ईरान पर चुप्पी हमें शर्मसार करेगी

punjabkesari.in Wednesday, Mar 04, 2026 - 04:12 AM (IST)

‘आप सुनिए मेरी बात। नैतिकता, आदर्श, सिद्धांत ये सब अपने घर-समाज के नियम हैं। विदेश नीति इनसे नहीं चलती है। वहां हर कोई अपना राष्ट्रीय हित साधने आता है। हमें भी यही करना होगा। यही हमारी सरकार कर रही है। आप खामखा उपदेश मत दीजिए।’ फिर अपने लहजे को हल्का करने की नीयत से मुस्कुराए और बोले, ‘आपको वो गाना याद है, कसमे वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या? कोई किसी का नहीं है, झूठे नाते हैं नातों का क्या।’

बातचीत शुरू ऐसे नहीं हुई थी। हम फिर पार्क में मिले थे। जैसा जमाने का दस्तूर है, चर्चा खेल और युद्ध पर चल रही थी। टी-20 पर चर्चा ऐसी, मानो खेल नहीं युद्ध चल रहा हो। और ईरान पर हमले और जवाबी हमले की चर्चा ऐसी मानो युद्ध नहीं खेल चल रहा हो। मिसाइल और लाशों को रन और विकेट की तरह गिना जा रहा था। हर हिंदुस्तानी कानून, देसी दवा और क्रिकेट के साथ-साथ अब सामरिक विषयों का एक्सपर्ट भी बन गया था। बुमराह को स्विंग और यॉर्कर सिखाने वाले एक्सपर्ट अब ट्रम्प को हवाई युद्ध और पश्चिम एशिया को कूटनीति सिखा रहे थे। ईरान की तबाही और तेल के दाम पर निरपेक्ष भाव से चर्चा चल रही थी, जैसे मैच से पहले पिच की समीक्षा हो रही हो। भारत के विकल्पों पर चर्चा हो रही थी।

मेरे बोलने में जरूर कुछ तल्खी रही होगी। मैंने कहा, जरा एक मिनट के लिए सोचिए, अगर ईरान की जगह हम होते और अगर कोई ऐसी बातचीत कर रहा होता तो हमें कैसे लगता? आखिर किसी की बर्बादी पर हम इतनी चटपटी चर्चा कैसे कर सकते हैं? उन्हें बात नागवार गुजरी थी। हम ईरान की तुलना भारत से कैसे कर सकते हैं? वहां इस्लामी चरमपंथी मुल्लाओं का राज है। जनता उस तानाशाही से मुक्ति चाहती है। यूं भी ईरान ने अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी की नाक में दम कर रखा है। चोरी-छुपे एटम बम बना रहा है। उसे रोकना तो पड़ेगा न।
इस तरह के तर्क सुनकर मेरे कान पक चुके थे। अमरीका को ईरान के लोकतांत्रिक होने या न होने से रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता।

सच यह है कि ईरान के पहले लोकतंत्र को खत्म करने का काम 1953 में अमरीका की सी.आई.ए. ने किया था। अमरीका ने ही ईरान पर राजशाही लादी थी, जिसके खिलाफ वहां इस्लामी क्रांति हुई थी। और जो भी बोले, अमरीका तो इस सवाल पर न ही बोले। इसमें कोई शक नहीं कि वहां इस्लाम के नाम पर जो शासन चल रहा है, उससे जनता में भारी असंतोष है। हाल ही में जनता ने विद्रोह किया था, जिसे ईरान की सरकार ने बेरहमी से कुचल दिया था। लेकिन क्या इससे अमरीका को वहां दखलअंदाजी का हक मिल जाता है? अमरीका का जब मन आए वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण कर ले, जब चाहे ईरान के राष्ट्राध्यक्ष की हत्या कर दे। इसे हम कैसे देखते रह सकते हैं? मुझ जैसे लोगों को हमारी सरकार से लाख शिकायत है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि उसकी आड़ लेकर कोई विदेशी ताकत भारत की जनता को मुक्त करवाने के नाम पर भारत पर हमला कर दे। सीधी बात है-ट्रम्प को यह मंजूर नहीं कि ईरान उसके सामने सिर उठाकर चले। इसलिए उसने जोर-जबरदस्ती से वहां सत्तापलट करवाने की ठान ली है।

