‘हाफिज सईद की सजा पर जश्न न मनाए भारत’

2020-11-25T05:06:56.437

मुम्बई सिलसिलेवार बम धमाकों का मास्टर माइंड तथा लश्कर-ए-तोएबा (एल.ई.टी.) और जमात-उद-दावा (जे.यू.डी.) आतंकी संगठनों के प्रमुख को दो मामलों में 10 वर्ष की सजा लाहौर की आतंकरोधी अदालत ने सुनाई थी। भारतीय सुरक्षा एजैंसियों और इन संगठनों द्वारा करवाए गए आतंकी हमलों के पीड़ित परिवारों के लिए यह जश्र मनाने का मौका नहीं। उसे भारत में आतंक मचाने के लिए सजा नहीं हुई है बल्कि उसे टैरर फंङ्क्षडग के लिए सजा सुनाई गई है। पाकिस्तान में यह सजा जेब कतरों को सजा देने के बराबर है। 

मुम्बई सीरियल बम धमाके 26 नवम्बर 2008 तथा 10 दिसम्बर 2008 को हुए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सूची में हाफिज सईद तथा उसके कुछ सहयोगियों का नाम रखा गया है। इसमें सिर्फ भारत के आक्रोश को शांत करने का मकसद है। दोनों देशों के बीच कोई भी टकराव अमरीका तथा इसके सहयोगियों को अफगानिस्तान में असर डालेगा। 

यह मामला अफगानिस्तान में तब तक था जब तक कि अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वहां से जाने का निर्णय नहीं किया। तालिबान तक पाकिस्तान की पहुंच अमरीका के लिए अफगानिस्तान से सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अमरीका को लम्बी अवधि तक पाकिस्तान का सहयोग यकीनी बनाना होगा। यह जानते हुए कि आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान मुश्किलें झेल रहा है तथा अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग एजैंसियों ने आर्थिक खैरात की असीम मांग को देखते हुए पाकिस्तान को अमरीका ने फाइनांशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफ.ए.टी.एफ.) की ग्रे सूची में डाल दिया है। अफगानिस्तान के लिए अमरीकी विशेष सलाहकार जलमय खलील जाद की नियुक्ति से पहले इसे किया गया। 

उस समय तक हाफिज सईद तथा उसका गैंग भारत में अपनी अनेक सफलताओं की महिमा में आनंद उठा रहा था। एफ.ए.टी.एफ. मनी लांड्रिंग तथा टैरर फंडिंग के खिलाफ एक वैश्विक  प्रहरी है।  मुम्बई धमाकों पर कोई भी प्रगति नहीं हो रही थी तथा पाकिस्तानी सेना ने अंतर्राष्ट्रीय दबाव के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए लोगों के लिए जमानत को यकीनी बना दिया। 2018 के चुनावों में जे.यू.डी. तथा एल.ई.टी. को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने के लिए पाकिस्तान सेना के प्रयास असफल हो गए क्योंकि चुनावी प्रदर्शन निराशाजनक था। 

इस कारण जब एफ.ए.टी.एफ. का दबाव बढ़ गया तो पाकिस्तान ने दो पहलुओं को लांच किया। तब पाकिस्तान ने आतंकवाद से प्रतिबद्धता के चलते इसके प्रमुख हाफिज सईद को जुलाई 2019 में गिरफ्तार किया। इसी समय भारतीय आरोपों को खारिज करने के लिए पाकिस्तान ने अपने यहां आतंकवाद के लिए भारत पर गम्भीर आरोप लगाए। पाकिस्तान ने अपने यहां हुए हमलों के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया। इसके तहत कई अपराधियों को पकड़ा गया तथा उन्हें पाकिस्तानी अदालतों ने जेल इसलिए जेल भेज दिया क्योंकि उन पर आरोप लगाया कि वे लोग भारत की आज्ञा पर कार्रवाई कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण आर्मी पब्लिक स्कूल के बच्चों की तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान द्वारा की गई हत्या थी जिसे पेशावर में दिसम्बर 2014 में अंजाम दिया गया। इन घटनाओं के आकाओं को सजा दी गई और उन्हें फांसी पर लटका दिया गया।

इसी अदालत द्वारा हाफिज सईद को जेल की सजा दूसरी बार सुनाई गई है। इससे पहले उसे 12 फरवरी 2020 को 11 सालों की सजा सुनाई गई थी। यह सजा पेरिस में एफ.ए.टी.एफ. की बैठक से पहले सुनाई गई थी। यह बैठक पाकिस्तान की उन कार्रवाइयों को गति देने की योजना के बारे में थी जो उसे एंटी-मनी लॉङ्क्षड्रग तथा आतंक को वित्तीय सहायता पहुुंचने को नियंत्रित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञा माननी थी। एफ.ए.टी.एफ. की ग्रे लिस्ट से पाकिस्तान का बाहर आना दोहा में तालिबान के साथ चली सफलतापूर्वक बातचीत से जुड़ा है। इसके अलावा यह मुद्दा अफगानिस्तान में अमरीकी समर्थन वाली अशरफ गनी सरकार की स्थिरता से भी जुड़ा है। 

अमरीका इस बात से जागरूक है कि अशरफ गनी की सरकार बिना किसी अमरीकी सहायता के तालिबान से लोहा नहीं ले सकती। इस कारण पाकिस्तान को बांध कर रखना लाजिमी है। नई बाइडेन सरकार के चार्ज लेने के बाद पाकिस्तान से अमरीकी मांग का परिवर्तन सम्भव नहीं है। इसलिए हाफिज सईद को उसके संरक्षकों द्वारा बाहर निकाले जाने तक कुछ और समय लाहौर की कोट लखपत जेल में शांति से बैठाना होगा। 

हालांकि एल.ई.टी. तथा जे.यू.डी. नेताओं की हिरासत से भारतीय सुरक्षा एजैंसियों की इन संगठनों के हमलों के बारे में अनुभूति बदलनी नहीं चाहिए। पूर्व की तरह ही इन संगठनों के नेता निरंतर ही आंगतुकों के माध्यम से अपने आतंक के मूलभूत ढांचे को प्राप्त करना जारी रखेंगे। यह भी दिमाग में रखना होगा कि पाकिस्तान मसूद अजहर तथा उसके ग्रुप जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहा। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के खिलाफ जैश-ए-मोहम्मद पाकिस्तानी सेना के लिए एक नया पसंदीदा ग्रुप हो सकता है।(लेखक : सुरक्षा विशेषज्ञ और आई.बी. रॉ के अधिकारी रहे है।)-अविनाश मोहननय


Pardeep

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