अफगानिस्तान और ईरान के बीच युद्धों में फंसे पाकिस्तान के सामने कठिन विकल्प
punjabkesari.in Saturday, Mar 14, 2026 - 05:29 AM (IST)
पाकिस्तान दो संघर्षों के बीच फंसा हुआ है। पश्चिम में अफगानिस्तान में, कभी उसके संरक्षण में रहे तालिबान के साथ संबंध बेहद बिगड़ गए हैं और अब वे ‘पूर्ण युद्ध’ की स्थिति में हैं। दक्षिण-पश्चिम में ईरान के साथ युद्ध जारी है, जिसका असर सऊदी अरब पर भी पड़ रहा है, जिसके साथ पाकिस्तान का पारस्परिक रक्षा समझौता है।
ईरान युद्ध के कारण पैट्रोल और डीजल की कीमतों में 55 पाकिस्तानी रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। पहले से ही कमजोर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे इस नए दबाव के साथ, अफगानिस्तान में अपने सैन्य अभियानों को जारी रखना और सऊदी अरब की मदद के लिए संभावित रूप से एक नया अभियान शुरू करना वित्तीय दृष्टि से बहुत कम समझदारी भरा लगता है, खासकर ऐसे समय में, जब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) के अधिकारी 7 अरब डॉलर के राहत पैकेज से संबंधित समीक्षा दौरे पर हैं।
बलूचिस्तान में भी संघर्ष जारी है। इसके अलावा, दोनों संघर्ष पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा स्थिति को और खराब कर सकते हैं। ईरान युद्ध से उग्रवाद को बढ़ावा मिल सकता है, जबकि आतंकवादी समूह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टी.टी.पी.) अफगानिस्तान युद्ध का बदला ले सकता है। पहले ही, पूरे पाकिस्तान में शिया समुदाय द्वारा पूजे जाने वाले अयातुल्ला अल खामेनेई की हत्या के विरोध में हुए प्रदर्शनों में 20 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं।
पाकिस्तान अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ अपने नए सौहार्दपूर्ण संबंधों को खतरे में नहीं डाल सकता लेकिन ईरान के साथ उसके संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए, इस्लामाबाद ने ईरान पर हुए पहले हमले की निंदा की लेकिन हमलावर का नाम नहीं बताया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने पिता के उत्तराधिकारी बनने पर मुजतबा खामेनेई को बधाई दी और अयातुल्ला के निधन पर शोक व्यक्त किया, साथ ही उन खाड़ी देशों के प्रति एकजुटता भी व्यक्त की, जिन पर ईरान ने हमला किया है। इन देशों में इस्लामाबाद के लिए सबसे महत्वपूर्ण सऊदी अरब है, जो उसका लंबे समय से हितैषी रहा है। पिछले साल सितंबर में, दोनों देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे कि किसी भी देश के खिलाफ आक्रामकता को दोनों देशों के खिलाफ आक्रामकता माना जाएगा। आज अगर सऊदी अरब के लिए युद्ध की स्थिति और बिगड़ती है, तो दुनिया यह देखेगी कि पाकिस्तान अपने समझौते का पालन कैसे करता है।
पाकिस्तान के ईरान के साथ संबंध जटिल हैं। शिया-सुन्नी विभाजन एक कारण है, वहीं अमरीका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए पाकिस्तान के प्रयास दूसरा कारण हैं। दोनों देश 900 किलोमीटर लंबी सीमा सांझी करते हैं, जिसके दोनों ओर पाकिस्तान का बलूचिस्तान और ईरान का सिस्तान तथा बलूचिस्तान स्थित हैं, जहां बलूच विद्रोह सुलग रहा है। 2024 में, ईरान ने पाकिस्तान की सीमा के अंदर हमला किया और पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की, दोनों देशों ने आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया। तब से, संबंधों को सुधारने के लिए कुछ प्रयास किए गए हैं। लेकिन पराजित या कमजोर ईरान इस्लामाबाद के हित में नहीं है। अगर ईरान अपनी सीमा की सुरक्षा नहीं कर पाता है, तो बलूच उग्रवादियों का हौसला बढ़ेगा। इस्लामाबाद अपने पड़ोसी देश में इसराईल समर्थित कठपुतली नेतृत्व भी नहीं चाहेगा। इसके अलावा, बलूचिस्तान ईरान सीमा के पार से होने वाले व्यापार और आपूर्ति पर बहुत अधिक निर्भर है, जबकि ईरान और खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों पाकिस्तानी अपने घर पैसे भेजते हैं। इसके अलावा, यह तथ्य भी है कि लगभग वे सभी देश, जो अफगानिस्तान के साथ उसके युद्ध में मध्यस्थता कर सकते थे, अब अपने ही युद्धों में व्यस्त हैं।
हालांकि, पाकिस्तान भले ही मुश्किल हालात में है, फिर भी वह एकमात्र ऐसा देश है, जो इस संघर्ष में शामिल सभी पक्षों से बातचीत कर सकता है। पाकिस्तान के रक्षा एवं सुरक्षा विशेषज्ञ अली के चिश्ती ने दावा किया, ‘‘ईरान के मुद्दे पर पाकिस्तान नीतिगत गतिरोध का सामना कर रहा है। हालांकि, उसने इस अवसर का लाभ उठाते हुए ईरान के साथ अपने संबंधों को सक्रिय रूप से मजबूत किया है, जिसके चलते ईरान ने सऊदी अरब को अन्य देशों की तरह बेरहमी से निशाना नहीं बनाया। इसलिए यह पाकिस्तान के लिए एक जीत है।’’
अफगानिस्तान से टकराव : यहां विवाद की जड़ टी.टी.पी. है, जिसका मूल सिद्धांत इस्लामी जिहाद पर आधारित था, जिसके तहत वह पाकिस्तान को कुरान की सख्त व्याख्या का पालन करने वाले एक अमीरात के रूप में चलाना चाहता था। लेकिन धीरे-धीरे इसने खैबर पख्तूनख्वा की पश्तून आबादी की कई पुरानी स्थानीय शिकायतों का फायदा उठाना शुरू कर दिया। टी.टी.पी. एक घातक संगठन है, जिसने अकेले पिछले कुछ वर्षों में आतंकी हमलों में हजारों लोगों की जान ली है। उस पर नकेल कसने के कई प्रयास विफल होने के बाद, पाकिस्तान ने 27 फरवरी को अफगानिस्तान में बमबारी शुरू कर दी, जिसके जवाब में दूसरी तरफ से भी बमबारी की गई। काबुल ने अब तक पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया है।-याशी
