इंडिगो के झगड़े ने किया सह-प्रोमोटरों की ‘समस्याओं’ का खुलासा

punjabkesari.in Saturday, Jul 20, 2019 - 12:43 AM (IST)

इंटरग्लोब एविएशन लिमिटेड, जो भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो का संचालन करती है, के दो संस्थापकों के बीच चल रहे झगड़े उन मुद्दों को लेकर है जिन्हें अन्य बहुत से लोग कियांती (वाइन की एक किस्म) के गिलास पर सुलझा सकते थे, उभर रहे उद्यमियों के लिए एक संकेत हो सकते हैं कि नए उद्यमों के सह-प्रोमोशन के विचार की पुन: समीक्षा की जाए। 

परम्परागत ज्ञान निश्चित रूप से यह बताता है कि जब आपको शुरूआत करने की आवश्यकता होती है तो पूरक कौशल के साथ एक टीम की जरूरत होती है। मगर वर्षों से सह-प्रोमोटर वाले उपक्रमों पर नजर डालने से पता चलता है कि सह-प्रोमोटरों का एक-दूसरे से अलग होना एक सामान्य बात है और जैसा कि इंडिगो में शेयरधारकों की पूंजी का नष्ट होना दिखाता है, यह शेयरधारकों के लिए विनाशकारी हो सकता है। 

मतभेदों के कारण
हार्वर्ड बिजनैस स्कूल के प्रोफैसर और ‘द फाऊंडर्स डिलेमा’ के लेखक नोआम वासरमैन के अनुसार उच्च क्षमता वाले 65 प्रतिशत स्टार्टअप्स सह-संस्थापकों के झगड़े के कारण असफल हो जाते हैं। इसके कारणों के पीछे धन को लेकर मतभेद, व्यावसायिक रणनीति तथा नेतृत्व का तरीका हो सकता है। मगर इसके साथ ही ऐसी सांझेदारियों की प्रकृति के कारण मतभेद बहुत बढ़ जाते हैं। इस प्रकार राकेश गंगवाल एक सम्माननीय व्यक्ति हैं और हमारे पास राहुल भाटिया को कमतर मानने का कोई कारण नहीं है। फिर भी उनके शुरूआती समझौते के निर्माण, जिसने भाटिया द्वारा नियंत्रित कम्पनी को विशेष अधिकार दिए, एयरलाइन की इक्विटी में लगभग बराबर की हिस्सेदारी होने  के बावजूद, भविष्य में कलह के बीज बोए गए। 

यह एक ऐसी कहानी है जिसे बहुत बार दोहराया गया। साफ्टवेयर सेवा कम्पनी माइंडट्री लिमिटेड, जिसे हाल ही में अधिग्रहण के लिए एक लम्बी लड़ाई के बाद लार्सन एंड टूब्रो ने टेकओवर किया था, वी.जी. सिद्धार्थ, जिन्होंने 1999 में कम्पनी के गठन के समय 80 लाख डालर का निवेश किया था, अगले दो दशकों के लिए पृष्ठभूमि में चले गए और अन्य प्रोमोटरों को काम करते देख कर खुश थे। मगर गत वर्ष अपनी व्यावसायिक बाध्यताओं से प्रेरित होकर उन्होंने कम्पनी में अपनी 20 प्रतिशत हिस्सेदारी लार्सन एंड टूब्रो को बेच दी और न केवल अच्छे समय में बने व्यावसायिक संबंधों को समाप्त कर दिया बल्कि संस्थापकों के भविष्य को भी अवरुद्ध कर दिया। उन्होंने कभी भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी कि उनका अपना ही कोई उन्हें छोड़ जाएगा, उन्होंने किसी ऐसे शेयर ढांचे की व्यवस्था नहीं की थी जो उन्हें उनकी कम्पनी को बचाने में सक्षम बना पाता। 

