राजनीतिक दखलंदाजी का शिकार गुरुद्वारा कमेटी चुनाव

2021-07-23T05:58:55.197

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के आम चुनाव में इस बार राजनीतिक दखलंदाजी का बहुत शोर है। चुनाव की तारीख निर्धारित करने से लेकर पंजीकृत धार्मिक पार्टियों को चुनाव चिन्ह देने तक खूब सियासत होती रही है। दिल्ली सरकार के गुरुद्वारा चुनाव मंत्री रजिन्द्र पाल गौतम द्वारा सियासी पाॢटयों को चुनाव न लडऩे देने के गुरुद्वारा चुनाव निदेशालय को भेजे गए आदेश के बाद से सियासत गरमा गई थी। मंत्री के आदेश को रद्द करवाने के लिए शिरोमणि अकाली दल (बादल) ने दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंच की, जिसके बाद मंत्री के आदेश पर सरकार को कोर्ट की कई बातें सुननी पड़ीं। 

गुरुद्वारा चुनाव करवाने की जिम्मेदारी डायरैक्टर गुरुद्वारा चुनाव की है, इसलिए मंत्री के आदेश को कोर्ट ने राजनीतिक दखलंदाजी के तौर पर माना। इसी वजह से बादल दल अपना चुनाव चिन्ह बचाने में सफल रहा। गुरुद्वारा चुनाव मंत्रालय पर लगातार आरोप लग रहे हैं कि सियासी दखल देकर भाई रंजीत सिंह की पार्टी पंथक अकाली लहर और भाई बलदेव सिंह वडाला की पार्टी सिख सद्भावना दल को तय नियम एवं शर्तों का पालन नहीं करने के बावजूद चुनाव चिन्ह आबंटित किए गए। इसलिए इस बार का चुनाव पहले से ही राजनीतिक दखलंदाजी को लेकर सुर्खियों में है। 

चुनाव कब होगा, इसको लेकर दिल्ली सरकार में एक बार फिर मंथन शुरू हो गया है लेकिन तारीखों का ऐलान अभी तक नहीं हो सका है। हालांकि वीरवार को दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाइकोर्ट में हलफनामा दाखिल करके कहा कि वह 22 अगस्त को चुनाव करवा सकती है। उधर कुछ धार्मिक पार्टियां चाहती हैं कि चुनाव टल जाएं लेकिन कुछ पाॢटयां चाह रही हैं कि तुरंत आम चुनाव कराया जाए।

‘दो साल बेमिसाल’ के काम पर वोट मांग रहा अकाली दल : दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजिंद्र सिंह सिरसा ‘दो साल बेमिसाल’ के नारे के साथ चुनाव मैदान में अपनी जीत सुनिश्चित मान कर चल रहे हैं। सिरसा टीम की पूरी कोशिश है कि दो साल में किए गए बेहतरीन कार्यों को ही आधार बनाकर संगत के पास जाया जाए और उनसे वोट मांगे जाएं। सिरसा ने कोरोना काल में आॢथक संकट में फंसे सिख परिवारों के लिए बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है। साथ ही कोविड से मरने वाले सिखों के परिवारों को प्रति माह 2500 रुपए पैंशन देने, जिन बच्चों ने पिता को खोया है उनकी 12वीं तक पढ़ाई मु त करवाने, ये बच्चे अगर 12वीं के बाद कालेजों में पढऩा चाहते हैं तो इन बच्चों को कमेटी के दिल्ली विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त कालेजों (खालसा कालेज) में मु त शिक्षा प्रदान करवाने का दावा कर चुके हैं। 

जिन सिख बेटियों के अभिभावक कोरोना काल में मारे गए हैं, उनकी शादी होने वाली होगी तो उन बेटियों को गुरुद्वारा कमेटी 21,000 रुपए शगुन के रूप में देगी। साथ ही उन बेटियों के शादी-विवाह (आनंद कारज) का प्रबंध गुरुद्वारा साहिब में कमेटी करेगी। जिन रागी, ढाडी, कीर्तनी या ग्रंथी सिंहों ने अपना रोजगार खोया है, उन्हें सिंह सभाओं की सिफारिश पर उनकी जरूरत के अनुसार आर्थिक मदद करने का भी ऐलान किया है। खास बात यह है कि आने वाले समय में गुरु तेग बहादुर विश्वविद्यालय आदि बनाने का भी संगत को वायदा किया है। 

इस बीच कश्मीर की सिख लड़की मनमीत कौर व उसके पति सुखप्रीत सिंह को कमेटी में नौकरी देकर सिरसा ने खूब वाहवाही लूटी है। यह कमेटी चुनाव में कितना असरदार होगा, यह तो समय ही बताएगा लेकिन कमाल की बात यह है कि 6 साल कमेटी महासचिव के तौर पर पूर्व अध्यक्ष मंजीत सिंह जी.के. के साथ रहते किए गए कार्यों बारे बताने से सिरसा संकोच कर रहे हैं। साथ ही अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की तस्वीर लगाने से गुरेज कर रहे हैं। 

