अमरीका से दुश्मनी लेकर अफगानिस्तान में दोतरफा फंसा चीन

2021-09-12T13:56:36.043

अमरीका ने अफगानिस्तान से जान-बूझकर निकासी की है क्योंकि अब वह दक्षिणी चीन सागर पर अपना ध्यान लगाना चाहता है, जिससे चीन की आक्रमणकारी नीतियों से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों को निजात मिले। दूसरी तरफ अमरीका अपने खर्च पर चीन को एक शांत पश्चिमी सीमा दे रहा था, जिससे चीन तरक्की करते हुए अमरीका के खिलाफ आगे बढ़ता जा रहा था, इसलिए अमरीका ने अशांत अफगानिस्तान को तालिबान के हाथों जाने दिया ताकि उनके कदम चीन के शिनजियांग प्रांत तक बढ़ें क्योंकि उईगर मुसलमानों पर चीन के अत्याचार तालिबान के गले की हड्डी बने हुए हैं। अब चीन दो तरफ से घिरेगा, पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में तालिबान की मार और पूर्वी समुद्री क्षेत्र में अमरीका सहित क्वॉड और जी-7 देश, जो चीन की इस पूरे क्षेत्र में अराजकता को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रहे हैं।

 

वहीं अफगानिस्तान के ताजा हालात को देखते हुए इस बात के पुख्ता सबूत मिलने लगे हैं कि पंजशीर को गिराने के लिए सिर्फ तालिबान ही नहीं बल्कि पाकिस्तान का गुप्तचर विभाग आई.एस.आई. भी अपनी सेना की मदद ले रहा है। अब सवाल यह उठता है कि कंगाल पाकिस्तान, जिसके पास खाने को रोटी नहीं है, गाडिय़ों में भरवाने के लिए पैट्रोल नहीं है, वह इतनी हिम्मत भला कहां से जुटा रहा है? इसका सीधा सरल जवाब है चीन, या यूं कहें पाकिस्तान का अब्बा पूरी कवायद में अपने पैसे झोंक रहा है क्योंकि वह अफगानिस्तान पर तब तक काबिज नहीं हो सकता, जब तक पंजशीर का किला भेद नहीं लेता। इसी बीच अफगानिस्तान में जो नया मोड़ आया है वह है तालिबान का अपने मंत्रिमंडल का ऐलान करना। इसमें सबसे चौंकाने वाला मंत्रालय है रक्षा का, जो तालिबान ने कारी फसीहुद्दीन को दिया है।

 

कारी अफगानिस्तान के बदखशां प्रांत से आते हैं, जिसकी सीमाएं खासकर वाखान, बिग पामीर और लिटिल पामीर का इलाका चीन के शिनजियांग प्रांत से लगता है और फसीहुद्दीन के ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमैंट से करीबी रिश्ते बताए जाते हैं। चीन ने अपने देश में उईगर मुसलमानों पर घोर अत्याचार किए हैं। उसे मालूम है कि तालिबान, जो कट्टर मुस्लिम इस्लामिक संगठन है, अपने उईगर भाइयों को कैसे छोड़ सकते हैं, उनके लिए आवाज तो उठाएंगे और चीन ने तालिबान को शांत करने के लिए ही थियेनचिन में तालिबानी शिष्टमंडल को बुलाकर पहले बातचीत भी कर ली थी, ताकि चीन का शिनजियांग इलाका शांत रहे। साथ ही चीन ने इस शिष्टमंडल से अफगानिस्तान के विकास में और धन निवेश करने की बात भी कही थी। लेकिन अब चीन की मुश्किलें बढऩे वाली हैं क्योंकि ई.टी.आई.एम. भी एक मुस्लिम आतंकी गुट है जो कट्टर इस्लाम को मानता है।

 

अभी तक अमरीका की अफगानिस्तान में मौजूदगी के कारण चीन को शांत पश्चिमी सीमा मिली हुई थी जो अब अचानक अशांत हो चुकी है। फिलहाल अफगानिस्तान को लेकर दुनिया दो खेमों में बंट चुकी है, जिसमें एक तरफ चीन, पाकिस्तान और तुर्की हैं तो वहीं दूसरी तरफ भारत, अमरीका, जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन हैं। समय के साथ जैसे ही इन्हें जी-7 देशों का साथ मिलेगा, हालात और गंभीर होने लगेंगे। पाकिस्तान की आई.एस.आई. और सेना पूरा जोर लगा रही है, ताकि अफगानिस्तान पूरी तरह तालिबान के कब्जे में आ जाए। तालिबान जितना मजबूत होगा उतनी ही पाकिस्तान की कश्मीर को हथियाने की उम्मीदें बढ़ेंगी। लेकिन चीन अमरीका से बराबरी करने के चक्कर में बुरी तरह फंस गया है।

 

एक तरफ चीन का अफगानिस्तान से लिथियम, लौह अयस्क, यूरेनियम निकालने का सपना  है, वहीं दूसरी तरफ शिनजियांग में तालिबान के खतरे की आशंका। ऐसे हालात में चीन के दक्षिण-पूर्वी पड़ोसी देश भी चीन के खिलाफ सिर उठाने की हालत में होंगे क्योंकि इन सभी देशों के साथ दक्षिणी चीन सागर को लेकर विवाद गहराए हुए हैं। अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले 60 दिन किस करवट बैठते हैं क्योंकि ये तय करेंगे कि अफगानिस्तान में हालात कैसे बनते हैं और इसका चीन, पाकिस्तान और तुर्की पर क्या असर पड़ता है।


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Content Writer

Seema Sharma

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