सरकारी लापरवाही डाल रही भाखड़ा बांध को खतरे में
punjabkesari.in Tuesday, Aug 04, 2026 - 04:02 AM (IST)
सर छोटू राम द्वारा पंजाब के किसानों के संबंध में देखे गए सपने और ऐतिहासिक निर्णय को केंद्र एवं मौजूदा सरकारों द्वारा अनदेखा करते हुए पंजाब तथा पंजाब के लोगों के जान-माल को खतरे में डाला जा रहा है, क्योंकि आज से लगभग सौ साल पहले, 1925 में देखे गए सपने में पंजाब की किसानी को ध्यान में रखते हुए उस समय की पंजाब सरकार के पूर्व मंत्री सर छोटू राम के प्रयासों के कारण हुए संयुक्त पंजाब और स्टेट ऑफ बिलासपुर (अब हिमाचल प्रदेश) के सन 1944 के समझौते के मद्देनजर, सन 1948 में भाखड़ा नंगल बांध का निर्माण शुरू हुआ था जो 1963 में पूरा हो गया था।
लेकिन तत्कालीन पंजाब से बने राज्यों हरियाणा, हिमाचल और वर्तमान पंजाब ने समय-समय पर भाखड़ा नंगल बांध से निकल रही नहरों और सतलुज नदी पर दावे ठोक कर अलग-अलग मुद्दे और अभियान शुरू किए लेकिन किसी भी सरकार ने, चाहे हिमाचल हो, हरियाणा या पंजाब अथवा भाखड़ा बांध पर पंजाब का हक छीनने के लिए केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया भाखड़ा ब्यास मैनेजमैंट बोर्ड (पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 की धारा 78), ने इस अधिकार का इस्तेमाल केवल बांध से बिजली उत्पादन करने या एक राज्य का पानी दूसरे राज्य को देकर सिर्फ राजनीतिक वाह-वाही लूटने के लिए ही किया है।
परंतु जिस सपने के तहत इस बांध को सतलुज नदी पर बनाया गया था, उसका मुख्य उद्देश्य प्राथमिकता के आधार पर किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाना था, ताकि बिजली का उपयोग करके भूजल स्रोतों से पीने योग्य पानी निकालने की जरूरत न पड़े और आने वाली पीढ़ी को विरासत के रूप में जल सौंपा जा सके। लेकिन मौजूदा सरकारों ने न केवल भूजल स्रोतों को नकारा, बल्कि इसके विपरीत बांध से पैदा हो रही बिजली को उसी पानी को जमीन से निकालने में व्यर्थ किया, जबकि यह बिजली पंजाब के उद्योगों और लोगों के कल्याण के लिए इस्तेमाल की जा सकती थी। यहां तक कि सरकारों ने सतलुज नदी, जो आज पंजाब में बह रही है, को सिर्फ एक बरसाती नाला समझ लिया है। इसके कारण पर्यावरण पर बुरा असर पडऩे के साथ-साथ बाढ़ से पंजाब को भारी नुकसान झेलना पड़ता है। इसका मुख्य कारण भाखड़ा मैनेजमैंट बोर्ड, केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों द्वारा बांध की ‘डीसिल्टिंग’ यानी बांध में पिछले दशकों से जमा हो रही मिट्टी, पत्थर आदि की सफाई न करवाना है।
इसके कारण बांध की क्षमता बहुत बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है और यही कारण है कि बांध में पहाड़ों से आने वाले बाढ़ और बारिश के पानी को संभालने की क्षमता घट चुकी है। बांध बहुत जल्दी खतरे के निशान तक पहुंच जाता है और उतनी ही तेजी से खाली हो जाता है, क्योंकि डीसिल्टिंग न कराने के कारण उसके पास पानी संभालने की क्षमता कम हो चुकी है। जब भी बांध का पानी खतरे के स्तर पर पहुंचता है, तो फ्लड गेट खोलने से पंजाब के निचले इलाके बाढ़ की मार से भारी नुकसान झेलते हैं। यहां तक कि यह खतरा इस हद तक पहुंच चुका है कि डीसिल्टिंग न होने के कारण बांध में जमा हुई मिट्टी और पानी के दबाव से ‘डैम टिल्ट’ (बांध का टेढ़ा होना) का खतरा बना रहता है और साल 2025 में भाखड़ा बांध 1.177 इंच टिल्ट कर चुका है, जो कि बांध की वास्तविक टिल्ट क्षमता 1.030 इंच से ज्यादा है, जो बहुत गंभीर बात है।
यहां तक कि यह बात स्पष्ट है कि बांध के संबंध में सरकारों की लापरवाही न केवल बांध को खतरे में डाल रही है, बल्कि इसके साथ ही पंजाब और पंजाबियों की जान और माल को बहुत गंभीर और भयानक खतरे में डाला जा रहा है। हाल ही में केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय द्वारा गठित 10 सदस्यीय समिति भी ठोस तरीके से इस खतरे को टालने और बांध की डीसिल्टिंग के संबंध में कार्रवाई करने में असफल रही। पंजाब सरकार ने भी इस संबंध में अब तक कोई उचित कानूनी या ठोस कदम नहीं उठाए और न ही पंजाब के सांसदों द्वारा इस मुद्दे पर केंद्र से कोई सवाल पूछे जा रहे हैं। बीते समय में मोरबी बांध (गुजरात) और हाल ही में तीस्ता-3 बांध (सिक्किम) में हुए नुकसान से बने गंभीर और घातक हालात से सबक सीखते हुए, इस वक्त तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। जो राज्य पंजाब के पानी और बिजली में से हिस्सा मांगते हैं, उनकी भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे केवल बांध की बिजली और पानी का इस्तेमाल ही न करें, बल्कि अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए इस संबंध में बनते कत्र्तव्यों को भी निभाएं।-मनप्रीत सिंह अयाली (विधायक,दाखा)
