हिजाब, हंगामा और शिक्षण संस्थान : हर जगह राजनीति क्यों

punjabkesari.in Thursday, Feb 24, 2022 - 05:07 AM (IST)

उर्दू के मशहूर शायर मजाका लखनवी ने क्या खूब कहा है कि : ‘तेरे माथे पे यह आंचल बहुत खूब है, लेकिन तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था’। लेकिन वह कहते हैं न कि लड़कियों के दुख अजब होते हैं, सुख उससे भी अजब। हंस रही है और काजल भीगता है साथ-साथ! वर्तमान दौर में महिलाओं की स्थिति कुछ इसी तरह की है। महिलाओं के लिए अक्सर समता-समानता की बात होती है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा सम्भव है? शायद नहीं! यहां मुद्दा यह नहीं है कि महिला-पुरुष में से श्रेष्ठ कौन है, यहां चर्चा समता और समानता की भी नहीं हो रही, बल्कि वर्तमान दौर में महिलाओं के नाम पर एक अलग ही राजनीति इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। 

यूं तो महिलाओं को मुद्दा बनाकर राजनीति करना कोई नई बात नहीं, लेकिन अफसोस कि महिलाएं खुद इस जंग में मोहरा बनने को बेताब हुए जा रही हैं। एक तरफ इंसान चांद और मंगल पर जीवन की संभावनाएं तलाश रहा है, लेकिन दूसरी तरफ महिलाओं के कपड़ों के नाम पर राजनीति होना विकृत मानसिकता को प्रदॢशत करता है। क्या कपड़े किसी के व्यक्तित्व की पहचान हो सकते हैं? बेशक नहीं। लेकिन फिर भी देश में इन दिनों एक धर्म विशेष की महिलाओं के कपड़ों के नाम पर राजनीति का बाजार गर्म हुआ जा रहा है, जिसकी आग कर्नाटक के शिक्षण संस्थानों से देश भर में फैलती जा रही है। 

यह सच है कि आज भी देश में महिलाओं को पुरुषों के समान शिक्षा नहीं दी जाती, खासकर मुस्लिम महिलाओं की बात करें तो उनकी स्थिति तो और बुरी है। ऐसे में कपड़ों के नाम पर शिक्षण संस्थानों में राजनीति करना कहां तक उचित है? क्या पहनावा शिक्षा से बढ़ कर हो गया है? वैसे देखा जाए तो धर्म कोई भी हो, लेकिन उसके रीति-रिवाजों का पालन करने की जिम्मेदारी महिलाओं की ही होती है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को ही मर्यादा की शिक्षा दी जाती है। लक्ष्मण रेखा भी उन्हीं के लिए खींची जाती है। ऐसे में अगर महिलाएं उस सीमा को लांघने का प्रयास करें तो उनके चरित्र पर उंगली उठा दी जाती है। यही वजह है कि महिलाएं अक्सर अपने खिलाफ हो रहे अन्याय का विरोध तक नहीं कर पातीं। 

वहीं इन दिनों राजनीति में नया ही प्रयोग शुरू हो गया है, जहां महिलाओं को मोहरा बना कर देश में अशांति फैलाई जाती है। यहां बात महिलाओं के हक या अधिकार की नहीं, बल्कि महिलाओं को आगे करके किस तरह वैश्विक पटल पर देश को बदनाम करने का खेल रचा जाता है, इससे हर कोई वाकिफ है। यह बात समझ से परे है कि आखिर शिक्षण संस्थानों को राजनीति का अखाड़ा क्यों बनाया जा रहा है। यह पहला मामला नहीं है जब शिक्षण संस्थानों में राजनीति का रंग परवान चढ़ा है। देश के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में ही राजनीति का नंगा नाच किया गया और विडंबना देखिए कि देश के एक बड़े राजनीतिक दल ने उसका समर्थन तक किया। आज एक बार फिर शिक्षण संस्थानों में हिजाब को लेकर राजनीति हो रही है। देश को हिन्दू-मुस्लिम में बांटने का प्रयत्न किया जा रहा है। 

