भारत के बाजार में गिरावट के कारण और समाधान

punjabkesari.in Tuesday, Nov 03, 2026 - 04:32 AM (IST)

 ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार, अक्तूबर में सुधार के बावजूद भारतीय शेयर आज उभरते बाजारों की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली परिसंपत्तियों में शुमार हैं। बैंचमार्क निफ्टी 50 इंडैक्स इस साल 12 प्रतिशत गिरा है (डॉलर के संदर्भ में 17 प्रतिशत)। प्रमुख उभरते बाजारों में केवल इंडोनेशियाई शेयरों का प्रदर्शन इससे भी बदतर रहा है, जहां मॉर्गन स्टेनली कैपिटल इंटरनैशनल (एम.एस.सी.आई.) द्वारा यह चेतावनी दिए जाने के बाद कि इंडोनेशिया अपना उभरते बाजार का दर्जा खो सकता है, बैंचमार्क आई.डी.एक्स. कंपोजिट इंडैक्स इस साल 42 प्रतिशत गिरा है (डॉलर के संदर्भ में 46 प्रतिशत)। भारतीय बाजारों में यह गिरावट आंशिक रूप से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफ.पी.आई.) द्वारा बड़े पैमाने पर की गई बिकवाली के कारण है, जिन्होंने इस साल अब तक भारतीय इक्विटी बाजारों से लगभग  3 ट्रिलियन रुपए निकाले हैं, जो कि एक दशक का उच्चतम स्तर है। इस पूंजी निकासी ने रुपए को कमजोर किया है और परिणामस्वरूप भारतीय इक्विटी से विदेशी निवेशकों को मिलने वाले डॉलर रिटर्न को कम कर दिया है।

इस मंदी के लिए कई प्रतिस्पर्धी व्याख्याएं मौजूद हैं। एक सिद्धांत देश में आॢटफिशियल इंटैलिजैंस (ए.आई.) कंपनियों की कमी की ओर इशारा करता है। चूंकि निवेशकों ने ए.आई. फर्मों और ए.आई. से जुड़े क्षेत्रों में भारी मात्रा में डॉलर लगाए हैं, इसलिए भारत पीछे छूट गया है। इस सिद्धांत के अनुसार, जैसे ही ए.आई. से जुड़ा व्यापार धीमा पड़ेगा, भारत को लाभ हो सकता है। दूसरा सिद्धांत भू-राजनीतिक तनावों पर जोर देता है, जिन्होंने कमोडिटी की कीमतों को बढ़ा दिया है। एक बड़े कमोडिटी आयातक के रूप में, भारत पर बाकियों की तुलना में अधिक असर पड़ा है। इससे संबंधित, अमरीका में बढ़ती मुद्रास्फीति और बॉन्ड यील्ड ने अमरीकी और उभरते बाजार की परिसंपत्तियों के बीच के अंतर को कम कर दिया है, जिससे उभरते बाजारों में आने वाले फंड का प्रवाह कमजोर हुआ है। इस सिद्धांत के समर्थकों का तर्क है कि जैसे ही भू-राजनीतिक तनाव शांत होंगे और वैश्विक कमोडिटी चक्र ठंडा पड़ेगा, भारत फिर से निवेशकों की पसंद बन जाएगा।

तीसरा सिद्धांत बड़ी भारतीय कंपनियों में नवाचार (इनोवेशन) की कमी पर जोर देता है। लगातार कमाई में वृद्धि के वादे के बिना, भारतीय शेयर विदेशी निवेशकों के लिए अनाकर्षक बने रहेंगे, जैसा कि बर्नस्टीन रिसर्च के विश्लेषकों वेणुगोपाल गारे और निखिल अरेला ने कुछ सप्ताह पहले ग्राहकों को लिखे एक नोट में कहा था। उन्होंने लिखा कि यदि ए.आई. का व्यापार कमजोर होता है या तेल की कीमतें गिरती हैं, तो विदेशी पूंजी अस्थायी रूप से लौट सकती है। लेकिन निरंतर प्रवाह इस बात पर निर्भर करेगा कि ‘क्या भारत प्रतिस्पर्धात्मकता, नवाचार और वैश्विक प्रासंगिकता के नए इंजन बना सकता है?’ इस जोड़ी ने तर्क दिया कि अंतरिक्ष, रक्षा, सैमीकंडक्टर और डीप-टैक जैसे क्षेत्रों में उभरने वाली नई फर्में वर्तमान में बड़े पैमाने पर वैश्विक पूंजी को आकॢषत करने के लिए बहुत छोटी हैं।

इनमें से कोई भी व्याख्या यह संकेत नहीं देती कि कैपिटल गेन्स टैक्स में बदलाव विदेशी फंडों को वापस ला सकते हैं। निश्चित रूप से, हमारे कैपिटल टैक्स ढांचे में विकृतियां हैं और इनका समाधान किया जाना चाहिए। कैपिटल गेन्स टैक्स को तर्कसंगत बनाने से विदेशी और घरेलू निवेशकों को अपने लिए अधिक उपयुक्त परिसंपत्तियां चुनने में मदद मिलेगी। लेकिन वे पूंजी के बहिर्वाह (आऊटफ्लो) को रोकने के लिए कोई त्वरित समाधान नहीं है। वर्तमान मंदी में शेयरों का पुनॢनर्धारण (रीप्राइसिंग) अपने आप में भारतीय बाजारों में फिर से रुचि जगा सकता है। यह ध्यान देने योग्य है कि विदेशी निवेशकों ने हाल के दिनों में आरंभिक सार्वजनिक निर्गमों (आई.पी.ओज) में भारी निवेश किया है, भले ही उन्होंने सैकेंडरी मार्कीट में अत्यधिक महंगे शेयरों से परहेज किया हो। नीति निर्माताओं को ऐसे कठिन सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो देश में उच्च-मूल्य वाली, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी फर्मों के विकास को गति दे सकें। इन फर्मों को अपने संसाधनों को नौकरशाही से निपटने में खर्च करने की बजाय इनोवेटिव उत्पाद विकसित करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए।


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