सुप्रीम कोर्ट का ‘निर्णय’ तथा वास्तविकता

2020-01-19T02:18:50.257

 जम्मू -कश्मीर चार अगस्त 2019 की शाम को बंद हो गया। उस रात्रि को मानवीय अधिकारों पर चोट पहुंचाई गई। गवर्नर, सलाहकार, प्रमुख सचिव, डी.जी.पी. इत्यादि की टीम ने कार्यभार सम्भाला जिनके पास भारतीय संविधान के लिए तुच्छ आदर था। 4 अगस्त 2019 को घाटी में मोबाइल फोन नैटवर्क, इंटरनैट सेवाएं तथा लैंडलाइन फोन बंद कर दिए गए। गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिए गए। 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति ने संवैधानिक आदेश 272 जारी किया जिसके तहत जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा वापस लेने के बाद भारतीय संविधान के सभी प्रावधानों को प्रस्तावित केन्द्र शासित प्रदेशोंपर लागू कर दिया। उसी दिन डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ने धारा144 लागू कर दी तथा साथ ही लोगों के एकत्रितहोने तथा उनकी गतिविधियों पर रोक लगा दी। सैंकड़ों कीतादाद में राजनीतिक नेता तथा कार्यकत्र्ता हिरासतमेंले लिए गए। 3 पूर्व मुख्यमंत्री भी हिरासत में ले लिए गए जो अभी तक बिना किन्हीं आरोपों के हिरासत में हैं। 

कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी सम्पादक अनुराधा भसीन, कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद तथा अन्यों ने इन पाबंदियों के खिलाफ चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। यह कहते हुए कि याचिकाकत्र्ताओं के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है, भसीन ने यह भी तर्क दिया कि वह अपना समाचार पत्र प्रकाशित करने में असमर्थ हैं तथा प्रैस की आजादी की अवहेलना की जा रही है। 16 सितम्बर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार द्वारा  राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए तथा आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर कश्मीर में आम जनजीवन को बहाल करने के प्रयासों को यकीनी बनाया जाए। जैसा डर था वैसा ही हुआ। आम जनजीवन की बहाली न हो पाई। 10 अक्तूबर 2019 को कोर्ट ने केन्द्रीय सरकार की प्रस्तुति को रिकार्ड किया। जिसमें कहा गया कि कुछ पाबंदियों में ढील दी गई है। प्रभावी रूप से हालांकि वहां पर कोई भी अंतरिम आदेश नहीं था कि केन्द्र तथा राज्य सरकारें उसकी पालना करें। जम्मू-कश्मीर में हालात वैसे ही रहे। 

मुद्दे तथा जवाब 
कई दिनों तक मामलों की सुनवाई होती रही, 27 नवम्बर 2019 को फैसला सुरक्षित रखा गया और 10 जनवरी 2020 को निर्णय किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 5 मुद्दों का निर्माण किया। यहां पर मैं इन मुद्दों के बारे में थोड़ा बताता हूं कि कोर्ट ने इसके जवाब में क्या कहा। 
1. क्या सरकार धारा 144 के अंतर्गत आदेशों को प्रस्तुत करने से छूट का दावा करती है। 
उत्तर : नहीं। 
2. इंटरनैट मौलिक अधिकारों के ऊपर क्या बोलने की तथा व्यापार को चलाने की आजादी है? 
उत्तर : हां। आर्टिकल 19 (1)(ए) तथा (जी) क्रमश: तथा इंटरनैट को बंद करने संबंधी प्रत्येक आदेशों की 7 दिनों के भीतर समीक्षा की जाएगी। 
3. क्या इंटरनैट तक पहुंच बना पाना एक मौलिक अधिकार है। इसके बारे में जवाब नहीं मिला। 
4. क्या धारा 144 के अंतर्गत पाबंदियां वैध हैं। 
उत्तर : यह कहने के बाद कि शक्ति निवारक तथा उपचारी है। समानता के सिद्धांत के ऊपर आधारित अधिकारों तथा पाबंदियों  के बीच संतुलन बनाया जाए तथा बार-बार आने वाले आदेश पास नहीं हो सकते। कोर्ट ने राज्य तथा प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि निरंतरता हेतु तत्काल रूप से समीक्षा की जाए। 
5. क्या प्रैस की आजादी का हनन हुआ?
उत्तर : ‘चिलिंग इफैक्ट’ के सिद्धांत को जांचने 
के बाद विचार किया गया कि समाचारपत्र ने अपना प्रकाशन शुरू कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में और विचार नहीं कर सकते और इसमें लिप्त नहीं होना चाहते। जिम्मेदार सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि सभी समय के दौरान प्रैस की आजादी का सम्मान किया जाए। 