ऐसे में कहीं यह तो नहीं कि महिलाओं को शिक्षा से दूर रखने की साजिश की जा रही हो? इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि आज भी देश में आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाएं अपने अधिकारों से वंचित हैं। हमारे ही देश में पुरुषों का एक वर्ग ऐसा भी है जो महिलाओं को चारदीवारी में कैद रखने की वकालत करता है। वह किसी कीमत पर नहीं चाहता कि महिलाओं को समान अधिकार मिलें, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनकी सत्ता छिन जाने का भय बना रहेगा। वे चाहते हैं कि महिलाएं कमजोर बनी रहें, जिन पर वे अपनी हुकूमत चला सकें। ऐसे में उल्लेखनीय बात यह है कि महिलाओं को इन  बातों को समझना होगा, तभी उनका सर्वांगीण विकास सम्भव हो पाएगा। 

वैसे हमारे देश में महिलाओं को सदैव बड़ों का सम्मान करने की सीख दी जाती है। मगर इसके लिए क्या घूंघट या हिजाब में रहना जरूरी है? डा. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि पर्दा प्रथा की वजह से मुस्लिम महिलाओं में दासता और हीनता की मनोवृत्ति बनी रहती है। पर्दा प्रथा के कारण मुस्लिम महिलाओं के मानसिक व नैतिक विकास में अवरोध उत्पन्न होता है। यह सब जानने-समझने के बाद भी मुस्लिम महिलाओं का हिजाब को लेकर शिक्षण संस्थानों में विरोध प्रदर्शन करना महज राजनीति से प्रेरित लगता है। इतना ही नहीं, हमने बचपन से ही यही सीखा और सुना है कि स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में यूनीफार्म इसलिए होती है, ताकि ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और जाति-धर्म का भेद भूल कर बच्चे सिर्फ पढ़ाई कर सकें। फिर इस मामले को लेकर बेवजह कट्टरता किस काम की। मान लीजिए कोई लड़की हिजाब पहन कर स्कूल-कॉलेज तक आ भी गई तो क्लास के भीतर तो उसे हटा कर बैठना स्वाभाविक है। ऐसे में शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए, न कि अनर्गल प्रलाप की। धर्म हमें बांटने का काम कर सकता है, लेकिन इंसानियत हमें जोड़ती है। 

ऐसे में यह लड़कियों को स्वयं सोचना चाहिए कि वे शिक्षण संस्थानों में व्यक्तित्व विकास और शिक्षा के लिए गई हैं या फिर राजनीति का मोहरा बनने। गौरतलब है कि कर्नाटक सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम 1983 की धारा-133(2) के तहत छात्र-छात्राओं को शिक्षण संस्थानों में विश्वविद्यालय प्रशासनिक बोर्ड द्वारा निर्धारित पहरावा पहनने की वकालत की है, जिसके पीछे साफ मकसद है कि शिक्षण संस्थानों में समता व समानता का भाव बना रहे। 

वहीं भारतीय संविधान के अनुच्छेद-25 में धर्म को मानने व उसके रीति-रिवाजों का अनुसरण करने की बात कही गई है। लोक व्यवस्था तथा संविधान के भाग 3 के उपबंधों के तहत ही यह अधिकार दिए गए हैं। वही संविधान का अनुच्छेद 19 (2) राज्यों को उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार भी देता है। ऐसे में अदालत का निर्णय क्या होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन मेरा इतना ही मानना है कि शिक्षण संस्थानों को राजनीति का केंद्र किसी भी परिस्थिति में नहीं बनाना चाहिए। जिस देश में गुरुकुल की परम्परा रही हो, जहां राजा और रंक में कोई भेदभाव नहीं किया जाता हो, उस देश में शिक्षण संस्थानों को मजहबी रंग दिया जाना निश्चित ही देश को पतन की राह पर ले जाएगा।-सोनम लववंशी
 


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