अमरीका की कूटनीति नहीं दादागिरी!

punjabkesari.in Monday, Mar 09, 2026 - 05:37 AM (IST)

आज दुनिया में हर ओर युद्ध, तबाही और अराजकता का दौर है। विकास की गति रुक रही है। अनिश्चितता का वातावरण है। अनेक देशों के नेता ही मवालियों की तरह बर्ताव कर रहे हैं। जबकि विश्व के लोग हमेशा शांति और विकास चाहते हैं। इस उठा-पटक में अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सबसे आगे हैं। ट्रम्प ही क्यों, अमरीका की तो फितरत ही रही है कि कोई बहाना ढूंढ कर कमजोर देशों को दबाना और उनके संसाधनों पर कब्जा करना। 

हाल ही में सोशल मीडिया पर @sankofa360 से एक पोस्ट काफी वायरल हुई, जिसमें लिखा है कि ‘‘प्रिय दुनिया, क्या तुम अमरीका और उसके सहयोगियों द्वारा झूठ बोलने से थक नहीं गए हो? क्या तुम उस साम्राज्य से थक नहीं गए हो, जो खून और मौत की तलाश में नहीं रुकता? अमरीका या उसके सहयोगी कभी किसी बात पर सच्चे रहे हैं? दुनिया कब इनके झूठ से ऊब जाएगी? अब तो हमें पता होना चाहिए कि वैश्विक अशांति, मौत, अराजकता और विनाश के जिम्मेदार कौन हैं? जो दुनिया की स्थिरता के खिलाफ हैं? जो विश्व शांति के विचार से डरते हैं? तुम्हारी चुप्पी सहयोग है! अमरीका वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाला है। मौत और विनाश की मशीन! अमरीकी साम्राज्य की तानाशाही के खिलाफ बोलो!!!’’

यह पोस्ट न केवल अमरीका की ऐतिहासिक गलतियों को उजागर करती है बल्कि दुनिया को जगाने का प्रयास भी करती है। आज, जब हम वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान जैसे देशों में अमरीकी हस्तक्षेप की नई लहर देख रहे हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि अमरीका के फैसले गलत साबित हो चुके हैं। इन युद्धों ने न केवल लाखों जानें लीं, बल्कि दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेला। अमरीका की इन गलतियों से यह पता चलता है कि वैश्विक समुदाय अब युद्धों से कितना ऊब चुका है? अमरीका की विदेश नीति का इतिहास झूठ, हस्तक्षेप और युद्धों से भरा पड़ा है। 1950 के दशक से शुरू करें तो कोरियाई युद्ध (1950-1953) में अमरीका ने उत्तर कोरिया के आक्रमण का बहाना बनाकर हस्तक्षेप किया लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह शीत युद्ध की रणनीति का हिस्सा था। लाखों कोरियाई मारे गए लेकिन क्या अमरीका की जीत हुई? नहीं, यह युद्ध आज भी कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव का कारण बना हुआ है। इसी तरह, 1954 में ग्वाटेमाला में अमरीका ने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फैंका, क्योंकि वहां की भूमि सुधार नीतियां अमरीकी कंपनियों को पसंद नहीं आईं। ग्वाटेमाला आज भी गरीबी और हिंसा से जूझ रहा है।

