अभी भी हमारा समाज वहमों-भ्रमों व सामाजिक कुरीतियों से मुक्त नहीं

punjabkesari.in Monday, May 16, 2022 - 05:14 AM (IST)

हमें अपने इतिहास पर गर्व करने का अधिकार है जिसके पन्नों पर महापुरुषों, समाज सुधारकों, मानवीय सरोकारों को संबोधित दार्शनिकों के अनमोल विचार उकेरे हुए हैं। चाहे दुनिया के हर हिस्से में महान लोगों द्वारा वहां की परिस्थितियों के अनुकूल मानवता के भले तथा सामाजिक विकास के लिए डाले गए योगदान तथा इस उपलक्ष्य में की गई बेमिसाल कुर्बानियों की अपनी-अपनी गाथा है, परन्तु अनेक पक्षों से भारतीय इतिहास का अतीत एक विलक्षण तथा गौरवमयी हैसियत का मालिक है। सदियों से विभिन्न धर्मों, रंगों, जातियों में बंटे लोगों की जिंदगी माला के मनकों की तरह एक-दूसरे के साथ जुड़े रूप में है। 

इस गौरवमयी विशेषता के कारण ही हमने अंग्रेजी साम्राज्य जैसे शक्तिशाली तथा जुल्मी शासकों की गुलामी के बोझ को उतार कर आजादी प्राप्त की है। आजादी के बाद के वर्षों के दौरान सभी कमियों के बावजूद हमने आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में विकास की बड़ी छलांगें लगाई हैं। पड़ोसी देशों के मुकाबले लोकतांत्रिक ढांचा कायम रखना तथा किसी भी सरकारी परिवर्तन के अवसर पर संवैधानिक विधि से सत्ता परिवर्तन हमारी बड़ी उपलब्धि कही जानी चाहिए। पड़ोसी देश पाकिस्तान के लोग इन विशेषताओं से आमतौर पर महरूम रहे हैं। 

मगर यदि तस्वीर का दूसरा पहलू देखें तो अधिकतर काफी फिक्र तथा शर्मिंदगी भी कल्पना को घेर लेती है। विज्ञान के क्षेत्र में हुए अनंत विकास के बावजूद अभी भी हमारा समाज वहमों-भ्रमों तथा सामाजिक कुरीतियों से मुक्त नहीं है। बच्चा प्राप्त करने की इच्छा के तहत दूसरे के बच्चों को मार देने की घटनाएं तथा तांत्रिकों के जाल में फंस कर अपने निजी हितों की पूर्ति के लिए किए जाते अनेक कुकर्मों को देखकर कई बार लगता है कि हमने अभी भी मध्य युग के अंधेरे काल को पार नहीं किया है। धर्मों के कथित ठेकेदारों द्वारा आस्था के नाम पर अपने अनुयायियों को किस्मतवादी तथा अंधविश्वासी बनाने के साथ-साथ ऐसी व्यभिचारी कार्रवाइयां की जाती हैं जिन्हें देखकर शर्मिंदगी से सिर नीचा हो जाता है। ऐसे कुकर्मों के कारण दोषियों को अदालत द्वारा सख्त सजाएं देने के बावजूद उनके ‘अंध भक्तों’ की संख्या कम नहीं होती। 

राजपाट पर विराजमान सज्जन तथा भ्रष्ट लोगों का बड़ा हिस्सा ऐसे गुनहगार ‘धर्म गुरुओं’ की हाजरियां भर कर उनके रुतबे को बढ़ाने में मददगार बन रहा है। सभी धर्मों के प्रमुख या सम्माननीय नेता बार-बार आह्वान करते हैं कि परमात्मा एक है। मगर अगली ही सांस में दूसरे धर्मों के लोगों के विरुद्ध इतनी ऊल-जुलूल तोहमतें लगाकर साम्प्रदायिक जहर उगलते हैं जिससे सुनने वाले लोगों के मनों में मानवीय संवेदना, सेवाभाव, नम्रता तथा एक-दूसरे का भला सोचने का विचार आने की बजाय नफरत रूपी बम फट उठता है। इस उत्तेजना में वे दूसरे धर्म के अनुयायियों को कत्ल करना अपनी शान समझते हुए खुद को रब्बी हुक्मों की पालना करने वाले ‘योद्धा’ समझने लग पड़ते हैं। ऐसे कड़वे तथा नफरतपूर्ण बोल बोलने वाले ‘शरारती लोगों’ की गिनती बढ़ती जा रही है क्योंकि उन्हें सरकारी संरक्षण प्राप्त होता है। 

