पश्चिम एशिया और अफगानिस्तान में ईरान का बहुत कुछ दांव पर

punjabkesari.in Saturday, Jan 06, 2018 - 02:54 AM (IST)

ईरान में इन दिनों जो रोष प्रदर्शन चल रहे हैं, उनसे वहां की निर्वाचित सरकार के साथ-साथ इसके गैर-निर्वाचित स्वामी, यानी मौलाना वर्ग  जितना हत्प्रभ है, उतने हीआश्चर्यचकित हैं इसके प्रतिद्वंद्वी ईरानियन रैवोल्यूशनरी गाडर््स काप्र्स (आई.आर.जी.सी.) के वर्दीधारी। बेशक इन रोष प्रदर्शनों की शुरूआत 28 दिसम्बर को ईरान की सबसे पवित्र नगरी से हुई थी तो भी इस घटनाक्रम ने तभी से जड़ें पकडऩी शुरू कर दी थीं, जब डोनाल्ड ट्रम्प ने अमरीका के राष्ट्रपति का पद संभाला था। 

2013 में पदग्रहण करने वाले हसन रूहानी प्रथम निर्वाचित राष्ट्रपति थे, जो आर्थिक वृद्धि बहाल करने, पश्चिमी देशों के साथ संबंध सुधारने और नागरिक अधिकारों को स्थापित करने के कार्यक्रम के आधार पर सत्ता में आए थे। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा उन दिनों ‘अरब जगत में बसंत’ की पृष्ठभूमि में सीरिया के गृह युद्ध से निपटने में लगे हुए थे। तभी आतंकियों ने ईराक से मोसुल शहर छीन लिया और जून 2014 में ‘खिलाफत’ (यानी खलीफा का शासन) की घोषणा कर दी। इस घोषणा का उद्देश्य सीरिया में बशर अल असद सरकार को खदेडऩा था। इस उद्देश्य के लिए सीरिया के विभिन्न सुन्नी गुट सशस्त्र विद्रोह कर रहे थे और अमरीका खाड़ी देशों के शासकों को हर प्रकार की वित्तीय सहायता देने को तैयार था, ताकि वे इन गुटों को समर्थन दें। 

लेकिन सीरिया में हालात लगातार बिगड़ते गए और आई.एस.आई.एस. के रूप में एक नई आतंकी शक्ति का उदय हुआ। इस घोर इस्लामी कट्टरपंथी शक्ति का मुकाबला करने के लिए अमरीका ने हर प्रकार की वायुसैनिक सहायता उपलब्ध करवाने की प्रतिबद्धता तो व्यक्त की लेकिन जमीन पर अपने सैनिक तैनात करने से इन्कार कर दिया। ओबामा इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आई.एस.आई.एस. से निपटने के लिए अमरीका को ईरान पर प्रतिबंध हटाने होंगे। क्योंकि वही एकमात्र शक्ति थी जो आई.एस.आई.एस. के विरुद्ध प्रभावी ढंग से लड़ सकती थी। 

इस उद्देश्य के मद्देनजर 2015 में ईरान और पांच परमाणु शक्तियों के बीच समझौता हुआ। इस समझौते की कीमत अदा करने के रूप में पश्चिम एशिया में फिर से शक्ति संतुलन निर्धारित करना जरूरी हो गया था। अमरीका को सऊदी अरब और खाड़ी सहयोग परिषद (जी.सी.सी.) जैसे अपने परम्परागत सहयोगियों के साथ अपने संबंधों को नया आयाम देना पड़ा। सऊदी अरब और अमीरात देशों ने भली-भांति भांप लिया था कि नए समझौते से ईरान बहुत दिलेर हो गया है और पूरे रोम सागर तक हर प्रकार के शिया गुटों को अपने गिर्द एकजुट कर रहा है। ईरान का लंबे समय से यह सपना था कि 550-330 ईसा पूर्व के परशियन साम्राज्य वाली गरिमा फिर से बहाल की जा सके। रूसियों की सहायता से ईरान ने पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव फिर से हासिल करने का मौका दबोच लिया, जिसके फलस्वरूप असद सरकार फिर से मजबूत हो गई और आई.एस.आई.एस. का पतन हो गया तथा मोसुल को मुक्त करवाने में सहायता मिली। 

इस सब कुछ का अंजाम अब यह हुआ है कि यमन में सऊदी अरब के विरोधी ईरानी सहायता से मजबूत हो गए हैं, लेकिन ईरान के इस अभ्युदय से इसराईल की चिन्ताएं बढ़ गई हैं क्योंकि लेबनान का शिया संगठन हिजबुल्ला उसके लिए सबसे बड़ी बाहरी चुनौती है। इसराईल को यह आशंका है कि यदि एक बार पश्चिम एशिया में ईरान के पैर जम गए तो यह अपनी पोजीशन कमजोर नहीं होने देगा। आखिर डेढ़ हजार वर्ष पहले तक ईरान ही पश्चिम एशियाई क्षेत्र में सबसे बड़ी शक्ति था। इसराईल के हितों को ध्यान में रखते हुए ही राष्ट्रपति ओबामा ने ईरान के विरुद्ध कई बैंकिंग प्रतिबंध जारी रखे हुए थे, लेकिन बहाना यह बनाया था कि हिजबुल्ला जैसे आतंकी गुटों का वित्त पोषण रोकना जरूरी है। 

