अब कड़वे फैसले ही गढ़ेंगे हिमाचल का भविष्य
punjabkesari.in Wednesday, Feb 18, 2026 - 05:38 AM (IST)
हिमाचल समेत 17 राज्यों में केंद्र सरकार की विशेष दरियादिली यानी राजस्व घाटा अनुदान (आर.डी.जी.) खत्म होने के बाद अब वक्त आ गया है, जब राज्य सरकारें आर.डी.जी. से आगे का सोचें, खासकर हिमाचल जैसा छोटा सा राज्य। वित्तीय नजाकत को समझते हुए वर्तमान कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालते ही कुछ फैसलों के कड़वे घूंट पी लिए थे, ताकि खजाने में थोड़ा सुधार हो, लेकिन यही काम पूर्व में रही भाजपा या कांग्रेस सरकारों ने कर लिया होता तो इस बदहाली की नौबत न आती।
खैर, अब आर.डी.जी. बंद हो गई है, पिछली सरकारों द्वारा लिए गए कर्ज का आंकड़ा 1 लाख करोड़ पार कर गया है, जिसका ब्याज चुकता करते-करते किसी भी दल की सरकार के पसीने छूटेंगे। दूसरे आॢथक मुद्दे भी हैं जिन पर वर्तमान की कांग्रेस सरकार अंगारों पर चल रही है। इसलिए अब आर.डी.जी. से आगे कदम बढ़ाने व स्व-साधन विकसित करने का वक्त है और संकट की इस घड़ी में सरकारी कर्मियों को ही योद्धा बनकर चलना होगा ताकि गैर सरकारी जनता भी स्वयं को बेहतर स्थिति में ला सके। इसलिए मुफ्त की योजनाओं से इतर विकास के नए अवसरों को झटपट पाना और कठोर निर्णय लेना, वक्त की जरूरत बनी है। वरना राज्य का आगे चल पाना, यानी बुनियादी कामों का होना भी दुश्वार होगा।
बहरहाल सुधारों का पिटारा तत्काल प्रभाव से सुक्खू सरकार को शुरू करना चाहिए। इसमें पहल चुने हुए प्रतिनिधियो से ही करनी चाहिए, जिन्हें हर टर्म की अलग पैंशन मिलती है और कुछ-कुछ अंतराल के बाद वेतन-भत्ते भी बढ़ते रहते हैं। खासकर हर बार की चुनावी रिटर्न में कुछ की करोड़ों की भारी बढ़ौतरी देखी गई है। दूसरा, यदि पैंशन के मामले में देनदारी खासी बढ़ गई है, तो इस विषय में पुनर्विचार करना भी एक व्यावहारिक फैसला हो सकता है, क्योंकि पैंशन व एरियर से भी राज्य के खजाने को बहुत बड़ी मार मिल रही है। इस विषय में विपक्ष को भी राजनीति से दूर व्यावहारिक नजरिया रखना होगा क्योंकि गत वर्षों की प्रदेश की ऋण स्थिति, वेतन, एरियरों व डी.जी.पी. के साथ सभी सरकारों के निर्णय पर गौर करें तो कोई भी एक दल या पार्टी विशेष कटघरे में खड़ी नहीं होती बल्कि सभी होते हैं। क्योंकि गत ढाई दशकों में सबसिडी आधारित राजनीति सभी ने की। कर्ज सभी ने लिए। राजस्व सुधारों की कमी सभी स्तरों पर रही। वास्तव में हिमाचल बिना केंद्र की मदद के खुद तेजी से विकसित इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि यह पहाड़ी राज्य है।
