भाजपा की चुनावी मशीन को कैसे आकार देती है मोदी-शाह की सांझेदारी

punjabkesari.in Tuesday, Mar 17, 2026 - 05:54 AM (IST)

जैसा कि अब कई राज्यों में चुनाव नजदीक आ रहे हैं, हम यह जानते और महसूस करते हैं कि सफलता शायद ही कभी अचानक मिली प्रेरणा से आती है। यह आमतौर पर योजना, अनुशासन और टीम वर्क से आती है। पिछले एक दशक में, भारतीय राजनीति ने एक अनूठी सांझेदारी देखी है, जिसे अक्सर आधुनिक भारत के सबसे प्रभावी राजनीतिक संयोजनों में से एक के रूप में वर्णित किया गया है-नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीच का कामकाजी रिश्ता।

उनकी राजनीतिक शैली आखिरी समय के फैसलों या भावनात्मक प्रतिक्रियाओं पर नहीं टिकी। इसकी बजाय, यह तैयारी, समन्वय और चुनावों के लगभग कॉर्पोरेट-शैली के प्रबंधन पर आधारित है। जब चुनाव नजदीक आते हैं, तो पार्टी अचानक प्रचार के लिए नहीं जागती। मोदी और शाह के बीच की समझ नई नहीं है। उनकी राजनीतिक सांझेदारी गुजरात में साथ काम करने के समय से कई साल पुरानी है। उन वर्षों के दौरान, उन्होंने काम करने की एक ऐसी शैली विकसित की, जहां भूमिकाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित थीं लेकिन संचार निरंतर बना रहता था। नरेंद्र मोदी को व्यापक रूप से चेहरे, संचारक और उस नेता के रूप में देखा जाता है, जो बड़े राष्ट्रीय संदेश को आगे बढ़ाते हैं। दूसरी ओर, अमित शाह को अक्सर रणनीतिकार के रूप में वर्णित किया जाता है, वह व्यक्ति, जो राजनीतिक युद्धक्षेत्र का सूक्ष्म विवरण के साथ अध्ययन करता है। जिम्मेदारियों का यह विभाजन एक सुचारू प्रणाली बनाता है। एक व्यक्ति विजन और संदेश पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि दूसरा संगठन और कार्यान्वयन पर। राजनीतिक हलकों में लोग अक्सर कहते हैं कि मोदी राष्ट्र से बात करते हैं, जबकि शाह पार्टी से।

भाजपा के चुनाव प्रबंधन का चौंकाने वाला पहलू यह है कि तैयारी कितनी जल्दी शुरू हो जाती है। जब किसी राज्य में चुनाव की उम्मीद होती है, तो जमीनी काम आमतौर पर कम से कम 6 महीने पहले शुरू हो जाता है। उस समय तक, सर्वेक्षण किए जा चुके होते हैं, स्थानीय नेताओं का आकलन किया जा चुका होता है और निर्वाचन क्षेत्र स्तर का डाटा केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचना शुरू हो जाता है। अमित शाह विस्तृत जानकारी पर जोर देने के लिए जाने जाते हैं। पिछली बार किस बूथ पर प्रदर्शन खराब रहा? कौन-सा स्थानीय मुद्दा मतदाताओं को परेशान कर रहा है? कौन-सा समुदाय उपेक्षित महसूस कर रहा है? ये सवाल चुनाव से एक हफ्ते पहले नहीं पूछे जाते, ये महीनों पहले पूछे जाते हैं। इन विवरणों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने के लिए टीमें बनाई जाती हैं। बूथ स्तर की समितियां सक्रिय की जाती हैं। स्थानीय कार्यकत्र्ताओं से संपर्क किया जाता है और धीरे-धीरे, पूरे राज्य में राजनीतिक गतिविधियों का एक नैटवर्क फैलने लगता है। जब तक चुनाव की तारीखों की घोषणा होती है, तब तक अधिकांश जमीनी काम पहले ही पूरा हो चुका होता है।

बूथ-स्तर पर ध्यान : भाजपा संगठन के भीतर सबसे अधिक दोहराए जाने वाले वाक्यांशों में से एक ‘बूथ प्रबंधन’ है। विचार सरल है-चुनाव अंतत: व्यक्तिगत मतदान केंद्रों के स्तर पर तय होते हैं। अमित शाह की संगठनात्मक शैली के तहत, पार्टी अक्सर प्रत्येक बूथ की जिम्मेदारी विशिष्ट कार्यकत्र्ताओं को सौंपती है। उनका काम यह सुनिश्चित करना है कि मतदाताओं से संपर्क किया जाए, स्थानीय चिंताओं को समझा जाए और पार्टी का संदेश हर घर तक पहुंचे। हालांकि यह सुनने में सरल लग सकता है लेकिन इसके लिए भारी समन्वय की आवश्यकता होती  है। सूचियां तैयार की जाती हैं, बैठकें आयोजित की जाती हैं और संचार केंद्रीय नेतृत्व से लेकर पार्टी की सबसे छोटी इकाइयों तक प्रवाहित होता है। इस तरह का अनुशासन यह सुनिश्चित करता है कि जब अभियान अपने चरम पर पहुंचे, तो ढांचा पहले से ही मजबूत हो।

