सत्य की बेला, भारतीय जनता पार्टी का धर्म प्रचार!!

2021-04-04T04:22:50.1

भारत संवैधानिक तौर पर धर्म-निरपेक्ष देश है तथा देश में पंजाब ही मात्र सिख बहुल राज्य है। फिर भी धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली कांग्रेस पार्टी 1947 के बाद हर बार एस.जी.पी.सी. चुनाव में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दखलअंदाजी करती रही। पंजाबी पूर्ण रूप में सरकारी भाषा आज भी नहीं है। इसके लिए कांग्रेस पार्टी की सरकारें ही जिम्मेदार हैं। पंजाबी सूबे के आंदोलन, ब्ल्यू स्टार आप्रेशन, दिल्ली तथा अन्य राज्यों के अंदर हुए सिखों के कत्लेआम के लिए कांग्रेस सरकारें ही जिम्मेदार हैं। मगर एस.जी.पी.सी. ने कभी भी उनके खिलाफ प्रस्ताव पास करवाने या हुकमनामा जारी करवाने की हिम्मत ही नहीं की। बेगुनाह सिखों के कत्लेआम के दोष के बावजूद भी कांग्रेस पंथ विरोधी नहीं। 

श्री दरबार साहिब अमृतसर के पवित्र सरोवर पर चावल की बुवाई करने की बात करने वाले कामरेड भी पंथ विरोधी नहीं हैं। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पावन स्वरूप की चोरी तथा बेअदबी करने और शांति से बाणी पढऩे वाले गुरसिखों पर गोली चलाने वाले भी पंथ विरोधी नहीं हैं। स. आत्मा सिंह पंजाब सरकार के मंत्री के तौर पर ‘मुल्लाकट’ पुलिस कर्मियों की ओर से सलामी नहीं लिया करते थे। सिख रैजीमैंट के जवान के लिए पूर्ण गुरसिख होना लाजिमी हैं। पुराने पुलिस अधिकारी भी दाढ़ी काटने को पूर्ण सिख बनने के लिए प्रेरित करते हैं। मगर अब तो ‘सिंह’ शब्द कागजों में ही है। मगर क्या इसके लिए भी अकाली सरकारें जिम्मेदारी से मुक्त हैं? 

अकाली सरकारों ने पूर्ण सिख अधिकारियों को पीछे रखा, सैनी तथा परमराज जैसों को आगे रखा। फिर भी वह पंथ परस्त ही हैं। पिछली 21 मार्च को  भाजपा की पंजाब राज्य कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। जिला गुरदासपुर का अध्यक्ष जो एक जमींदार सिख परिवार से संबंध रखता है, उठ कर खड़ा हुआ और शायद पहली बार उसने दस्तार सजाई थी। 

पंजाब भाजपा अध्यक्ष अश्विनी शर्मा जी ने उनको संबोधित कर कहा, ‘‘आज पहली बार पगड़ी बांध कर आए हो सुंदर  लग रहे हो। अब आगे भी दस्तार नहीं उतारनी तथा केश भी रख लो।’’ शर्मा जी का संबंध आर.एस.एस. से है। फिर सारे सदन को संबोधित करके उन्होंने कहा, ‘‘ओ सरदारां दे मुंडेयो तुहाणूं शर्म नहीं आऊंदी, साडे वांग पटे बनाई फिरदे ओ। सभी केश रख कर दस्तार सजाओ।’’ यह उनका अचेत मन तथा अंतर्रात्मा बोल रही थी। आज इस तरह का दूसरे धर्म के लोगों को अपने धर्म में परिपक्व होने की हिदायत देने की हिम्मत रखने वाला राजनीतिक नेता पंजाब में कम ही मिलेगा। 

पार्टी की पंजाब इकाई की बैठक पर लेखन सिर्फ गुरमुखी में होता है बाकी भाषाओं में अनुवाद बाद में होते हैं। यह शायद गुरु गोलवल्कर के आदेश के अनुसार ही है कि अगर महाराष्ट्र वाले मराठी बोलते और लिखते हैं तो पंजाबी क्यों पंजाबी भाषाई नहीं हैं? ये बातें तथ्यों पर आधारित हैं, काल्पनिक नहीं हैं। बैठकों में गुरुओं की महिमा तथा गुरबाणी का श्रवण किया जाता है। बाहर से आए बड़े नेताओं को देख ङ्क्षहदी बोलने की रिवायत नहीं है। वह पंजाबी खुद समझें यह उसका काम है। 
सिख धर्म की पनीरी पंजाबी हिंदू ही रहे हैं तथा खालसा उनकी इज्जत, धर्म तथा जान-माल के रक्षक हैं।-इकबाल सिंह लालपुरा
 


Content Writer

Pardeep

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