एटम बम की बात सरासर झूठ है। अमरीका का रक्षा मंत्रालय कबूल कर चुका है कि ईरान एटम बम बनाने से कोसों दूर है। पिछले साल ईरान पर हमला करने के बाद ट्रम्प ने खुद कहा था कि ईरान के एटमी कार्यक्रम को नेस्तनाबूद कर दिया गया है। ईरान और अमरीका के बीच मध्यस्थता करने वाले बहरीन के विदेश मंत्री ने साफ कहा है कि ईरान लिख कर देने को तैयार था कि वह अभी या भविष्य में कभी भी एटम बम नहीं बनाएगा। अगर अमरीका को चोरी-छुपे एटम बम की चिंता है तो उसे सबसे पहले इसराईल और पाकिस्तान पर हमला करना चाहिए, जिनके पास अवैध एटम बमों का जखीरा है। सच कहूं तो एटम बम रोकने की सारी बात ही पाखंडपूर्ण है। ख़ुद दसियों हजार एटम बम रखने वाला अमरीका किस मुंह से दूसरों को पहला बम बनाने से रोक सकता है?

कम से कम भारत तो इस पाखंड में शामिल न हो। जब तक हमारे एटम बम को दुनिया की मान्यता नहीं मिली थी, तब तक यही उपदेश हमें भी दिए जाते थे। और बाकी दुनिया को हम यही कहते थे-तुम कौन होते हो हमें सिखाने वाले। हमें तो ईरान के साथ खड़ा रहना चाहिए। कल तक हमारे प्रधानमंत्री ईरान और भारत के ऐतिहासिक संबंधों की दुहाई देते थे। पश्चिम एशिया के कुछेक देश जो आड़े वक्त हमारे काम आए थे, उनमें से ईरान एक है। चलिए खड़े होने की हिम्मत नहीं है तो कम से कम उनके राष्ट्राध्यक्ष की हत्या पर अफसोस तो जता सकते थे। इतना तो अमरीका की पिट्ठू पाकिस्तानी सरकार ने भी कह दिया। पता नहीं ट्रम्प के पास ऐसी क्या चाबी है कि मोदी जी सामान्य शिष्टाचार का बयान भी नहीं दे सकते। सच कहूं तो मुझे शर्म आती है। पहले हमारा देश गरीब था लेकिन सिर नहीं झुकाता था। अमरीका के सातवें बेड़े के सामने हमारी कोई ताक़त नहीं थी लेकिन इंदिरा गांधी अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन को दो-टूक जवाब दे सकती थी। क्या हो गया है हमारी दृष्टि और आदर्शों को?

बस मेरे मुंह से ‘आदर्श’ सुनते ही उन्होंने पलटवार किया था और ‘जंजीर’ का गीत याद दिलाया था। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। अब मेरी बारी थी- ‘‘जो परिवार और समाज में होता है वही दुनिया नामक परिवार में भी होता है। न घर सिर्फ नैतिकता और आदर्श से चलता है, न दुनिया बिल्कुल इनके बिना चल सकती है। नैतिकता नीति से अलग नहीं है। दीर्घकाल में राष्ट्रहित को हासिल करने के लिए ही सिद्धांत चाहिए। रही बात आदर्श की, उसे छोड़कर सबसे ज्यादा नुकसान हमारा ही होगा। अगर अमरीका को गुंडागर्दी की छूट मिल गई तो इसी छूट का इस्तेमाल कल चीन भी करेगा। चीन की नजर में पहले ताइवान का नंबर आएगा। और कौन जाने कभी हमारा नंबर भी आ सकता है। अगर आदर्श का दामन छोड़ देंगे तो कल हमारे साथ कौन खड़ा होगा? जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली दुनिया में अगर हम लाठी वाले की लल्लो-चप्पो करेंगे तो इज्जत तो जाएगी ही, एक दिन उसकी लाठी भी हमीं पर पड़ेगी।’’अनायास मुझे भी एक फिल्मी गीत की एक पंक्ति याद आ गई-‘बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता।’-योगेन्द्र यादव    


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