मोदी की भूमिका : जहां संगठनात्मक ढांचा पृष्ठभूमि में चुपचाप काम करता है, नरेंद्र मोदी अभियान को सार्वजनिक ऊर्जा प्रदान करते हैं। उनकी रैलियां अक्सर बड़े आयोजन बन जाती हैं, जो भारी भीड़ और व्यापक मीडिया का ध्यान आकॢषत करती हैं। लेकिन प्रत्येक रैली के पीछे सावधानीपूर्वक योजना होती है। स्थानों का चयन रणनीतिक रूप से किया जाता है। विषयों का चयन उस विशेष क्षेत्र की चिंताओं के आधार पर किया जाता है। यहां तक कि दौरों का समय भी अधिकतम राजनीतिक प्रभाव पैदा करने के लिए तय किया जाता है। कई मायनों में, मोदी के भाषण अभियान की भावनात्मक और प्रेरक परत प्रदान करते हैं। इस नेतृत्व शैली की एक और महत्वपूर्ण विशेषता पार्टी कार्यकत्र्ताओं के साथ नियमित बातचीत है। बैठकें बार-बार आयोजित की जाती हैं-कभी भौतिक, कभी आभासी, जहां जमीनी स्तर के नेताओं से फीडबैक एकत्र किया जाता है। यह एक दोतरफा प्रणाली बनाता है। केंद्रीय नेतृत्व निर्देश देता है लेकिन वह जिला नेताओं और बूथ स्तर के कार्यकत्र्ताओं की रिपोर्ट भी सुनता है। 

उम्मीदवारों का सावधानीपूर्वक चयन : उम्मीदवार चयन एक और क्षेत्र है, जहां मोदी-शाह शैली दिखाई देती है। केवल वरिष्ठता या लोकप्रियता पर भरोसा करने की बजाय, कई कारकों का अध्ययन किया जाता है। सर्वेक्षण, स्थानीय फीडबैक, प्रदर्शन रिकॉर्ड और जनता की धारणा, सभी इसमें भूमिका निभाते हैं। कभी-कभी इससे चौंकाने वाले फैसले भी होते हैं। मौजूदा विधायकों को बदला जा सकता है, यदि पार्टी को लगता है कि कोई नया चेहरा बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। 
उनकी रणनीति का एक और तत्व निरंतर सीखना है। प्रत्येक चुनाव के बाद, चाहे जीत हो या हार, पार्टी आंतरिक समीक्षा करती है। डाटा का विश्लेषण किया जाता है, गलतियों की पहचान की जाती है और भविष्य के लिए रणनीतियां समायोजित की जाती हैं।

अनुशासन की संस्कृति : शायद मोदी-शाह सांझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव पार्टी के भीतर अनुशासन की संस्कृति है। कार्यकत्र्ता समझते हैं कि अभियान कोई अनियमित घटनाएं नहीं, बल्कि सावधानीपूर्वक नियोजित ऑप्रेशन हैं। हर स्तर के नेताओं से समय सीमा का पालन करने, बैठकों में शामिल होने और सौंपे गए कार्यों को निष्पादित करने की अपेक्षा की जाती है। यह अनुशासित दृष्टिकोण पार्टी को दिशा और गति का अहसास कराता है। 
चाहे कोई भाजपा का समर्थन करे या नहीं, कई राजनीतिक पर्यवेक्षक एक बात पर सहमत हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सांझेदारी ने भारत में चुनाव आयोजित करने के तरीके को बदल दिया है। उनकी पद्धति दिखाती है कि राजनीतिक सफलता केवल भाषणों या नारों के बारे में नहीं है, यह योजना, टीम वर्क और उस क्षण से महीनों, कभी-कभी सालों पहले काम करने की क्षमता के बारे में भी है, जब मतदाता अंतत: पोलिंग बूथ में कदम रखते हैं। और आधुनिक राजनीति में, यही तैयारी सारा अंतर पैदा कर सकती है, जिसे दुर्भाग्य से हमारी मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस पूरी तरह से भूल और छोड़ चुकी है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में भाजपा के भविष्य की पार्टी बने रहने की अधिक संभावना है।-देवी एम. चेरियन


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