सरना दल ने उठाए सिरसा पर सवाल : शिरोमणि अकाली दल (दिल्ली) ने दिल्ली कमेटी के अध्यक्ष मनजिंद्र सिंह सिरसा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सरना बंधुओं का कहना है कि गुरुद्वारों की गोलक के पैसे से देशभर के लोगों की मदद करने का जि मा उठा रखा है, जबकि दिल्ली और पंजाब के जो सिख जेलों में बंद हैं, उनकी मदद के लिए सिरसा आगे नहीं आए। दिल्ली कमेटी के कर्मचारियों को समय पर वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं, जबकि अपना चेहरा चमकाने के लिए गुरु की गोलक लुटाई जा रही है। 

सरना बंधुओं का ड्रीम प्रोजैक्ट रहा बाला साहिब अस्पताल अब ठंडे बस्ते में चला गया है। 500 बिस्तर का आधुनिक अस्पताल बनना था, क्या हुआ? हालांकि सिरसा अस्पताल की बजाय कोविड सैंटर बना रहे हैं। कोविड सैंटर को अस्पताल नहीं माना जा सकता। अस्पताल में आपरेशन थिएटर (ओ.टी.), ब्लड बैंक आदि सुविधाएं होती हैं, जबकि यहां ऐसा कुछ नहीं। गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब में बने कोविड केयर सैंटर के नाम पर करोड़ों रुपए का दान मिला, खुद अमिताभ बच्चन ने 12 करोड़ रुपए दान दिए, कमेटी कोई हिसाब नहीं दे रही। सरना बंधु अब सवाल पूछ रहे हैं कि जब करोड़ रुपए कमेटी को मिल गए तो कमेटी में भुखमरी जैसे हालात क्यों हैं? 

सरना बंधु कहते हैं कि डिलाइट कंपनी की ऑडिट रिपोर्ट कब से आई हुई है लेकिन सिरसा दबाए बैठे हैं। सरना बंधुओं को इस बात का अफसोस है कि आॢथक गड़बड़ी के चलते अगर तत्कालीन अध्यक्ष मंजीत सिंह जी.के. कुर्सी छोड़ सकते हैं तो मनजिंद्र सिरसा कुर्सी क्यों नहीं छोड़ रहे, जबकि उन पर दो-दो एफ.आई.आर. दर्ज हो चुकी हैं। 

पहली बार मैदान में उतरी ‘जागो’ पार्टी : मंजीत सिंह जी.के. की पार्टी ‘जागो’ पहली बार अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरी है। पार्टी 46 में से 41 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी ने कुछ अलग करने की इरादे से अधिकतर नए चेहरों को मौका दिया है। इनमें 5 महिला उ मीदवार भी चुनाव लड़ रही हंै। खास बात यह है कि टीम जी.के. में 3 पी.एच.डी. योग्यता वाले उ मीदवार भी हैं, जिनके बल पर जी.के. बदलाव लाने की तैयारी में हैं। जी.के. कमेटी अध्यक्ष रहते हुए किए गए कार्यों को भी चुनाव में प्रमुखता से बताकर अपनी पार्टी के लिए वोट मांग रहे हैं। 

सुखबीर की दोहरी नीति : गुरुद्वारा कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष मंजीत सिंह जी.के. के खिलाफ जब कथित भ्रष्टाचार के मामले में एफ.आई.आर. दर्ज हुई तो शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने तुरंत ही उनसे गुरुद्वारा कमेेटी ओर प्रदेश अकाली दल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा मांग लिया था लेकिन अब मनजिंद्र सिंह सिरसा के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर दो-दो एफ.आई.आर. दर्ज हो चुकी हैं, यहां तक कि अदालत ने सिरसा के खिलाफ लुक-आऊट नोटिस तक जारी कर दिया है, बावजूद इसके उनसे इस्तीफा मांगने के मुद्दे पर सुखबीर का चुप्पी साधे रखना शंका पैदा करता है। इन सबके बीच यह बात भी चर्चा का विषय बन गई है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जी.के. पर किसी साजिश के तहत ही आरोप लगाए गए और उनके खिलाफ एफ.आई.आर. दाखिल करवाई गई, जिसके चलते उनसे इस्तीफा ले लिया गया? 

...और अंत में : गुरुद्वारा कमेटी चुनाव इस बार प्रत्याशियों के लिए मुसीबत बन गया है। बड़े-बड़े दिग्गज प्रत्याशी भी चुनाव के लंबा ङ्क्षखचने के कारण मानसिक और आॢथक रूप से परेशान हो गए हैं लेकिन, वोटरों की खूब मौज है। वोटर संबंधित कमेटी प्रत्याशी के घर आए दिन कोई न कोई काम लेकर पहुंच रहे हैं और उनसे पैसे की ही डिमांड करते हैं। यहां तक कि सूरज ढलने के बाद बोतल के शौकीन वोटर दरवाजा भी खटखटाने लगते हैं। ऐसी स्थिति में कई प्रत्याशी दुखी हो गए हैं। उनका चुनावी बजट गई गुणा अधिक बढ़ चुका है। कई प्रत्याशी तो मैदान ही छोडऩे का मन बना चुके हैं। उनका कहना है कि अगर चुनाव इसी तरह टलता गया तो वे कब तक मु त में वोटरों पर धन लुटाते रहेंगे?- दिल्ली की सिख सियासत सुनील पांडेय
 


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Content Writer

Pardeep

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