मोबाइल की लत में जकड़ा युवा : चुनौतियां और समाधान
punjabkesari.in Wednesday, Oct 28, 2026 - 03:36 AM (IST)
आज का युग डिजिटल क्रांति का युग है। आज मोबाइल शिक्षा, मनोरंजन, व्यापार, बैंकिंग और सूचना का प्रमुख माध्यम बन चुका है। इसके बावजूद मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल विशेषकर युवाओं के लिए गंभीर ङ्क्षचता का विषय बनता जा रहा है। मोबाइल अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब व्यक्ति अपनी जरूरत के अनुसार मोबाइल का इस्तेमाल करने की बजाय उसके नियंत्रण में रहने लगता है। सुबह आंख खुलते ही फोन देखना, भोजन करते समय वीडियो देखना, पढ़ाई के बीच बार-बार संदेशों की जांच करना और रात को देर तक सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना आज अनेक युवाओं की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। युवावस्था जीवन का वह महत्वपूर्ण दौर है, जिसमें शिक्षा, कौशल, व्यक्तित्व और करियर की नींव रखी जाती है। यदि इसी समय का बड़ा हिस्सा बिना किसी उद्देश्य के मोबाइल पर खर्च होने लगे, तो भविष्य की तैयारी प्रभावित होनी स्वाभाविक है।
मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल की आदत का सबसे बड़ा असर विद्याॢथयों की पढ़ाई पर दिखाई देता है। किसी विद्यार्थी ने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए 2 घंटे पढऩे का लक्ष्य निर्धारित किया लेकिन हर 10 मिनट में आने वाले संदेश और नोटिफिकेशन उसका ध्यान भटकाते रहे। परिणामस्वरूप 2 घंटे की पढ़ाई में वह विषय को ठीक से समझ ही नहीं पाया।हालांकि, मोबाइल का सही इस्तेमाल ऑनलाइन कक्षाओं, डिजिटल पुस्तकालयों, शैक्षणिक वीडियो और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में बहुत उपयोगी है। अंतर केवल उद्देश्य और समय के प्रबंधन का है। वही फोन किसी विद्यार्थी के लिए ज्ञान का भंडार बन सकता है और वही उसकी पढ़ाई में बाधा भी पैदा कर सकता है।
सोशल मीडिया पर युवा अक्सर दूसरों के जीवन की आकर्षक तस्वीरें देखते हैं और किसी की सफलता देखकर वे अपने जीवन की तुलना दूसरों से करने लगते हैं। धीरे-धीरे उनमें हीनभावना, असंतोष और अपने भविष्य को लेकर चिंता बढ़ सकती है। यह समझना आवश्यक है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तस्वीरें किसी व्यक्ति के पूरे जीवन का सच नहीं होतीं। वहां अक्सर जीवन के चुनिंदा अच्छे क्षण ही प्रदर्शित किए जाते हैं, जबकि संघर्ष, असफलताएं और परेशानियां पर्दे के पीछे रह जाती हैं।
मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल से नींद का समय बिगड़ सकता है। देर रात तक स्क्रीन देखने से सोने में देरी होती है और अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन तथा पढ़ाई या काम में मन न लगने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। कुछ युवाओं में लगातार ऑनलाइन रहने की इच्छा सामाजिक मेलजोल को भी सीमित कर देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि मोबाइल इस्तेमाल करने वाला प्रत्येक युवा मानसिक समस्या से जूझ रहा है। लेकिन जब मोबाइल का इस्तेमाल नींद, पढ़ाई, रिश्तों और दैनिक जिम्मेदारियों को प्रभावित करने लगे, तब सावधान होने की जरूरत है। मोबाइल पर लंबे समय तक झुक कर बैठने से गर्दन, कंधों और पीठ में दर्द की शिकायत हो सकती है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में थकान, सूखापन और सिरदर्द जैसी परेशानियां भी हो सकती हैं। जब मोबाइल के कारण खेलकूद, पैदल चलना और दूसरी शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं, तब निष्क्रिय जीवनशैली का खतरा बढ़ता है। इसलिए पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम, संतुलित भोजन और परिवार के साथ समय बिताना उतना ही जरूरी है, जितना शिक्षा और करियर पर ध्यान देना।
मोबाइल की आदत को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी केवल युवाओं पर डाल देना उचित नहीं, परिवार और शिक्षण संस्थानों को भी इस दिशा में सहयोग करना होगा। अभिभावकों को बच्चों के सामने स्वयं मोबाइल के संतुलित उपयोग का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में डिजिटल जागरूकता, समय प्रबंधन, साइबर सुरक्षा तथा मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिएं। यदि किसी युवा को मोबाइल से दूर रहने में लगातार कठिनाई हो रही हो और उसकी पढ़ाई, नींद या दैनिक जीवन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा हो, तो परिवार को उसे शॄमदा करने की बजाय उचित परामर्श और जरूरत पडऩे पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। इसी युवा शक्ति के कंधों पर विज्ञान, शिक्षा, उद्योग, कृषि, प्रशासन और राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी है। यदि वे डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल ज्ञान, नवाचार, कौशल और रोजगार के अवसर तलाशने में करेंगे, तो यही मोबाइल उनकी प्रगति का मजबूत माध्यम बन सकता है।-प्रो. मनोज डोगरा