प्रेम कुमार धूमल का 2 टर्म का कार्यकाल रहा। अब सभी मुख्यमंत्रियों का वर्ष 2000 से आगे के अनुमानित कर्ज आंकड़ों में अपने आप में काफी कुछ कहता है। प्रेम कुमार धूमल 14000 करोड़ रुपए का कर्ज, वीरभद्र सिंह के 2 कार्यकालों में 21500 करोड़ रुपए, जयराम ठाकुर के एक कार्यकाल में 22000 करोड़ रुपए (कोरोना काल) और सुखविंदर सिंह सुक्खू के 3 वर्ष के कार्यकाल में अनुमानित 18000 करोड़ रुपए (आपदा काल) ऋण लिया गया। इस तरह सुक्खू सरकार में, पिछली सरकारों का लिया हुआ कर्जा समेत मिलाकर करीब 1 लाख करोड़ आ गया। ऐसे में आर.डी.जी. का बंद होना भी वज्रपात ही है।
यह विडंबना है कि सभी को मालूम था कि हालात खराब हो रहे हैं। सी.ए.जी. ने भी स्पष्ट कर दिया था कि असंतुलन तेजी से हो रहा और आमदनी धीमी है। आयकर कम है, तब कर्ज लेना पड़ा। यानी खर्च बढ़ा, राजस्व नहीं। जो ऋण लिया वह सैलरी-पैंशन पर गया, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास नहीं हुआ। हर सरकार के समय पर सबसिडी की मार प्रदेश को झेलनी पड़ी। प्रेम कुमार धूमल के समय 5वां, 6वां वेतन आयोग लागू किया। बिजली व किसानों की सबसिडी, नए मंडल, उपमंडल खोलना, कर्ज आधारित विकास मॉडल बना। वीरभद्र ने बड़े पैमाने पर सरकारी भर्तियां कर दीं। सामाजिक पैंशन विस्तार, बोर्ड निगम घाटे में। जयराम ठाकुर ने बिजली 125 यूनिट मुफ्त की, कोरोना काल में उधारी बढ़ी, राजस्व गिर गया, वेतन आयोग का एरियर मिलता रहा। सुक्खू सरकार में ओ.पी.एस. ने तगड़ा झटका दिया। कर्ज का ऋण देते रहे और दो बड़ी आपदाओं में पुनर्वास में भारी खर्च हुआ। ओ.पी.एस. इस समय ऋण क्षमता को 1800 करोड़ कम कर देता है क्योंकि यह डैडीकेटेड कॉरपस होता है। यही झटका इस सरकार को लगा।
वैसे ङ्क्षचताजनक बात यह है कि प्रदेश की वृद्धि दर भी खास नहीं सुधर रही। वर्ष 2005-06 में यह 10 प्रतिशत थी जो 2011-12 में 7 प्रतिशत हो गई। 2018 में 6 प्रतिशत और 2019 में 4 प्रतिशत पर आ गई। आज प्रदेश की जी.डी.पी. हमारे देश की जी.डी.पी. से नीचे चल रही है। उधर दूसरी ओर 11वें वित्त आयोग ने प्रदेश को 4,549 करोड़ की अनुमानित घाटा भरपाई (आर.डी.जी.) दी, 12वें आयोग ने 10,202 करोड़, 13वें वित्तायोग ने 19300 करोड़, 14वें आयोग ने 40,624 करोड़, 15वें आयोग ने 4 वर्षों के (2024 तक) 37,199 करोड़ दिए हैं। इसमें सुक्खू सरकार के अब तक के सत्ता वर्ष शामिल हैं, जो करीब 17000 करोड़ बनते हैं। प्रदेश को 5 साल में अनुमानित 50000 करोड़ आर.डी.जी. मिलता था, वह अब बंद। यह बहुत बड़ी राहत हिमाचल जैसे राज्य के लिए थी। इस परिप्रेक्ष्य में अब हिमाचल को ठीक वैसे अपने पैरों पर खड़ा होना होगा, जैसे भारत आत्मनिर्भरता की ओर जा रहा है। इसलिए सबसिडी व पैंशन को न्यौछावर करके हर हिमाचली को हाथ से हाथ मिलाकर चलना चाहिए। शुरुआत राजनीतिक दलों से की जानी चाहिए।-डा. रचना गुप्ता
