‘चीन के लिए ‘वरदान’ है ईरान-अमरीका युद्ध’ बिना कुछ किए अपना दबदबा बढ़ा लिया!

punjabkesari.in Monday, Jul 20, 2026 - 05:05 AM (IST)

ईरान-अमरीका युद्ध कभी ठंडा पड़ता है तो कभी गर्म हो जाता है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा करते रहते हैं और दुनिया उलझन में है। दोनों ही पक्षों का भारी नुकसान हो रहा है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बिना कुछ किए इस युद्ध का सर्वाधिक लाभ चीन को हो रहा है। बीजिंग को न ही भारी रकम खर्च करनी पड़ी और न ही अपनी राजनीतिक साख का इस्तेमाल करना पड़ा, लेकिन पिछले तीन दशकों में किसी भी संकट की तुलना में उसे इस संकट से सर्वाधिक लाभ हुआ है। 

मध्य-पूर्व के देशों की अमरीका पर निर्भरता कम करने, दुनिया को महत्वपूर्ण चीनी तकनीक पर अधिक निर्भर बनाने और अपनी एक गंभीर तथा टिकाऊ विश्व शक्ति के रूप में पहचान बनाने के तीन लक्ष्यों को तेजी से आगे बढ़ाने में इस युद्ध ने बड़ा योगदान दिया है जिन्हें हासिल करने के लिए चीन के शासक लम्बे समय से कोशिश कर रहे थे। चीन के नेता शी जिनपिंग के लिए काफी हद तक अमरीका के राष्टï्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह काम कर दिया है। अमरीका के खाड़ी सहयोगी देशों ने देख लिया है कि बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की परवाह किए बिना अमरीका ने यह युद्ध किस तरह अव्यवस्थित ढंग से लड़ा है। फारस की खाड़ी अब दो खेमों में बंट रही है। संयुक्त अरब अमीरात हालांकि इसराईल और अमरीका के निकट आ रहा है परंतु कतर, ओमान और शायद इराक व तुर्की पर आधारित सऊदी अरब की अगुवाई वाला एक बड़ा समूह संतुलन बनाकर रखना और दीर्घकालिक सुरक्षा चाहता है। इसके लिए वे अमरीका के साथ अपने रिश्ते भी बनाए रखना चाहते हैं लेकिन इसके साथ ही ईरान से बातचीत और चीन के साथ बेहतर संबंध भी रखना चाहते हैं।

2016 से 2025 के बीच मध्य-पूर्व में चीन के रक्षा निर्यात में खाड़ी देशों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक रही है। कोई भी देश अमरीका की सुरक्षा व्यवस्था की जगह नहीं लेना चाहता, लेकिन वे विकल्प चाहते हैं जिससे अमरीका के दबदबे में कमी आएगी। चीन की अधिक प्रभावशाली जीत जियो-इकोनॉमिक है। पहली नजर में, 70 प्रतिशत तेल आयात करने वाले देश को इस युद्ध से सर्वाधिक नुकसान होना चाहिए था, परंतु चीन ने अधिकांश देशों की तुलना में इस झटके का बेहतर ढंग से सामना किया क्योंकि वह इसके लिए वर्षों से तैयारी करता आ रहा था। अपने सप्लायरों में विविधता लाकर चीन ने दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार बनाया, कोयले का इस्तेमाल जारी रखा, परमाणु ऊर्जा का विस्तार किया और अपनी अर्थव्यवस्था को इतने बड़े पैमाने पर चुस्त किया कि कोई अन्य प्रमुख देश इसकी बराबरी नहीं कर सका। अब चीन की ऊर्जा खपत में बिजली  की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है, जो अमरीका या यूरोप की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक है।  इन्हीं सब कारणों से, चीन युद्ध के दौरान अपने आयातित तेल की खरीद में प्रतिदिन लगभग 40 लाख बैरल की कटौती करने में सफल रहा। 

यह युद्ध चीन की महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए एक बहुत बड़ा विज्ञापन बन गया है। हर जगह सरकारें अपनी सोलर पावर, बैटरी, विंड टर्बाइन, इलैक्ट्रिक वाहन और ग्रिड विकसित करने की कोशिश कर रही हैं। चीन का दुनिया की सोलर-पैनल निर्माण क्षमता के लगभग 91 प्रतिशत और लिथियम-आयन बैटरी क्षमता के 89 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण है। लगभग सभी क्लीन-एनर्जी तकनीकों में से कम से कम 70 प्रतिशत का निर्माण चीनी कंपनियां करती हैं। ऊर्जा की असुरक्षा जितनी अधिक बनी रहेगी, दुनिया चीन के एकाधिकार वाले उद्योगों से उतनी ही अधिक खरीदारी करेगी। यह युद्ध ग्लोबल व्यापार पर डॉलर की पकड़ को कमजोर करने के चीन के एक अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्य को भी आगे बढ़ाता है। ईरान ने होर्मुज से कुछ टैंकरों को इस शर्त पर गुजरने दिया कि लेन-देन चीनी रेनमिनबी (या क्रिप्टो करंसी) में किया जाए। 

ट्रम्प ने यह युद्ध खुद चुना और ऐसा करने में अरबों डॉलर खर्च कर दिए, अमरीका के हथियार बर्बाद किए, एशिया से सैन्य संसाधन हटाए, सहयोगियों को परेशान किया और यह साबित कर दिया कि अमरीका की भारी-भरकम ताकत के बावजूद, गलत रणनीति और लगातार बदलते तौर-तरीकों के नतीजे बुरे ही होते हैं। चीन ने इस युद्ध में बहुत कम दखल दिया। वह ईरान से तेल खरीदता रहा, खाड़ी देशों से संबंध बनाए रखे और ईरान की रक्षा करने या खाड़ी में सुरक्षा व्यवस्था संभालने के खर्च से बचा रहा। पिछले 25 वर्षों में, अमरीका ने मध्य पूर्व में तीन बड़े सैन्य अभियानों में अपनी ताकत झोंक दी, जबकि चीन ने निर्माण शक्ति, तकनीकी क्षमता और कूटनीतिक संबंध बढ़ाए। अमरीका के लक्ष्यों, गठबंधनों और विश्वसनीयता को हुए नुकसान की तुलना में देखें तो चीन लाभ की स्थिति में रहा है।


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Related News