छात्र पढ़ने निकले हैं, जान गंवाने नहीं
punjabkesari.in Wednesday, Sep 09, 2026 - 04:00 AM (IST)
घर से निकलते समय किसी मां ने बेटे से कहा होगा, पढ़ाई पर ध्यान देना। किसी पिता ने जेब में कुछ रुपए रखते हुए कहा होगा कि चिंता मत करना, कुछ बन जाना। किसी परिवार ने स्टेशन तक छोड़ते हुए बस इतना कहा होगा कि अपना ख्याल रखना। देश के छोटे शहरों और गांवों से बच्चे दिल्ली इसी भरोसे के साथ आते हैं। कोई डॉक्टर बनने, कोई इंजीनियर, कोई अफसर और कोई बस इतना चाहता है कि पढ़ लिखकर अपने घर की हालत बदल सके। लेकिन दिल्ली आने के बाद उनकी सुरक्षा का ध्यान कौन रखता है, इसका जवाब दिल्ली में सत्य निकेतन के मलबे में दबे 7 लोगों की मौत ने फिर मांग लिया है। मृतकों में 5 छात्र थे। इनके पीछे ऐसे घर हैं जहां अब एक कमरा खाली रहेगा। किताबें होंगी, बैग होंगे, फोन होंगे और ऐसे माता-पिता होंगे, जो शायद आखिरी बातचीत को बार-बार याद करेंगे। जिस उम्र में भविष्य की योजना बनती है, उस उम्र में इन घरों की दीवारों पर तस्वीरें लग गईं।
प्रारंभिक जांच में इमारत की उम्र, उसकी संरचनात्मक स्थिति और बेसमैंट में चल रहे काम को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। इमारत के मालिक और उनके परिवार के सदस्यों की गिरफ्तारी हुई है तथा नगर निगम के 5 अधिकारियों को निलंबित किया गया है। लेकिन इमारत गिरने से पहले उसकी हालत किसने देखी? उसमें दर्जनों छात्र रह रहे थे तो सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? नियम थे तो उनका पालन किसने सुनिश्चित किया? और यदि नियमों का पालन नहीं हो रहा था तो यह कारोबार चलने कैसे दिया गया? यह पहली घटना नहीं है। कुछ महीने पहले सैदुलाजाब में पांच मंजिला इमारत गिरने से 6 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 5 छात्र थे। इसके पहले जुलाई 2024 में राजेंद्र नगर स्थित राऊज आई.ए.एस. स्टडी सर्किल के बेसमैंट में पानी भरने से 3 सिविल सेवा अभ्यर्थियों की जान चली गई। बाद में सामने आया कि हादसे से पहले बेसमैंट के उपयोग और संभावित दुर्घटना को लेकर शिकायत भी की गई थी।
जून 2023 में मुखर्जी नगर के एक कोचिंग केंद्र में आग लगी तो करीब 250 छात्र इमारत में फंसे थे। जान बचाने के लिए छात्रों को खिड़कियों, रस्सियों और तारों का सहारा लेना पड़ा। 61 लोगों को अस्पताल पहुंचाया गया। अप्रैल 2024 में कोटा के एक छात्रावास में आग लगने से 8 छात्र घायल हुए और जांच में अग्नि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर कमियां सामने आईं। हादसे अलग-अलग शहरों में हुए लेकिन कहानी एक ही है। खतरा पहले मौजूद था, कार्रवाई बाद में हुई। यही उस व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है जिसमें छात्र शहर की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बन जाता है लेकिन शहर की प्राथमिकताओं में उसकी सुरक्षा पीछे छूट जाती है। दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके आसपास के क्षेत्रों में बाहर से आने वाले विद्यार्थियों की बड़ी संख्या है, जबकि संस्थागत छात्रावास क्षमता सीमित है। परिणाम यह होता है कि हजारों विद्यार्थियों को निजी पी.जी. और किराए के कमरों का सहारा लेना पड़ता है। सत्य निकेतन, मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर जैसे इलाके इसी जरूरत से विकसित हुए हैं। जरूरत ने बाजार बनाया और बाजार ने जगह को कमाई की वस्तु में बदल दिया। एक कमरे में अधिक बिस्तर। पुरानी इमारत में बदलाव। बेसमैंट का अलग उपयोग। सुरक्षा पर खर्च कम करने की कोशिश। निरीक्षण में ढिलाई।
यही वह शृंखला है, जिसके अंत में किसी दिन कोई इमारत गिरती है। तब उसे हादसा कहा जाता है। लेकिन हर मौत हादसा नहीं होती। कई मौतों की शुरुआत उस दिन हो जाती है जब पहली दरार को नजरअंदाज किया जाता है। जब अवैध निर्माण को चलने दिया जाता है। जब अग्नि सुरक्षा कागजों तक सीमित रहती है। जब बेसमैंट का इस्तेमाल उसके निर्धारित उद्देश्य के विपरीत होता है। जब निरीक्षण का अर्थ केवल फाइल पर हस्ताक्षर रह जाता है। व्यवस्था का काम इमारत गिरने से पहले खतरे को पहचानना है। सरकार का काम केवल मुआवजा देना नहीं है। उसका काम ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें मुआवजे की जरूरत ही न पड़े। नगर निगम का काम हादसे के बाद नोटिस लगाना नहीं है। उसे यह देखना है कि जिन इमारतों में दर्जनों बच्चे रह रहे हैं, वे रहने लायक भी हैं या नहीं। विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी भी यहीं समाप्त नहीं हो जाती। छात्रावास क्षमता बढ़ाने, निजी छात्र आवासों के लिए कठोर और नियमित सुरक्षा मानक बनाने तथा स्वतंत्र संरचनात्मक जांच की व्यवस्था अब टाली नहीं जा सकती।
हमारे शहरों में प्राथमिकताओं का अंतर भी दिखाई देता है। सत्ता और प्रशासन के लिए सुरक्षित भवन, चौड़े परिसर और व्यापक सुविधाएं स्वाभाविक मानी जाती हैं। लेकिन पढऩे आए छात्र के हिस्से में अक्सर संकरी गली, भरी हुई सीढ़ी और किराए का छोटा कमरा आता है। यह केवल जमीन या पैसे का प्रश्न नहीं है। यह प्राथमिकता का प्रश्न है। हम बच्चों को देश का भविष्य कहते हैं। लेकिन भविष्य की बात करने से पहले उनके वर्तमान को सुरक्षित करना होगा। वह बच्चा किसी कोचिंग का ग्राहक भर नहीं है। वह किसी पी.जी. मालिक की मासिक आय का आंकड़ा नहीं है। वह एक नागरिक है और उसकी जान की कीमत उतनी ही है जितनी किसी भी दूसरे नागरिक की। व्यवस्था की सफलता निलंबन की संख्या से नहीं मापी जाएगी। उसकी सफलता इस बात से मापी जाएगी कि अगला छात्र सुरक्षित अपने कमरे तक पहुंचता है या नहीं। घर से निकलते समय माता पिता कहते हैं, अपना ख्याल रखना। लेकिन अब यह सवाल शहर और व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए कि घर से निकलने के बाद उस बच्चे का ख्याल कौन रखेगा। क्योंकि बच्चे पढऩे निकले हैं, जान गंवाने नहीं।-प्रभात पांडेय
