दक्षिण प्रशांत में क्वॉड समूह के सामने फेल हुआ चीन

punjabkesari.in Tuesday, Jun 21, 2022 - 06:25 AM (IST)

चीन अपने दुश्मन देशों को घेरने के लिए हमेशा नई-नई रणनीति बनाता है, सबसे पहले वह उसके आस-पड़ोस के देशों में चीनी निवेश का जाल बिछाता है, जब उस देश के पड़ोसी चीन के जाल में फंस जाते हैं तो चीन लंबे समय तक उन्हें इस जाल में फंसाए रखता है। 

चीन उन देशों से कभी बाहर नहीं निकलना चाहता और गलती से भी किसी देश को चीन की शातिराना चाल के बारे में पता चल भी गया तो चीन उस देश से बाहर निकलते हुए भी उसका कोई बंदरगाह, कोई हवाई अड्डा, खनिज की कोई बड़ी खदान पट्टे के नाम पर 99 वर्ष के लिए अपने कब्जे में ले लेगा। लेकिन हर बार चीन की यह चाल सफल रहे, ऐसा नहीं होता। हाल ही में हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन को मुंह की खानी पड़ी। दरअसल चीन ने ऑस्ट्रेलिया को घेरने के लिए हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में 10 छोटे-छोटे देशों के साथ रक्षा अनुबंध करने की कोशिश की थी, ताकि वह इन देशों में अपना सैन्य अड्डा बना कर ऑस्ट्रेलिया को घेर सके। 

चीन ने सोचा कि इन देशों को वह आसानी से अपने कब्जे में ले लेगा, लेकिन चीन का पांसा उलटा पड़ गया। दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी इलाकों से लेकर दक्षिण-पूर्वी इलाकों में कई छोटे-छोटे द्वीप हैं, जो स्वतंत्र देश हैं। इन देशों को चीन लालच देकर अपने फंदे में फंसाना चाहता था, लेकिन एक सुर में इन देशों ने चीन के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। 

वैसे तो इस क्षेत्र में करीब 20 देश हैं जिनमें प्रमुख हैं- उत्तरी मारियाना द्वीप, माइक्रोनेशिया, फिजी, फ्रैंच पॉलीनेशिया, सामोआ, किरीबाती, मार्शल द्वीप, नाउरू, न्यू कैलीडोनिया, न्यूजीलैंड, पालाऊ, कुक द्वीप, सोलोमोन द्वीप, टोंगा, तुवालू, वानुआतू, वालिस और फूतुना। इनमें से 10 देशों को चीन ने अपना प्रस्ताव भेजा जिसके तहत चीन इन देशों में आधारभूत संरचना बनाने के लिए आसान किस्तों पर कर्ज देगा, चिकित्सा और औषधियों की आवश्यकता पूरी करेगा, प्रशासन संभालने के लिए चीन इन देशों की पुलिस को अपने यहां से पुलिस अफसर भेजकर ट्रेनिंग देगा। लेकिन इन सभी 10 देशों को मालूम है कि इस क्षेत्र में क्वॉड भी सक्रिय है तो इन देशों ने सोचा कि क्यों न क्वॉड से भी बात की जाए और अपने लिए सबसे बढिय़ा डील मांगी जाए। इसे देखते हुए इन देशों ने चीन के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। 

अगर बात की जाए क्वॉड देशों की तो यह समूह अगले 5 वर्षों में हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में 50 अरब डॉलर का निवेश करेगा, ताकि चीन के वर्चस्व को पूरी तरह से खत्म किया जा सके। इन देशों को यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि 4 देशों के समूह क्वॉड से आने वाले पैसे के बदले इन्हें कोई सिक्योरिटी पैक्ट साइन नहीं करना पड़ेगा और यह पैसा चीन के पैसे से कहीं अधिक सुरक्षित है। क्वॉड से आने वाला पैसा उनकी स्वाधीनता के लिए खतरा पैदा नहीं करेगा। क्वॉड देशों पर इन्हें निर्भर होने की कोई आवश्यकता भी नहीं होगी। लेकिन जब चीन को इस बात का पता चला कि क्वॉड इन देशों से कोई सिक्योरिटी पैक्ट साइन नहीं कर रहा, तो उसने भी समय की गंभीरता को समझते हुए अपनी सिक्योरिटी पैक्ट वाली डील को हटा लिया है। 

वहीं, चीन जिस तरह से हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में आक्रामक होता जा रहा है, उसके जवाब में ऑस्ट्रेलिया भी चीन जैसी ही रणनीति अपना रहा है। उसने अचानक दक्षिणी प्रशांत द्वीपीय देशों के विरुद्ध मुनरो डॉक्ट्रीन की नीति की घोषणा कर दी है। मुनरो डॉक्ट्रीन असल में अमरीका ने 1823 में उन छोटे देशों पर लागू किया था, जिनमें तानाशाही और राजशाही थी। अमरीका का कहना था कि इन छोटे देशों को किसी तीसरी शक्ति के खिलाफ अमरीका का साथ देना होगा। अगर ये देश अमरीका के खिलाफ किसी भी रूप में जाते हैं तो अमरीका इन्हें सैन्य तरीके से भारी नुक्सान पहुंचाएगा। इन छोटे देशों के लिए ऑस्ट्रेलिया की यह खुली चेतावनी है कि अगर वे उसके विरुद्ध किसी तीसरी शक्ति के साथ जाते हैं, जो ऑस्ट्रेलिया को नुक्सान पहुंचा सकती है, तो ऑस्ट्रेलिया इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा। 

ऑस्ट्रेलिया की इस नीति के कारण चीन बैकफुट पर आ गया है। चीन को समझ में नहीं आ रहा है कि वह अपने देश में लोगों को क्या जवाब देगा। शी जिनपिंग के राज में चीन को जितनी आक्रामकता दिखानी थी वह दिखा चुका है, अब दुनिया के बाकी देश चीन के खिलाफ हरकत में आ गए हैं। चीन को अभी अपनी विजय यात्रा पर लगाम लगानी होगी और पेइङ्क्षचग को मीटिंग रूम में बैठ कर यह सोचना होगा कि उसकी नीतियों में कहां गलती हुई, जो एक-एक कर असफल होने लगी हैं।


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