भाई-बहनों में भी संघर्ष
यहां तक कि भाई-बहनों द्वारा भी सांझीदार के रूप में चलाई जा रही कम्पनियां अक्सर भीषण आंतरिक संघर्षों के साथ समाप्त हो जाती हैं। ऐसे मामले में रैनबैक्सी के सिंह बंधु तुरंत दिमाग में आते हैं जबकि रेमंड समूह के चेयरमैन गौतम सिंघानिया और उनके पिता विजयपत सिंघानिया, जिन्होंने कम्पनी की स्थापना की थी, के बीच गंदा झगड़ा यह दर्शाता है कि व्यावसायिक खींचतान तथा दबावों के सामने खून के संबंध कोई गारंटी नहीं होते। यस बैंक में भले ही दो संस्थापक सांझेदारों राणा कपूर तथा स्व. अशोक कपूर के पारिवारिक संबंध थे, अशोक के दुखद निधन के बाद कई वर्षों तक बोर्ड सीटों को लेकर झगड़ा चलता रहा और गत वर्ष ही एक समझौते पर पहुंचा जा सका। 

ये तथा अन्य कई उदाहरण संकेत देते हैं कि बहु प्रोमोटर वाले उद्यमों में ढांचागत असंगतियां उनके ढांचे में ही निर्मित हो सकती हैं। दरअसल आकांक्षावान उद्यमियों के लिए समयबद्ध पार्टनरशिप्स एक रास्ता हो सकता है। एक अन्य आई.टी. सेवा कम्पनी एच.सी.एल. लिमिटेड का मामला लें, जहां प्रभावशाली अर्जुन मल्होत्रा (1976 में कम्पनी का पहला कार्यालय नई दिल्ली के गोल्फ लिंक्स क्षेत्र स्थित उनकी दादी के घर की बरसाती में बनाया गया था) सहित अधिकतर सह-प्रोमोटरों ने समय के साथ अपनी हिस्सेदारी बेच दी थी, जिससे 60 प्रतिशत नियंत्रण हिस्सेदारी के साथ शिव नादर बच गए और कम्पनी को अपनी तरह से चलाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी उनको मिल गई। 

एकल संस्थापक सफल
इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि एकल उद्यमी द्वारा शुरू की गई कम्पनियों का भी ऐसा ही हश्र हुआ। अमरीका में हैनरी फोर्ड से लेकर जेफ बेजोस तक तथा भारत में धीरूभाई अम्बानी से सुनील मित्तल तक व्यावसायिक इतिहास ऐसे एकल संस्थापकों से भरा पड़ा है, जिन्होंने एक अत्यंत सफल व्यवसाय खड़ा किया। वास्तव में, एक हालिया शोध से पता चलता है कि विपरीत वास्तव में सच हो सकता है। न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के लियोनार्ड एन. स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनैस के जैसन ग्रीनबर्ग के ‘सोल सर्वाइवर्स: सोलो वैंचर्स वॢसज फाऊंङ्क्षडग टीम्स’ शीर्षक वाले पेपर तथा यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के व्हार्टन स्कूल के ईथन आर. मोलिक ने कहा कि सोलो फाऊंडर्स द्वारा शुरू की गई कम्पनियां उनकी तुलना में अधिक समय तक जीवित रहती हैं, जिन्हें टीमों द्वारा स्थापित किया गया हो। इसके अतिरिक्त एकल संस्थापकों द्वारा शुरू किए गए संगठन संस्थापक जोडिय़ों द्वारा शुरू किए गए संगठनों की तुलना में अधिक राजस्व उत्पन्न करते हैं। 

इसका मतलब यह नहीं है कि सभी उद्यमी एकल शुरूआत करें अथवा सभी संस्थापक टीमों का अंत अदालत में हो। किसी भी अन्य रिश्ते की तरह व्यवसाय चलाने के लिए निरंतर काम करने की आवश्यकता होती है और सह-संस्थापक गतिशील विश्वास और निरंतर संचार पर टिके होते हैं। सह-प्रोमोटरों में से प्रत्येक को उस भूमिका के लिए निर्णय लेने के साथ बहुत अच्छी तरह परिभाषित करने की आवश्यकता होती है जिसे अंतत: वह जिम्मेदारी दी गई है। समस्याएं तब शुरू होती हैं जब संस्थापक शुरू में कोशिश करते हैं और हर निर्णय पर आम सहमति बनाते हैं और शुरूआती उत्सुकता को छोडऩे के बाद उन मुद्दों पर एक-दूसरे का सामना करने से कतराते हैं, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।-एस. खन्ना


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