ईरान को अमरीका पर एक रणनीतिक बढ़त

punjabkesari.in Saturday, Jun 20, 2026 - 05:09 AM (IST)

क्या अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच 17वीं सदी के फ्रांसीसी महल वर्साय में 17 जून को हस्ताक्षरित अमरीका-ईरान समझौता स्थायी शांति लाएगा? या फिर यह एक ऐसी शांति साबित होगा, जो दोनों देशों के बीच अगले युद्ध की तैयारी के लिए एक छोटी अवधि बनकर रह जाएगी? सबसे पहले, यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि अमरीका और इसराईल ने मिलकर काम करते हुए भी न तो ईरान को हराया है और न ही वह सत्ता परिवर्तन हासिल कर पाए हैं, जिसके लिए वे निकले थे, हालांकि ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई 28 फरवरी को एक इसराईली हवाई हमले में मारे गए थे।

नया शक्ति संतुलन : ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमरीकी चिंताएं बनी हुई हैं लेकिन इसे समाप्त करने के लिए बातचीत की अवधि को 60 दिनों के लिए बढ़ा दिया गया है। तेहरान को, हालांकि, बैलिस्टिक मिसाइलें रखने की ‘अनुमति’ दी जाएगी क्योंकि ट्रम्प का मानना है कि यदि सऊदी अरब और कतर सहित अन्य देशों के पास ये मिसाइलें हैं, तो पूरी निष्पक्षता के साथ ईरान के पास भी होनी चाहिएं। कुछ हद तक उल्लेखनीय रूप से, अमरीका ईरान को ‘पुनॢनर्माण’ के लिए 300 अरब डॉलर की सहायता प्रदान करेगा और वाशिंगटन ईरान पर से ‘सभी प्रकार के प्रतिबंधों’ को समाप्त कर देगा। हॉर्मुज पर से नाकेबंदी हटाने और जलडमरूमध्य के माध्यम से मुक्त आवागमन को बहाल करने के बदले में तेहरान को अब आॢथक राहत मिलेगी।

हॉर्मुज में नौवहन को बंद करने की ईरान की क्षमता, उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को बनाए रखने और अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में उसकी खुली वापसी के साथ, 4 महीने तक भारी बमबारी झेलने के बावजूद उसे पश्चिम एशिया के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक के रूप में स्थापित करेगी। महीनों की तबाही और वैश्विक आर्थिक व्यवधान के बाद आया यह परिणाम, ट्रम्प के दोनों राष्ट्रपति कार्यकालों की सबसे बड़ी विदेश नीति विफलता को दर्शाता है, जिसके परिणाम पश्चिम एशिया में अमरीका की रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पहले से कहीं अधिक कठिन बना देंगे। पश्चिम एशियाई देश और अन्य देश भी इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि अमरीका ईरान जैसे कमजोर देश के खिलाफ निर्णायक जीत हासिल करने में विफल रहा। वाशिंगटन ने खुद को अविश्वसनीय, अप्रत्याशित और सनकी भी दिखाया। इससे स्थिरता बनाए रखने की वाशिंगटन की क्षमता पर क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विश्वास को ठेस पहुंचेगी।

अमरीका की साख कम हुई है : इसराईली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर ट्रम्प ने युद्ध समाप्त करने और लेबनान पर हमले रोकने का दबाव डाला था। क्या इसकी कीमत उन्हें इस साल के अंत में होने वाले चुनावों में हार के रूप में चुकानी पड़ेगी, यह एक खुला सवाल है। इसराईल ने इस संघर्ष में बड़े पैमाने पर संसाधन झोंक दिए। उसके नागरिकों को ईरान से बार-बार बमों की धमकियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, नेतन्याहू ईरानी सत्ता परिवर्तन का अपना अंतिम लक्ष्य हासिल नहीं कर सके।

इस समझौते का अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों पर तत्काल प्रभाव पड़ा है लेकिन सवाल यह है कि क्या वे कम से कम उस स्तर तक गिरेंगी, जो युद्ध शुरू होने से पहले था और वहां टिकी रहेंगी? गुरुवार को तेल की कीमतें युद्ध शुरू होने के बाद के सबसे निचले स्तर पर आ गईं। इस बीच, ईरानी तेल की बिक्री पर से प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे। एक लेन-देन वाली कूटनीति पर चलने वाला भारत, जिसने ईरान पर हमला करने के दौरान अमरीका और इसराईल द्वारा अंतर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की कभी निंदा नहीं की, जब तक मौका अच्छा है, उतना ईरानी तेल खरीदेगा जितना वह खरीद सकता है।

एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय देश ने ईरानी क्रांतिकारी शासन को वैधता प्रदान कर दी है, जबकि अमरीका के साथ दोनों के जुड़ाव के बावजूद पश्चिम एशियाई महाशक्ति के रूप में उभरने के इसराईल के सपने को चकनाचूर कर दिया है। हालांकि ईरान का अधिकांश नागरिक और आर्थिक बुनियादी ढांचा बमबारी से नष्ट हो गया था लेकिन उसने खाड़ी देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुड़ी अर्थव्यवस्थाओं को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करके उन्हें भारी दर्द देने की अपनी क्षमता दिखाई। 

आसार : युद्ध का कोई भी नया प्रकोप जो ईरान को फिर से बमबारी के अभियान के दायरे में लाएगा, वह साथ ही अमीर खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए आॢथक दर्द को बढ़ाएगा, दुनिया भर में उच्च मुद्रास्फीति को गति देगा और अमरीका में संभावित मंदी का कारण बनेगा। नई शांति वार्ता की स्थिति में, ईरान के पास अधिक मजबूत सौदेबाजी की शक्ति होगी, क्योंकि वह अमरीका की रणनीतिक अक्षमता को उजागर करने में सक्षम होगा। एक सैन्य रूप से कमजोर ईरान की कूटनीति ने स्पष्ट रूप से उसकी कमजोरियों की भरपाई कर दी है।-अनीता इंदर सिंह


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