राष्ट्रपति रूहानी ने पांच परमाणु शक्तियों के साथ किए समझौते के पक्ष में ईरान में आंतरिक सहमति का जुगाड़ कर लिया क्योंकि वह सुप्रीम मजहबी नेता अली खामेनेई को इस बात से संतुष्ट कर पाए थे कि यदि ईरान पर प्रतिबंध उठा लिए गए और विदेशी निवेश तथा टैक्नोलॉजी मिलनी शुरू हो गई तो ईरान उस आर्थिक अराजकता में से उबर सकेगा, जो उनके पूर्ववर्ती अहमदीनेजाद द्वारा विरासत के रूप में पीछे छोड़ी गई थी। लेकिन हसन रूहानी का सपना पूरा नहीं हो पाया क्योंकि अमरीकी प्रतिबंध किसी न किसी रूप में अभी भी जारी हैं जिससे विदेशी निवेशक भयभीत हैं। जैसे ही डोनाल्ड ट्रम्प ने अमरीका की सत्ता संभाली, तो उन्होंने फिर से ईरान और इसके साथ हुए परमाणु समझौते पर आंखें तरेरनी शुरू कर दीं। परिणाम यह हुआ कि एक ओर तो आई.आर.जी.सी. के शस्त्रधारियों के नेतृत्व में कठमुल्लावादियों ने तथा दूसरी ओर आम जनता ने उन्हें चिढ़ाना शुरू कर दिया कि अमरीका ने उन्हें बेवकूफ बनाया है। 

उत्तर कोरिया जिस तरह अमरीका को धमकियां दे रहा है, उसके मद्देनजर हसन रूहानी के विरोधियों को काफी दिलेरी मिली है और वे भी सोचने लगे हैं कि यदि ईरान किसी की परवाह किए बिना अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखता है तो वह अमरीका को आंखें दिखाने की औकात हासिल कर सकता है। इसी उद्देश्य से पुरातनपंथियों ने रूहानी के प्रतिद्वंद्वी इब्राहिम रायसी के नेतृत्व मेें मशाद में बढ़ती खाद्यान्न कीमतों को मुद्दा बनाकर जनता को भड़काना शुरू कर दिया है। उल्लेखनीय है कि कुछ ही दिन पूर्व रूहानी सरकार ने महिलाओं के बुर्के के संबंध में नियमों से कुछ छूट दी थी, जिससे पुरातनपंथी काफी खफा थे। 

लेकिन पुरातनपंथियों को यह उम्मीद नहीं थी कि उनके उकसाए रोष-प्रदर्शनों से इतने बड़े पैमाने पर जनता का गुस्सा फूट पड़ेगा कि सुप्रीम नेता को भी अपने लपेटे में ले लेगा। परन्तु इन बेचैन भीड़ों का कोई नेता नहीं है, ऐसे में आई.आर.जी.सी. और इसके अनुषांगिक संगठन अपना बाहुबल प्रयुक्त करके इस आक्रोश को दबा देंगे। दूसरी ओर हसन रूहानी का कहना है कि विदेशी पैसे और जासूसों व विदेशी शक्तियों के कारण उनकी सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को प्रदर्शन करने का अधिकार है लेकिन हिंसा किसी भी रूप में नहीं होनी चाहिए। 

अभी यह कहना मुश्किल है कि सुप्रीम धार्मिक नेता अली खामेनेई, राष्ट्रपति हसन रूहानी और आई.आर. जी.सी. के बीच सत्ता का संतुलन कैसे बन पाएगा। यह स्थिति चाहे कोई भी रूप ग्रहण करे लेकिन एक बात तय है कि पश्चिम एशिया और अफगानिस्तान में ईरान का बहुत कुछ दाव पर लगा हुआ है। क्योंकि दोनों ही स्थानों पर ईरान और रूस अपने सांझे दुश्मन आई.एस.आई.एस. के विरुद्ध तालिबान के साथ अपने संबंध सूत्र स्थापित किए हुए हैं। आखिर आई.एस.आई.एस. ने ही तालिबान को सीरिया में से खदेड़ा था। 

आखिरी ‘महाभारत’ तो अभी-अभी शुरू हुआ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगले माह एक बार फिर यू.ए.ई. के दौरे पर जा रहे हैं। उन्हें अवश्य ही यह बात मद्देनजर रखनी होगी कि  जिस प्रकार ट्रम्प शिया और सुन्नी के बीच टकराव को बढ़ावा दे रहे हैं, उसके चलते इन दोनों समुदायों के बीच कोई सेतु स्थापित कर पाना मुश्किल होगा।-के.सी. सिंह


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