एक धर्म के बोलों-कुबोलों से परेशान होकर धार्मिक अल्पसंख्यक लोग डर कर जीवन बसर कर रहे हैं। एक-दूसरे की खाने-पीने की आदतें, पहरावा तथा रीति-रिवाजों को मर्जी से मनाने की छूट के प्रति सार्थक, सहयोग भरा तथा प्यार-मोहब्बत वाला रवैया अतीत की बात बनता जा रहा है और असहनशीलता, नफरत, अनावश्यक मुकाबलेबाजी तथा हिंसक कार्रवाइयों का बाजार गर्म होता जा रहा है। विज्ञान के युग में हर धर्म में ऐसे लोग मौजूद हैं जो धार्मिक परम्पराओं, विश्वासों तथा मिथकों की शिक्षा देकर अपनी युवा पीढ़ी को ‘गैर-वैज्ञानिक’ बनाने की दौड़ में मस्त हैं। 

ऐसे हालातों में राजनीति को एक धंधा समझने तथा लूट-खसूट का निजाम कायम रखने की समर्थक राजनीतिक पार्टियां समाज में मौजूद बहुपक्षीय बुराइयों को दूर करने के लिए ठोस तथा सार्थक आर्थिक नीतियों पर अमल करने में पूरी तरह असफल सिद्ध हो रही हैं। जब शासक दल, पुलिस तथा अफसरशाही का दुरुपयोग अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए करने को प्राथमिकता देने व कानून की जगह ‘शासकों के हुक्मों’ का राज चले तो ऐसे समय यू.पी. में किसी महिला के साथ गैर-सामाजिक तत्वों द्वारा और बाद में हुए वर्दीधारी ‘रखवाले’ द्वारा बलात्कार करने की हृदयविदारक घटना बारे सोचने का किसके पास खाली समय हो सकता है। 

भारत में शायद यह पहली बार देखने में आया है कि किसी अपराध होने के तुरन्त बाद बिना किसी कानूनी या अदालती कार्रवाई के केवल मुख्यमंत्री के आदेशों पर पहले ही काल्पनिक दोषियों के घरों को बुलडोजर से मिट्टी में मिला दिया जाए। पुलिस तथा सरकारी एजैंसियों का विरोधियों के खिलाफ दुरुपयोग कुछ हद तक तो शासक पक्षों की खुशियों तथा मुनाफाबख्श धंधे में वृद्धि कर सकता है मगर शीघ्र ही यह सारे देश को अराजकता की लपेट में लेकर भस्म कर सकता है। 

कितना अच्छा हो यदि सभी धर्मों के लोग मिल-जुल कर देश के संतुलित आर्थिक विकास की दिशा बारे सोचें, जहां सभी को रोटी, रोजी, मकान, कपड़ा, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा तथा सामाजिक सुरक्षा मिले। किसी बच्ची का बलात्कार न हो। दलित भाईचारा जात-पात के बंधन से मुक्ति हासिल करके स्वाभिमान से जिंदगी बसर करे। महिलाओं तथा पुरुषों को बराबर का रुतबा हासिल हो तथा इससे आगे मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों तथा गिरिजा घरों से एक-दूसरे के साथ प्रेम-प्यार से रहने की मीठी आवाजें सुनाई दें। 

कुछ लोग, जिन्होंने दिखावे के लिए धार्मिक चिन्ह अपनाए हुए हैं, वे तो जरूर इस सद्भावनापूर्ण माहौल से परेशान होंगे मगर सारा समाज अवांछित मुद्दों से छुटकारा प्राप्त करके हक-सच की लड़ाई लड़ता हुआ एक ‘स्वर्गनुमा’ देश की स्थापना की ओर आगे बढ़ेगा। आपसी फूट तथा नफरत का शिकार देश बेशक मजबूत होने के जितने दावे करता रहे, उन आंतरिक तथा बाहरी दुश्मनों का सफलतापूर्वक मुकाबला नहीं कर सकता जो देश को पुन: साम्राज्यवादी गुलामी तथा साम्प्रदायिकता की जंजीरों में बांधने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे।-मंगत राम पासला


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