‘आवश्यक है झूठी बातों का खंडन करना’

punjabkesari.in Thursday, Dec 31, 2020 - 04:32 AM (IST)

कृषि सुधारों की आवश्यकता, तर्क और कालक्रम को समझना महत्वपूर्ण है। चारों तरफ कड़वा झूठ फैलाया जा रहा है। सुधारों के बारे में प्रचारित की जा रही झूठी बातों के बीच एक बात यह फैलाई जा रही है कि ‘एम.एस.पी. हटा दिया जाएगा’। मोदी सरकार ने एम.एस.पी. को उपज की लागत से 1.5 गुना बढ़ाने संबंधी स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को केवल लागू ही नहीं किया है, बल्कि उसने सभी फसलों के मामलों में एम.एस.पी. को 40-70 प्रतिशत की रेंज में बढ़ा भी दिया है और एम.एस.पी. पर खरीद का खर्च 2009-14 से 2014-19 में 85 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इतने वर्षों में कृषि विभाग का बजट भी 6 गुना बढ़ चुका है। 

एम.एस.पी. एक प्रशासनिक व्यवस्था है। यदि सरकार को एम.एस.पी. हटाना ही होता, तो वह इन तीन कानूनों को, विशेष तौर पर व्यवस्थागत सुधार लाने से संबंधित कानूनों को प्रस्तुत ही क्यों करती? यदि एम.एस.पी. हटाने का उसका कोई विचार होता, तो वह पिछले 5 वर्षों के दौरान एम.एस.पी. को बढ़ाती क्यों रहती? किसानों की हालत का हवाला देते हुए 2015 में श्री राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा था-‘‘कुछ साल पहले, एक किसान ने मुझसे पूछा था कि 10 रुपए में बिकने वाले चिप्स पर क्या लागत आती है, जबकि वह 2 रुपए किलोग्राम की दर पर आलू बेचता है। यदि हम अपनी उपज सीधे फैक्टरियों को देंगे, तो बिचौलिए मुनाफा नहीं उठा पाएंगे।’’ 

सोशल मीडिया पर ऐसा आपत्तिजनक और बेबुनियाद झूठ फैलाया जा रहा है कि किसानों की जमीन कम्पनियों द्वारा हथिया ली जाएगी। इन कानूनों में कई स्तरों पर विशेषकर हमारे किसानों की सुरक्षा के प्रावधान किए गए हैं, ताकि किसान,कम्पनियों के किसी भी प्रकार के अनुचित दावों का मुकाबला कर सकें। इतना ही नहीं, हमने कानूनों में स्पष्ट तौर पर कहा है कि किसी भी मामले में हमारे किसानों की जमीन का अधिग्रहण अथवा उन्हें पट्टे पर लिए जाने की इजाजत नहीं होगी। हमारे किसान अपनी जमीन, मिट्टी और वनों के संरक्षक हैं और जमीन वास्तव में उनकी मां के समान है। उन्होंने इसकी देख-रेख के लिए अपना जीवन समर्पित किया है, खून और पसीना बहाया है। उनकी मां सुरक्षित है। हम किसी को भी उनकी जमीन हड़पने की इजाजत नहीं देंगे। 

कम्पनियों के पास आज विविध प्रकार के ऐसे व्यापक क्षेत्र हैं, जहां वे काम कर सकती हैं और कृषि यकीनन मौजूदा समय में ज्यादा मुनाफे का उपक्रम नहीं है। ऐसे में यह कहना हास्यास्पद है कि कम्पनियां आएंगी और हमारे किसानों की लागत पर बहुत सारा पैसा कमाएंगी। हमें अपनी कृषि आपूर्ति शृंखला में कम्पनियों की जरूरत है, क्योंकि वे ग्रामीण लचीलापन तैयार करने में सहायता करते हुए इनपुट और उत्पादों के परीक्षण, उत्पादित पैदावार के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आवश्यक बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच बनाने के संदर्भ में मूल्यवर्धन करेंगी, जो हमारी भावी पीढिय़ों के लिए महत्वपूर्ण है।

उदाहरण के लिए, केन्या में यूनीलीवर केन्या टी डिवैल्पमैंट एजैंसी लिमिटेड (के.टी.डी.ए.) के साथ मिलकर लचीलापन तैयार करने तथा सीमांत किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए कार्य कर रही है। क्या हमें भारतीय कृषि में इसी तरह के अनेक कदम उठाने की जरूरत नहीं है? हमने सुदृढ़ फसल बीमा व्यवस्था- प्रधानमंत्री किसान फसल बीमा योजना तैयार की है, जिसने 17,450 करोड़ रुपए के प्रीमियम पर किसानों को बीमे के रूप में 87,000 करोड़ रुपए की राशि का भुगतान किया है। हम जानते हैं कि पंजाब और हरियाणा भारत के अन्न-भंडार हैं। वे राष्ट्रीय खाद्यान्न उत्पादन के लगभग 30 प्रतिशत भाग के लिए उत्तरदायी हैं और हमारी लगभग 70 प्रतिशत एम.एस.पी. खरीद इन्हीं  राज्यों से होती है।

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा 2018 में किया गया अध्ययन दर्शाता है कि खेतीबाड़ी करने वाले सभी परिवारों में से 52.5 प्रतिशत परिवार कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं, जिन पर औसतन 1,470 डॉलर का कर्ज है। उस पर, खराब हो जाने वाली उपज की रक्षा के लिए आवश्यक उचित कोल्ड चेन के अभाव में उत्पादित फसलों का 30 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो जाता है। इसके अलावा, अनेक बिचौलियों के कारण कृषि क्षेत्र में बहुत असमानता है, जो अक्सर मोटा मुनाफा कमाते हैं। 

हमेशा सिख गुरुओं से प्रेरणा लेने वाले प्रधानमंत्री मोदी जी को जपजी साहिब की 38वीं पौड़ी का पालन करते हुए देखा जा सकता है। वह ऐसा सुनार बनने का प्रयास करते हैं, जो उद्देश्य के प्रति पूरी ईमानदारी, हृदय की शुद्धता, संयम और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ खेतीबाड़ी करने वाले हमारे किसान भाइयों और बहनों की भलाई के लिए कृषि रूपी सोने को खूबसूरत आभूषणों के सांचे में ढालना चाहते हैं।-हरदीप सिंह पुरी(केंद्रीय मंत्रिपरिषद के सदस्य)


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