आखिर क्यों भाजपा ने उन्हीं मुख्यमंत्रियों पर भरोसा जताया

punjabkesari.in Tuesday, Mar 29, 2022 - 05:33 AM (IST)

भाजपा ने उन सभी चार राज्यों में जहां हाल ही में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए हैं, निवर्तमान मुख्यमंत्रियों पर अपना फिर से भरोसा जताया है। क्या यह संयोग था अथवा पहले से ही निर्धारित कोई रणनीति, बड़ी तस्वीर स्पष्ट है कि पार्टी हाईकमान इन राज्यों में विजेता फार्मूले के साथ छेड़छाड़ करना नहीं चाहती। इससे पहले की प्रथा एक नए चेहरे का नामांकन करने की थी। ये निर्णय संकेत देते हैं कि पार्टी ने निरंतरता, स्थिरता तथा युवाओं को अधिमान दिया है। 

पार्टी ने योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश), पुष्कर सिंह धामी (उत्तराखंड), एन. बीरेन सिंह (मणिपुर) तथा प्रमोद सावंत (गोवा) को अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवारों के तौर पर पेश किया था। इन चारों ने सत्ता विरोधी लहर को पराजित कर सकारात्मक परिणाम दिखाया। 

भाजपा हाईकमान की नजर पहले ही 2024 के लोकसभा चुनावों पर है। पार्टी आशा करती है कि ये चारों मुख्यमंत्री 2024 में मोदी की विजय के लिए अपने-अपने राज्यों में कारगुजारी दिखाने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। उनके सामने चुनौती वर्तमान संख्या को बनाए रखने तथा 2024 के लोकसभा चुनावों में और भी अधिक महत्वपूर्ण चुनावी विजय प्राप्त करने की होगी। इसके साथ ही मोदी भी सत्ता में 10 वर्षों से हैं। 

धामी अपनी खुद की खटीमा सीट हार गए थे जो उन्होंने इससे पहले 2 बार जीती थी लेकिन यह भाजपा के शीर्ष नेताओं को तो 46 वर्षीय धामी को क्लीन चिट देने से नहीं रोक पाई।  वह राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं और उनका चयन राज्य में धड़ेबंदी की लड़ाइयों पर अंकुश लगाने का एक प्रयास है। यह स्थिरता का भी कार्ड था क्योंकि गत वर्ष उत्तराखंड ने 3 मुख्यमंत्री देखे। धामी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के करीब माना जाता है। धामी के विधायक दल के नेता के तौर पर चुनाव के बारे में घोषणा करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रिपोर्टर्स को बताया था कि ‘6 महीनों में धामी ने उत्तराखंड में अपनी छाप छोड़ी है, जो चुनाव परिणामों में दिखाई देती है’। 

विपक्ष इस निर्णय की आलोचना नहीं कर सकता क्योंकि यह ठीक उसी तरह है जैसे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गत वर्ष के विधानसभा चुनावों में अपनी सीट हारने के बाद किया था। ममता की तरह धामी को भी अगले 6 महीनों में किसी न किसी सीट पर चुनाव लड़ कर जीतना होगा। उत्तराखंड एकमात्र राज्य नहीं है जहां भाजपा ने इस स्थिरता कार्ड का अनुसरण किया है। गोवा में पार्टी ने राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे, जो शीर्ष पद की दौड़ में शीर्ष पर थे, के मुकाबले प्रमोद सावंत को अधिमान दिया। इसका एक साधारण कारण यह हो सकता है कि सावंत ने उच्च प्रमुख हस्तियों, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पाॢरकर के बेटे सहित कम से कम 6 पूर्व मुख्यमंत्री तथा कुछ कांग्रेस से ‘आयात’ किए गए नेता शामिल थे, के इस्तीफों के बावजूद पार्टी की विजय का नेतृत्व किया। वह पार्टी की आंतरिक लड़ाई से पार पाने में सफल रहे। 

गोवा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की ओर से कड़ी टक्कर के अतिरिक्त तृणमूल कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी की ओर से भी चुनौती थी। इससे भी अधिक सावंत ने गोवा में 40 में से 20 सीटें जीत कर भाजपा को दूसरा सबसे बेहतर कारगुजारी वाला राज्य दिया जिसे बहुमत के लिए मात्र एक और सीट की जरूरत थी। सावंत, जो अभी भी अपनी उम्र के पांचवें दशक में हैं, करिश्माई जन नेता मनोहर पार्रिकर के निधन के बाद  2019 में गोवा के मुख्यमंत्री बने थे। वह एक सौम्य तथा मृदुभाषी नेता हैं लेकिन एक स्वाभाविक नेता नहीं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साबित किया है कि वह वोटों को आकर्षित करने वाले तथा एक करिश्माई नेता हैं। इसलिए भाजपा उच्च कमान उन्हें पुरस्कृत करने से इंकार नहीं कर सकती। वह एक अच्छे वक्ता भी हैं। इन सबके अतिरिक्त था मोदी का जादू तथा प्रधानमंत्री सहित शीर्ष भाजपा नेतृत्व जिन्होंने राज्य में धुआंधार प्रचार किया। 

यद्यपि अपने मंत्रिमंडल को अंतिम रूप देने में योगी का हाथ नहीं था क्योंकि कैबिनेट का गठन पार्टी उच्चकमान के साथ सलाह के बाद किया गया। यह तब दिखाई दिया जब ओ.बी.सी. नेता केशव प्रसाद मौर्य, जो अपनी सीट हार गए थे, को फिर से उपमुख्यमंत्री बनाए रखा गया। एक अन्य उपमुख्यमंत्री थे बसपा से ‘इम्पोर्ट’ किए गए बृजेश पाठक। इस बार 26 मंत्रियों को जगह न देना तथा 32 नए नियुक्त करना एक साहसिक कदम था। उच्च जाति के 21 तथा 20 अन्य पिछड़े वर्गों के मंत्रियों के साथ योगी की टीम सम्पूर्ण संतुलित है। बाकी मंत्रियों में से 8 दलित, एक-एक अनुसूचित जाति, मुस्लिम तथा सिख समुदाय से है। 

शपथ ग्रहण वाले दिन, जो एक बड़े स्टेडियम में आयोजित किया गया था, कोई भी एक प्रमुख नारे को देख सकता था- ‘शपथ, शपथ, शपथ: राष्ट्रवाद की, सुशासन की, सुरक्षा की, विकास की।’ यह 2024 के चुनावों के लिए मोदी का नारा हो सकता है। भाजपा को दो प्रमुख चीजें सुनिश्चित करनी होंगी। पहली है मोदी का जादू तथा दूसरी, कल्याणकारी योजनाएं लागू करना। 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए तैयारी करने हेतु उनके पास और अढ़ाई वर्ष हैं। इसमें कोई हैरानी नहीं कि रणनीति में इस बदलाव के साथ सारा ध्यान योजनाओं को लागू करने के लिए राज्यों में मुख्यमंत्रियों को मजबूत करने पर है। दूसरे, प्रधानमंत्री मोदी भी युवा चेहरों को प्रोत्साहित कर रहे हैं क्योंकि उनके क्षेत्रों में कारगुजारी दिखाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है। इससे गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश जैसे अन्य चुनावी राज्यों के लिए भी सकारात्मक संकेत देने की संभावना है।-कल्याणी शंकर
 


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