स्पेन दुनिया को रोजगार दे रहा, भारत अपने लोगों को क्यों नहीं?
punjabkesari.in Tuesday, Jul 07, 2026 - 05:44 AM (IST)
दुनिया भर में प्रवासन आज सबसे अधिक चॢचत विषयों में से एक है। एक समय था जब विकसित देश प्रवासियों का खुले दिल से स्वागत करते थे लेकिन अब स्थिति बदल रही है। यूरोप, अमरीका और अन्य विकसित देशों में प्रवासियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इसके बावजूद यूरोप का एक देश स्पेन इस प्रवृत्ति के विपरीत दिशा में आगे बढ़ रहा है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने प्रवासियों को आॢथक विकास का साधन माना है और बड़ी संख्या में विदेशी कामगारों को देश में आने की अनुमति दी है। यही कारण है कि आज स्पेन यूरोप की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। दूसरी ओर भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश होने के बावजूद अपने सभी नागरिकों को पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती से जूझ रहा है।
स्पेन में जन्मदर बेहद कम है और प्रति महिला औसतन केवल 1.2 बच्चे पैदा हो रहे हैं, जो जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए आवश्यक 2.1 की दर से बहुत कम है। इसके साथ ही हर वर्ष लगभग 1 लाख लोग सेवानिवृत्त हो जाते हैं, जिससे श्रम बाजार में बड़ी संख्या में रिक्तियां पैदा होती हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए स्पेन ने प्रवासियों को अवसर देना शुरू किया। वर्ष 2022 में लगभग 6.65 लाख विदेशी स्पेन पहुंचे। आज स्थिति यह है कि 2000 में जहां हर 20वां व्यक्ति विदेशी मूल का था, वहीं अब लगभग हर 5वां व्यक्ति विदेशी मूल का है।
स्पेन की सरकार ने हाल के वर्षों में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों को कानूनी दर्जा देने के लिए ‘एमनैस्टी’ अथवा नियमितीकरण योजना भी शुरू की है। इसका उद्देश्य श्रम बाजार की जरूरतों को पूरा करना और आॢथक गतिविधियों को गति देना है। परिणामस्वरूप यूरोप में 2020 के बाद पैदा हुए हर 4 नए रोजगारों में से लगभग 1 स्पेन में पैदा हुआ। स्पेन में हाल के वर्षों में सृजित नौकरियों में लगभग 70 प्रतिशत नौकरियां प्रवासियों को मिली हैं।
विदेशों में रहने वाले भारतीयों की संख्या लगभग 1.8 करोड़ है, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। यह आंकड़ा भारत की मानव संसाधन क्षमता को दर्शाता है लेकिन साथ ही यह भी संकेत देता है कि बड़ी संख्या में भारतीय बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश जा रहे हैं।भारत और स्पेन की तुलना करने पर सबसे बड़ा अंतर जनसंख्या संरचना का दिखाई देता है। भारत की आबादी 140 करोड़ से अधिक है और इसकी लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग में आती है। इसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ कहा जाता है। इसके विपरीत स्पेन वृद्ध होती आबादी की समस्या से जूझ रहा है। जहां स्पेन को कामगारों की कमी है, वहीं भारत के सामने पर्याप्त रोजगार सृजित करने की चुनौती है।
भारत में रोजगार की समस्या के कई कारण हैं। पहला कारण कौशल और उद्योग की आवश्यकता के बीच अंतर है। बड़ी संख्या में युवा डिग्री प्राप्त कर रहे हैं लेकिन उद्योगों को जिन तकनीकी और व्यावहारिक कौशलों की आवश्यकता है, वे अक्सर उपलब्ध नहीं होते। दूसरा कारण विनिर्माण क्षेत्र का अपेक्षाकृत धीमा विस्तार है। चीन ने करोड़ों लोगों को रोजगार देने के लिए विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाया, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक सेवा क्षेत्र आधारित रही है। तीसरा कारण कृषि पर अत्यधिक निर्भरता है। आज भी बड़ी संख्या में लोग कृषि में लगे हुए हैं, जबकि कृषि की आय सीमित है। चौथा कारण छोटे और मध्यम उद्योगों को पर्याप्त वित्त, तकनीक और बाजार न मिल पाना है।
स्पेन की सफलता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने श्रम की कमी को अवसर में बदल दिया। भारत के पास इसके विपरीत श्रम की प्रचुरता है, जिसे आॢथक शक्ति में बदलने की आवश्यकता है। भारत यदि अगले 2 दशकों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करना चाहता है तो उसे विनिर्माण, हरित ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और कृषि आधारित उद्योगों पर विशेष ध्यान देना होगा। भारत में रोजगार सृजन के लिए सबसे पहले श्रम-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। वस्त्र, चमड़ा, खिलौने, खाद्य प्रसंस्करण, इलैक्ट्रॉनिक्स असैंबली और फर्नीचर जैसे क्षेत्रों में लाखों रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। दूसरा, कौशल विकास को उद्योगों की वास्तविक जरूरतों से जोडऩा होगा। तीसरा, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को सस्ता ऋण, सरल नियम और बेहतर बाजार उपलब्ध कराना होगा, क्योंकि भारत में रोजगार का बड़ा हिस्सा इन्हीं उद्योगों से आता है।
चौथा, ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित उद्योगों का विस्तार करना होगा। यदि फल, सब्जी, डेयरी, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा मिले तो ग्रामीण युवाओं को अपने क्षेत्र में ही रोजगार मिल सकता है। 5वां, पर्यटन क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक विविधता दुनिया में अद्वितीय है। इससे करोड़ों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं। छठा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और कृत्रिम बुद्धिमता के युग में भारत को वैश्विक सेवा केंद्र के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करनी होगी। सूचना प्रौद्योगिकी, डाटा विश्लेषण, साइबर सुरक्षा, ऑनलाइन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में भारत विश्व स्तर पर रोजगार और सेवाएं उपलब्ध करा सकता है। सातवां, महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ाना भी आवश्यक है, जिससे आॢथक विकास की गति और तेज हो सकती है।
स्पेन की तुलना में भारत की चुनौती कहीं अधिक बड़ी और जटिल है। फिर भी, भारत के पास युवा शक्ति, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता और उद्यमिता जैसी अनेक ताकतें हैं। भविष्य की दृष्टि से देखा जाए तो भारत केवल अपने नागरिकों को ही नहीं, बल्कि अन्य देशों के लोगों को भी रोजगार देने की क्षमता विकसित कर सकता है। इसके लिए उच्च आॢथक वृद्धि, मजबूत विनिर्माण आधार, वैश्विक निवेश आकॢषत करने वाली नीतियां और विश्व स्तरीय कौशल विकास प्रणाली आवश्यक होगी। यही वह लक्ष्य है जो भारत को आने वाले वर्षों में वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जा सकता है।-दीपक कुमार शर्मा
