क्या के.सी.आर. की नैया पार लगा पाएंगे प्रशांत किशोर

punjabkesari.in Thursday, May 12, 2022 - 05:38 AM (IST)

पिछले दिनों तेलंगाना राज्य से एक नया स्वर सुनाई दिया। वहां के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टी.आर.एस.) के संस्थापक के. चंद्रशेखर राव (के.सी.आर.) ने कहा कि अब 2024 के आम चुनावों की तैयारी करने के लिए किसी तीसरे मोर्चे या संघीय गठबंधन की जरूरत नहीं है, जरूरत है तो देश को एक वैकल्पिक सोच की, जो  सैद्धांतिक और वैचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी से अलग हो। 

हमें पता ही है कि इस साल की शुरूआत से के.सी.आर. देश में 2024 से पहले एक फैडरल फ्रंट (संघीय मोर्चा) बनाने में जुटे हुए थे और इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए वह कई प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, जैसे ममता  बनर्जी, उद्धव ठाकरे, पिनरई विजयन, राष्ट्रवादी कांग्रेस अध्यक्ष शरद पवार तथा वाम दलों के नेता सीताराम येचुरी और डी. राजा समेत कई नेताओं से मिले और कोशिश की। लेकिन राष्ट्रीय छवि बनाने की कवायद में लगे अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी आदि से उन्हें वह सहयोग नहीं मिला जो वह चाहते थे। याद रहे कि पहले टी.डी.पी. के चंद्रबाबू नायडू ने भी राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की बड़ी कोशिश की थी, लेकिन उन्हें भी क्षणिक सफलता हाथ लगी थी। 

लेकिन हैदराबाद में टी.आर.ई.एस.एस. के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में अपनी पार्टी को संबोधित करते हुए के.सी.आर. के विचारों में परिवर्तन नजर आया। उनका कहना था कि  आज देश में राजनीतिक पुनॢनर्माण करने की नहीं बल्कि गुणात्मक परिवर्तन अथवा वैकल्पिक एजैंडे की जरूरत है। इस कार्य के लिए अगर हैदराबाद एक केंद्र बिंदू बन सकता है तो तेलंगाना के लोगों के लिए यह बड़े गर्व की बात होगी। 

अपने और पार्टी के लिए एक राष्ट्रीय स्वरूप की परिकल्पना करते हुए उन्होंने यहां तक कह डाला कि भविष्य में टी.आर.एस. का स्वरूप अखिल भारतीय हो सकता है और वह अखिल राष्ट्र समिति बन सकती है। इस घोषणा के बाद हैदराबाद में अटकलों का बाजार फिर से गर्म हो गया। लोग इस गुत्थी को सुलझाने में लग गए हैं कि आखिर के.सी.आर. की इस नई राजनीतिक चाल का गंतव्य क्या होगा। के.सी.आर. एक बहुत ही अनुभवी राजनेता हैं और एन.टी. रामाराव के वक्त से तेलुगू देशम पार्टी से जुड़े रहे और चंद्रबाबू नायडू की सरकार से अलग हो कर 27 अप्रैल, 2001 को टी.आर.एस. (तेलंगाना राष्ट्र समिति) की स्थापना कर डाली। उद्देश्य था पृथक तेलंगाना राज्य की स्थापना और इस दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्होंने पहले कांग्रेस का हाथ पकड़ा और कुछ वर्षों बाद पार्टी को मजबूत देख, मनमोहन सिंह वाली यू.पी.आई. सरकार का साथ छोड़ दिया। अंत में लम्बे संघर्ष के बाद अलग तेलंगाना राज्य बनवाने में सफलता हासिल कर ली और 2014 में मुख्यमंत्री भी बन गए। 

अब राज्य में दिसम्बर 2023 में विधानसभा के चुनाव होने हैं और वहां पर भाजपा एक बड़ी ताकत के रूप में उभर रही है। के.सी.आर. ने तो राज्य में कांग्रेस के अस्तित्व को खत्म करने के बाद टी.डी.पी. को भी दरकिनार कर दिया और ऐसे में टी.आर.एस. को भाजपा से बड़े राजनीतिक खतरे की घंटी सुनाई दे रही है। के.सी.आर. और उनकी पार्टी  लगातार तीसरी बार चुनाव जीतने की रणनीति में लगी है, लेकिन उसके सामने संकट कम नहीं हैं। वैसे वह अपने राज्य के मतदाता को यह बताने की कोशिश में हैं कि दरअसल उनकी लड़ाई सीधे-सीधे राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है न कि तेलंगाना में भाजपा के साथ। उन्होंने अपनी लकीर लम्बी खींचनी दिखाने की कोशिश की है  और शायद यही वजह थी कि स्थापना दिवस पर पारित अधिकतर प्रस्ताव केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नीतियों के विरुद्ध थे। 

अब एक दशक से राज्य में सरकार चलाने के बाद टी.आर.एस. एंटी इनकम्बैंसी (सत्ता विरोधी लहर) विरोध का सामना कर रही है। कहा जा रहा है कि राज्य में सिर्फ एक या दो कल्याणकारी कार्यक्रम ठीक से चल रहे हैं। उधर नियंत्रक और अभिलेखागार (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार राज्य के वित्तीय प्रबंधन में खामियां हैं। राज्य सरकार उधार लेकर योजनाएं चला रही है और आगे चल कर यह दिक्कत दे सकता है। साथ ही, राज्य स्वास्थ्य और शिक्षा पर अन्य राज्यों की तुलना में कम खर्च कर रहा है। 

उधर के.सी.आर. अपने पुत्र के.टी. रामाराव को अपना उत्तराधिकारी बना कर मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। के.टी.आर. ने राज्य में विदेशी निवेश पर बहुत काम किया है और तेलंगाना  को अग्रणी राज्यों की पंक्ति में खड़ा करने में प्रयासरत रहते हैं। दूसरी तरफ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद बंदी संजय कुमार पिछले कुछ महीनों से पदयात्रा करके जनता के बीच  टी.आर.एस. सरकार की विफलताएं गिना रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने हाल ही में राज्य का दौरा किया। कांग्रेस भी के.सी.आर. से काफी दुखी रही है। कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने के.सी.आर. को खूब खरी-खोटी सुनाई और यहां तक कह दिया कि अगर किसी ने टी.आर.एस. के साथ समझौते की बात की तो वह कांग्रेस में नहीं रहेगा। के.सी.आर. ने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पी.के.) की आईपैक्स से भी अगले चुनाव की तैयारी के लिए साथ जोड़ लिया है। अब देखना यह है कि पी.के. ऐसा क्या करेंगे कि विपक्ष से बुरी तरह घिरे के.सी.आर. की नैया पार लग जाए।-के.वी.प्रसाद  
 


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