भारतीय समाज : रिश्तों में आती दरारें

punjabkesari.in Wednesday, Apr 08, 2026 - 05:44 AM (IST)

भारतीय समाज सदियों से अपने मजबूत पारिवारिक मूल्यों, आपसी प्रेम, विश्वास और सामूहिकता के लिए जाना जाता रहा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’की भावना केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली रही है। यहां रिश्तों की डोर केवल खून के संबंधों तक सीमित नहीं थी, बल्कि पड़ोसी, मित्र और समाज के हर व्यक्ति के साथ आत्मीय जुड़ाव महसूस किया जाता था। लेकिन आधुनिक समय में यह सुगंध धीरे-धीरे फीकी पड़ती महसूस होती है। रिश्तों में दरारें बढ़ रही हैं और विश्वास का आधार कमजोर होता जा रहा है।

आज के दौर में सबसे बड़ा बदलाव जीवनशैली में आया है। भागदौड़ भरी जिंदगी, प्रतिस्पर्धा और भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ ने इंसान को आत्मकेंद्रित बना दिया है। पहले परिवार के साथ बैठकर भोजन करना, सुख-दुख सांझा करना और एक-दूसरे की भावनाओं को समझना सामान्य बात थी। लेकिन अब मोबाइल, इंटरनैट और सोशल मीडिया ने वास्तविक संवाद को काफी हद तक कम कर दिया है। लोग आभासी दुनिया में अधिक सक्रिय हैं, जबकि वास्तविक रिश्तों में दूरी बढ़ती जा रही है। रिश्तों में दरार का एक प्रमुख कारण संवाद की कमी है। जब लोग खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करते, तो गलतफहमियां जन्म लेती हैं। छोटी-छोटी बातों को दिल में रखना, अहंकार के कारण पहल न करना और अपनी गलती स्वीकार न करना, ये सभी बातें रिश्तों को कमजोर करती हैं। पहले परिवार में बुजुर्गों का मार्गदर्शन होता था, जो हर विवाद को सुलझाने में अहम भूमिका निभाते थे। आज संयुक्त परिवारों का विघटन होने से यह संतुलन भी टूट गया है।

आर्थिक दबाव भी रिश्तों पर गहरा असर डाल रहा है। बढ़ती महंगाई, नौकरी की अनिश्चितता और करियर की चिंता ने लोगों को मानसिक रूप से तनावग्रस्त कर दिया है। इस तनाव का प्रभाव सीधे पारिवारिक संबंधों पर पड़ता है। पति-पत्नी के बीच विवाद, माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी और भाई-बहनों के बीच संपत्ति को लेकर झगड़े, ये सब आज के समाज में आम होते जा रहे हैं। रिश्ते अब भावनाओं की बजाय स्वार्थ और लाभ-हानि के तराजू पर तोले जाने लगे हैं। इसके अलावा, बदलती सोच और पीढिय़ों के बीच बढ़ता अंतर भी रिश्तों में खटास का कारण बन रहा है। नई पीढ़ी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्पेस को प्राथमिकता देती है, जबकि पुरानी पीढ़ी पारंपरिक मूल्यों को महत्व देती है। इस सोच के टकराव से टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। यदि दोनों पीढिय़ां एक-दूसरे को समझने का प्रयास करें, तो इस दूरी को कम किया जा सकता है लेकिन अक्सर ऐसा नहीं हो पाता।

मीडिया और मनोरंजन के बदलते स्वरूप ने भी समाज के मूल्यों को प्रभावित किया है। फिल्मों और धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले संबंधों की जटिलता और कभी-कभी नकारात्मक चित्रण का प्रभाव लोगों की सोच पर पड़ता है। इससे रिश्तों के प्रति लोगों की धारणा बदलती है और वे वास्तविक जीवन में भी उसी तरह के व्यवहार को अपनाने लगते हैं। हालांकि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। आज भी भारतीय समाज में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहां लोग रिश्तों को संजोकर रखते हैं और मुश्किल परिस्थितियों में भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते। जरूरत है तो केवल इस बात की कि हम अपने मूल्यों को पुन: पहचानें और उन्हें अपने जीवन में अपनाएं। रिश्तों की सुगंध को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी है संवाद और समझ। हमें अपने प्रियजनों के साथ समय बिताना चाहिए, उनकी बातों को ध्यान से सुनना चाहिए और अपनी भावनाओं को ईमानदारी से व्यक्त करना चाहिए। छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करना और माफी मांगने की आदत विकसित करना रिश्तों को मजबूत बनाता है।

इसके साथ ही, हमें भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में मानवीय मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए। पैसा और सफलता जरूरी हैं लेकिन उनसे अधिक महत्वपूर्ण हैं हमारे रिश्ते और उनका स्नेह। परिवार के साथ बिताया गया समय, एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना, यही असली सुख का आधार है। शिक्षा प्रणाली में भी नैतिक मूल्यों और जीवन कौशल पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है, ताकि नई पीढ़ी रिश्तों के महत्व को समझ सके। माता-पिता और शिक्षक बच्चों को केवल करियर की दिशा ही न दिखाएं, बल्कि उन्हें एक अच्छा इंसान बनने की भी प्रेरणा दें। अंतत:, यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय समाज में रिश्तों की सुगंध अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई, बल्कि वह कहीं न कहीं दब गई है। जरूरत है उसे फिर से जागृत करने की। यदि हम अपने व्यवहार में थोड़ी संवेदनशीलता, समझदारी और प्रेम जोड़ लें, तो यह सुगंध फिर से पूरे समाज को महका सकती है। रिश्ते जीवन की सबसे अनमोल पूंजी हैं। इन्हें संजोकर रखना ही हमारे समाज की असली पहचान है। यदि हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढिय़ों को एक ऐसा समाज मिलेगा, जहां संबंध केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। इसलिए समय की मांग है कि हम रिश्तों की इस टूटती डोर को फिर से मजबूती से बांधें और भारतीय समाज की उस पुरानी सुगंध को पुन: जीवंत करें, जो हमारी असली पहचान है।-प्रो. मनोज डोगरा
 


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