‘मुस्लिम देशों का मक्का पैक्ट’ भारत को अपनी सुरक्षा तैयारी की समीक्षा की जरूरत!

punjabkesari.in Monday, Sep 07, 2026 - 02:44 AM (IST)

7 अगस्त, 2026 को पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हस्ताक्षरित मक्का पैक्ट में शामिल देशों में से सऊदी अरब धन और तेल देगा, तुर्की नवीनतम हथियार देगा और पाकिस्तान अपनी सबसे बड़ी सेना लेकर आएगा। इन तीनों ने ही यह समझौता किया है और इस समझौते का मकसद किसी भी तरह की आक्रामकता के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करना है। इसके अंतर्गत उक्त तीन देशों में से किसी भी एक देश पर हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।  इसे ‘नाटो स्टाइल’ गठबंधन कहा गया है तथा इसका नाम ‘मक्का पीस स्टेबिलिटी डील’ रखा गया है क्योंकि मक्का सऊदी अरब में है और इसे विश्व में मुसलमानों का सर्वाधिक पवित्र स्थान माना जाता है। इसका मुख्यालय (सचिवालय) रियाद में कायम किया गया है और पाकिस्तान को इसका पहला नेता बनाया गया है।

अब बंगलादेश को भी इस समझौते में शामिल होने का प्रस्ताव भेजा गया है जिस पर बंगलादेश ने सकारात्मक रवैया अपनाया है। बंगलादेश के विदेश राज्यमंत्री हुमायूं कबीर के अनुसार, ‘‘इस समझौते में शामिल होने से ढाका के दूसरे देशों के साथ सम्बन्धों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगेगा और इसमें बंगलादेश के लिए कोई खतरा दिखाई नहीं देता।’’ इससे पहले बंगलादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने संसद में इसे ‘हमारे मुस्लिम परिवार का आंतरिक मामला’ बताते हुए कहा था कि,‘‘दूसरों को इसे लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है।’’ भारत की सीमा पर चीन सहित आक्रामक पड़ोसी वैसे तो पहले भी थे, परंतु अब इस समझौते के बाद वे अधिक हथियारों से लैस हो जाएंगे। यह भी कि क्या और मुस्लिम देश भी इस समझौते के साथ जुड़ेंगे? चीन तो पहले से ही भारत के प्रति आक्रामक रवैया रखता आ रहा है।

चीन के शासक दोस्ती का चाहे जो भी दिखावा कर लें परंतु भीतर से वह पीठ में छुरा घोंपना कभी छोड़ता नहीं है। भारत की सुरक्षा के लिए सऊदी अरब व तुर्की की सहायता और समर्थन से पाकिस्तान तथा बंगलादेश पहले से कहीं अधिक बड़ा खतरा सिद्ध हो सकते हैं। इस स्थिति को लेकर भारत के लिए अधिक चिंतित होने का कारण यह है कि वर्तमान में युद्धनीति जो रूप धारण कर रही है, उसके अंतर्गत युद्ध अब सिर्फ पृथ्वी और आकाश में ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भी लड़े जाएंगे। हो रहे घटनाक्रम पर नजर रखने के लिए एक तो सामान्य उपग्रह हैं, जिसमें भारत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और अभी-अभी एक बड़ी छलांग लगाते हुए ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (इसरो) ने देश के पहले ‘इमेजिंग सैटेलाइट’ का सफल प्रक्षेपण किया है जिसे ‘आसमान से नजर रखने वाली आंख’ करार दिया गया है। यह उपग्रह हर पांच मिनट में एक हाई रैजोल्यूशन तस्वीर लेने के साथ-साथ भारत के मौसम, कृषि, बाढ़ों और भौगोलिक क्षेत्रों आदि की निगरानी करेगा परंतु जासूसी आदि के सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले उपग्रह (जिन्हें औपचारिक रूप से टोही उपग्रह या खुफिया उपग्रह कहा जाता है) दुनिया में बहुत कम देशों के पास ही हैं। 

उल्लेखनीय है कि जासूसी की जरूरतों को पूरा करने के लिए दुनिया में सर्वाधिक (247) सैन्य या दोहरे उपयोग वाले उपग्रह अमरीका के पास हैं जो खुफिया जानकारी जुटाने और संचार में मदद करते हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर चीन (157) है जो अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत तेजी से बढ़ा रहा है। उसका सैन्य उपग्रह कार्यक्रम विश्व में सबसे अधिक तेजी से चल रहा है। तीसरे स्थान पर रूस (110) है, जिसके सैन्य उपग्रह सोवियत संघ और आधुनिकीकरण पर आधारित हैं। चौथे स्थान पर फ्रांस (17), पांचवें पर इसराईल (12), छठे पर इटली (10), सातवें पर भारत (9), आठवें पर जर्मनी (8), नौवें पर इंगलैंड (6) और दसवें स्थान पर स्पेन (4) है।

इस तरह के हालात के बीच हमें पहले की तुलना में भी कहीं अधिक गहराई से अपनी प्रतिरक्षा तैयारी की समीक्षा करने की जरूरत है। हालांकि हमारी सरकार इस दिशा में काम कर रही है, परंतु अब पहले वाली वह हालत नहीं है जहां तटस्थ रहा जा सके क्योंकि कूटनीति महत्वपूर्ण है परंतु इन देशों की चालों का मुकाबला करने के लिए तैयारी का होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब भारत को सामान्य उपग्रहों के मामले में ही नहीं बल्कि टोही सैन्य उपग्रहों के मामले में भी अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। लेकिन यहां चिंताजनक बात यह है कि अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोलने के बाद हाल के समय के दौरान 100 से 120 वैज्ञानिक ‘इसरो’ जैसी भारत की प्रतिष्ठित अंतरिक्ष एजैंसी को छोड़ कर जा चुके हैं। नए स्टार्टअप्स का स्वागत है लेकिन आजादी के समय की ‘इसरो’ को भी सहेज कर रखने की जरूरत है।


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