1950-60 के दशक से अमरीका के झूठ की फेहरिस्त लंबी है। इंडोनेशिया (1958) में सी.आई.ए. ने विद्रोहियों को समर्थन दिया लेकिन असफल रहा। क्यूबा (1961) में ‘बे ऑफ पिग्स’ हमला एक बड़ी असफलता थी, जहां अमरीका ने फिदेल कास्त्रो को हटाने की कोशिश की लेकिन खुद की किरकिरी हुई। वियतनाम युद्ध (1961-1975) तो अमरीकी इतिहास का सबसे काला अध्याय है। अमरीका ने ‘टोंकिन की खाड़ी घटना’ को बहाना बनाकर युद्ध शुरू किया, जो बाद में झूठ साबित हुआ। 58,000 अमरीकी सैनिक और लाखों वियतनामी मारे गए। अमरीका हारकर लौटा, और वियतनाम आज एक मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश है। लाओस (1964-1973) और कंबोडिया (1969-1970) में गुप्त बमबारी ने लाखों लोगों को मार डाला और खमेर रूज जैसे आतंक को जन्म दिया। कांगो (1964) में अमरीका ने वहां प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा की हत्या में भूमिका निभाई, जो अफ्रीका की आजादी के प्रतीक थे। डोमिनिकन रिपब्लिक (1965) में हस्तक्षेप ने लोकतंत्र को कुचला। 1980 के दशक में भी यह सिलसिला जारी रहा। ग्रेनाडा (1983) में अमरीका ने मैडिकल छात्रों की सुरक्षा का बहाना बनाकर आक्रमण किया लेकिन यह छोटे देश पर साम्राज्यवादी कब्जा था। लेबनान (1983-1984) में अमरीकी सैनिकों की मौत हुई लेकिन कोई स्थायी शांति नहीं आई। लीबिया (1986) में गद्दाफी पर हमला, ईरान (1987-1988) में नौसेना संघर्ष, पनामा (1989) में नोरिएगा को हटाना-ये सभी फैसले अमरीका की ताकत दिखाने के लिए थे लेकिन उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाई।

इराक के खिलाफ 1991 का गल्फ वॉर, 1998 की बमबारी और 2003 का आक्रमण ‘महाविनाश के हथियारों’ के झूठ पर आधारित था। सद्दाम हुसैन को हटाया गया लेकिन इराक आज भी अराजकता में डूबा है, आई.एस.आई.एस. जैसे समूह पैदा हुए। सोमालिया (1992-1994, 2007-वर्तमान) में अमरीकी हस्तक्षेप ने समुद्री डकैती और आतंकवाद बढ़ाया। बोस्निया (1994-1995) में नाटो हमले, सूडान (1998) में दूतावास बमबारी, अफगानिस्तान (1998, 2001) में तालिबान के खिलाफ युद्ध-ये सभी अमरीका की ‘आतंकवाद विरोधी’ नीति के नाम पर थे, लेकिन अफगानिस्तान से 2021 की शर्मनाक वापसी ने साबित किया कि 20 साल का युद्ध व्यर्थ था।

यूगोस्लाविया (1999) में नाटो बमबारी ने कोसोवो को अलग किया, लेकिन जातीय तनाव आज भी हैं। यमन (2002-वर्तमान) में ड्रोन हमलों ने नागरिकों को मार डाला, पाकिस्तान (2004) में भी यही हुआ। सीरिया (2014) में आई.एस.आई.एस. के खिलाफ हस्तक्षेप ने देश को बर्बाद कर दिया। लीबिया (2011) में गद्दाफी को हटाने के बाद देश गृहयुद्ध में फंस गया। और अब 2026 में वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान पर झूठ। वेनेजुएला में अमरीका ने दावा किया कि मादुरो तानाशाह है, लेकिन यह तेल संसाधनों पर कब्जे की कोशिश है। क्यूबा पर दशकों से प्रतिबंध, लेकिन 2026 में नए आरोप लगाकर दबाव बढ़ाया जा रहा है। ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के बहाने हमले की धमकी, जबकि ईरान शांति समझौते चाहता है। ये सभी फैसले गलत साबित हो चुके हैं। 

संयुक्त राष्ट्र की रिपोटर््स बताती हैं कि युद्धों से करोड़ों लोग विस्थापित हुए, अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं। यूक्रेन-रूस संघर्ष और इसराईल-फिलिस्तीन विवाद में अमरीका की भूमिका ने दिखाया कि वह शांति दलाल नहीं, बल्कि युद्ध उकसाने वाला है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के देश अब चीन और रूस जैसे भागीदारों की ओर मुड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये देश शांति और विकास पर जोर देते हैं। कोरोना महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने साबित किया कि दुनिया को सहयोग चाहिए, न कि संघर्ष।
अमरीका की ये गलतियां साबित करती हैं कि उसकी कूटनीति स्वार्थ पर आधारित है। वह लोकतंत्र और मानवाधिकारों का ढोंग रचता है, लेकिन वास्तव में संसाधनों और वर्चस्व की तलाश करता है। अब समय आ गया है कि दुनिया जागे। संयुक्त राष्ट्र में सुधार, बहुपक्षीय समझौते और शांति वार्ताएं ही रास्ता हैं।-विनीत नारायण     


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