समय है भारतीय शिक्षा व परीक्षा प्रणाली के पूर्ण कायाकल्प का
punjabkesari.in Monday, Jul 27, 2026 - 03:30 AM (IST)
रूस तथा यूक्रेन के बीच 2022 में युद्ध शुरू होने के समय 18000 से 20000 भारतीय मैडीकल छात्र यूक्रेन में तथा 25000 से 30,000 रूस में पढ़ रहे थे। केवल यहीं भारतीय छात्र मैडीकल की पढ़ाई नहीं करते-मध्य एशिया, फिलिपींस और यहां तक कि बंगलादेश तथा पोलैंड जैसे पूर्वी यूरोपियन देशों में भी पाए जाते हैं। मगर ये छात्र भारत में मध्यम तथा निम्न वर्गों से होते हैं, जिनके माता-पिता प्रतिवर्ष 25 लाख से 50 लाख रुपए खर्च कर इंगलैंड या अमरीका भेजते हैं। भारत में 15-29 आयु वर्ग के लोगों की संख्या 37 करोड़ है। यदि केवल मैडीकल, ग्रैजुएट्स पर ही नजर डाली जाए, तो इस वर्ष नीट परीक्षा में शामिल हुए 22 लाख छात्रों में से केवल 5 प्रतिशत 844 मैडीकल कॉलेजों में 1,39,489 एम.बी.बी.एस. सीटों के लिए चुने गए।
चिंताजनक बात यह है कि 30 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक 5 शिक्षित लोगों में से 4 बेरोजगार हैं। जो लोग पढ़ या लिख नहीं सकते उनमें बेरोजगारी की दर 9 गुणा अधिक है। यहां तक कि भारत की प्रसिद्ध सूचना तकनीकी कम्पनियां भी इंजीनियरों को निकाल तथा भॢतयों पर रोक लगा रही हैं। सभी 5 बड़ी कम्पनियों ने गत 9 महीनों में केवल 17 कर्मचारियों की भर्ती की। इसलिए बहुत से लोग कम वेतन वाली नौकरियां ले रहे हैं जिससे वे अपने परिवारों को नहीं पाल सकते। बड़ा प्रश्न यह है कि भारत इस स्थिति में कैसे पहुंचा? हम अपनी शिक्षा प्रणाली में सुधार करने के लिए क्या कर सकते हैं? वास्तव में बहुत कुछ करने की जरूरत है। 1976 तक शिक्षा राज्य सरकारों के अंतर्गत थी। 42वें संवैधानिक संशोधन ने सब कुछ बदल दिया, इसने इसे समवर्ती सूची में डाल दिया अर्थात केंद्र तथा राज्य दोनों ही स्कूलों, विश्वविद्यालयों तथा परीक्षाओं आदि के संबंध में कानून पारित कर सकते हैं।
यदि शिक्षा पर राज्य का कानून केंद्रीय कानून से टकराता है तो केंद्र का कानून लागू होगा। इस तरह से शिक्षा की एक केंद्रीयकृत प्रणाली की शुरूआत हुई जिसका 2010 में यू.पी.ए. सरकार ने प्रयास किया लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने इसकी इजाजत नहीं दी। मगर अब वर्तमान सरकार के अंतर्गत मैडीकल शिक्षा का केंद्रीयकरण किया गया है। उच्च शिक्षा का भी केंद्रीयकरण होने के आसार हैं, मगर फिलहाल सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में रखा है।
इस समय भारतीय शिक्षा व परीक्षा प्रणाली के पूर्ण कायाकल्प की जरूरत है। हम अपने बच्चों को गैर शिक्षण गतिविधियों, हॉबीज, खेलों के लिए कोई समय नहीं देते, केवल रट्टा पढ़ाई से लेकर कोङ्क्षचग क्लासिज तक रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं (यहां तक कि चीन ने अपनी स्कूली शिक्षा में सुधार करने के लिए युवाओं हेतु कोचिंग क्लासिज पर प्रतिबंध लगा दिया है)। हमें न केवल अधिक कालेजों तथा स्कूलों की जरूरत है बल्कि एक ऐसे पाठ्यक्रम की भी, जो भविष्य की ए.आई. दुनिया की जरूरतों को भी पूरा करे। अब रट्टा प्रणाली की बजाय एक विचारोत्तेजक और सुदृढ़ शिक्षा प्रणाली लाने का समय है। अब समय है गंभीर सुधार करने का।
