 मिनट के भाषण में, उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति या राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ और जबरदस्ती के लेन-देन वाले सौदों के जरिए विश्व अर्थव्यवस्था पर दोतरफा हमले पर कोई टिप्पणी नहीं की। उन्होंने वैश्विक उथल-पुथल या चीन के आर्थिक विस्तार या किसी अन्य मामले पर टिप्पणी नहीं की, जिसकी उम्मीद जानकार लोग बजट भाषण में करते।  मेरा उदारवादी विचार यह है कि वित्त मंत्री और सरकार को आर्थिक सर्वेक्षण की परवाह नहीं है। अनुदारवादी विचार यह है कि वे सोचते हैं कि हम ऐसे ग्रह पर रह रहे हैं जो सौर मंडल का हिस्सा नहीं है। मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि वित्त मंत्री ने सरकार की उन नीतियों के बारे में बताना जरूरी नहीं समझा, जो धीमी विकास दर, गरीबी और बढ़ती असमानता, रुके हुए निवेश, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, कल्याण की अनदेखी, रुपए के मूल्य में गिरावट और इंफ्रास्ट्रक्चर और जरूरी सेवाओं की मांग और आपूर्ति के बीच बड़े अंतर जैसी चिंताओं को दूर करेंगी।

अकाऊंटैंट के टैस्ट में फेल : आम अकाऊंटिंग स्टैंडर्ड के हिसाब से भी, वित्त मंत्री का फाइनांशियल मैनेजमैंट का रिकॉर्ड खराब था। 2025-26 के बजट आबंटन में ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और कई अन्य मंत्रालयों के खर्च में भारी कटौती की गई। श्री शिवराज चौहान के कार्यकाल में, कृषि और ग्रामीण विकास में 60,052 करोड़ रुपए की कटौती की गई। जल जीवन मिशन के लिए 67,000 करोड़ रुपए आबंटित किए गए थे लेकिन संशोधित अनुमान में पाया गया कि केवल 17,000 करोड़ रुपए ही खर्च किए गए थे। पूंजीगत व्यय 2024-25 में जी.डी.पी. के 3.2 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 3.1 प्रतिशत हो गया। रक्षा व्यय जी.डी.पी. के 1.6 प्रतिशत (कुल व्यय का 11.4 प्रतिशत) के निचले स्तर पर आ गया और 2026-27 में इसके जी.डी.पी. के 1.5 प्रतिशत (कुल व्यय का 11.1 प्रतिशत) तक गिरने का खतरा है।

जानकारी एक्सपर्ट ने बजट भाषण की कड़ी आलोचना की है। डा. सुरजीत भल्ला ने ‘चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ होने पर खुद की तारीफ करने का मजाक उड़ाया। डा. सी. रंगराजन ने राजकोषीय मजबूती की धीमी गति पर सवाल उठाया। डा. अशोक गुलाटी ने कृषि क्षेत्र के बड़े हिस्सों की अनदेखी पर दुख जताया। प्रोफैसर रोहित लांबा (कॉर्नेल यूनिवॢसटी) ने बजट का मजाक उड़ाते हुए कहा कि यह ऐसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए है, जो किसी प्लान की तलाश में है। वित्त मंत्री ने अपने सुनने वालों पर स्कीम्स, प्रोग्राम्स, मिशन्स, संस्थानों, पहलों, फंड्स, कमेटियों वगैरह की बौछार कर दी। मैंने कम से कम 24 गिने। उन्हें जल्द ही पता चलेगा कि इनमें से कई घोषणाओं के लिए कोई पैसा आबंटित नहीं किया गया था!-पी. चिदम्बरम


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