स्वाधीनता तथा सुरक्षा के बीच संतुलन
कोर्ट के निर्णय तथा कुछ मुद्दों पर निर्णय प्रस्तुत करने पर अनिच्छा चौंका देने वाली बात नहीं। इस निर्णय की शुरूआत में सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख यह कहते हुए स्पष्ट कर दिया कि सुरक्षा चिंताओं तथा आजादी के बीच समन्वय बनाने के लिए हमारे पास सीमित क्षेत्र है। हम यहां पर यह यकीनी बनाना चाहते हैं कि नागरिकों को सभी अधिकार तथा आजादी उपलब्ध करवाई जाए तथा उसी समय सुरक्षा भी यकीनी बनाई जाए। 4 अगस्त 2019 से लेकर 13 जनवरी 2020 के दरमियान जब सरकार आम जनजीवन को स्थापित कर रही थी उस समय 20 नागरिक तथा 36 आतंकी मारे गए। इसके साथ-साथ 8 सुरक्षा अधिकारियों ने भी अपने जीवन से हाथ धो दिया। इंटरनैट,आम गतिविधियों, लोगों के इकट्ठा होने, राजनीतिक गतिविधियों, बोलने तथा लिखने पर तथा कश्मीर घाटी में पर्यटकों की आवाजाही पर पाबंदियां जारी हैं। राजनीतिज्ञों की हिरासत बिना किसी अपराध के जारी है। क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी वहां कुछ बदला है? 

अमरीका के बैंजामिन फ्रैंकलिन ने एक बार कहा, ‘जो लोग अस्थायी तथा थोड़ी सी सुरक्षा को खरीदने के लिए जरूरी स्वाधीनता को छोड़ देंगे, वे न तो स्वाधीनता और न ही सुरक्षा के लायक हैं।’ यह प्रसंग अलग था, फिर भी बैंजामिन का उक्त कोट उस समय उत्कृष्ट बन गया जब कभी स्वाधीनता तथा सुरक्षा के बीच संघर्ष पैदा हो गया। क्या निष्कर्ष कुछ अलग होते यदि कोर्ट ने बैंजामिन फ्रैंकलिन के इस सिद्धांत का मार्गदर्शन किया होता? 

क्या कुछ भी बदल पाएगा
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सरकार को कश्मीर मसले पर अपने सत्तावादी तथा सेनावादी दृष्टिकोण से वापसी का रास्ता देना चाहता है। मगर मुझे शंका है कि सरकार उस रास्ते पर चलेगी। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने घाटी के 70 लाख लोगों में एक उम्मीद की किरण जगाई है कि उनके अधिकारों तथा आजादी को बहाल किया जाएगा। मगर निर्णय आने के इतने दिनों बाद भी ऐसा कोई संकेत दिखाई नहीं दिया। प्रतिवादी (केन्द्र तथा केेन्द्रीय शासित प्रदेश सरकारें) नाखुश हैं क्योंकि उनकी कार्रवाइयों की निरंतर तौर पर न्यायिक समीक्षा की जाएगी। प्रतिवादी इसलिए भी नाखुश हैं कि उनको कोई राहत नहीं मिली। कोर्ट द्वारा और कुछ भी किया जाना सम्भव हो सकता था जैसा कि प्राइवेसी केस (जस्टिस पुट्टास्वामी) मामले में हुआ। मौका गंवा दिया गया। इस मामले की अगली सुनवाई पर और ज्यादा कुछ किए जाने की सम्भावना है। (आप शर्त लगा सकते हैं कि अवमानना की कार्रवाई होगी)। कई बार कानून निराश भी कर देता है।-पी. चिदम्बरम


Pardeep

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