ईरान में युद्ध समाप्त होने के बाद भी इसका दुष्प्रभाव लंबे समय तक महसूस किया जाएगा
punjabkesari.in Monday, Jun 15, 2026 - 03:26 AM (IST)
अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि वह इस वर्ष 28 फरवरी से जारी ईरान-अमरीका-इसराईल युद्ध समाप्त करने के समझौते से मात्र 24 घंटे दूर हैं और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने भी ऐसा ही कहा है। हालांकि यह समझौता होना जरूरी है लेकिन इससे पहले अब तक जो नुक्सान हो चुका है उसकी भरपाई करना कठिन होगा। आर्थिक पहलू से भी यदि देखा जाए तो इसमें केवल ईरान का ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था का नुकसान हुआ है क्योंकि सारी दुनिया में ही तेल की आपूर्ति रुकी हुई है तथा बड़ी संख्या में लोगों की मौतें भी हुई हैं। ईरान के आसपास के देश कतर, यू.ए.ई. तथा सऊदी अरब आदि भी इससे प्रभावित हुए हैं।
इस युद्ध में सीजफायर के दौरान पहले इसराईल और फिर अमरीका द्वारा ईरान पर हमले के बाद ईरान द्वारा अमरीका के मित्र देशों के तेल के भंडारों तथा अमरीका के मिसाइल ठिकानों पर हमलों के कारण वातावरण में फैलने वाली विषैली गैसों से युद्ध समाप्त हो जाने के बाद भी इन्सानी सेहत तथा पर्यावरण पर लंबे समय तक पड़ते रहने वाले कुप्रभाव को लेकर विशेषज्ञों में ङ्क्षचता पैदा कर दी है। इंगलैंड स्थित एन.जी.ओ. ‘कन्फ्लिक्ट एंड एन्वायरनमैंट आब्जर्वेटरी’ (सी.ई.ओ.बी.एस.) ने अपने शोध में फारस की खाड़ी में तेल के टैंकरों तथा मिसाइलों के ठिकानों पर हमलों के कारण पर्यावरण को हानि पहुंचाने में सक्षम 300 से अधिक घटनाओं की शिनाख्त की है। लेकिन शोधकत्र्ताओं का कहना है कि यह तो होने वाले नुक्सान का एक अंश मात्र है। सी.ई.ओ.बी.एस. के निदेशक ‘डग वियर’ के अनुसार,‘‘अमरीका 5000 ठिकानों को निशाना बनाने का दावा कर रहा है।’’
इस युद्ध के कारण तेल रिफाइनरियों में आग तथा डूबे हुए जहाजों के कारण इस इलाके के लोगों की सेहत, पानी और खाद्य आपूॢत और ईकोसिस्टम पर युद्ध समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक असर पड़ता रहने का खतरा है। तेल कुओं में धमाकों से उठने वाले जहरीले धुएं के गुबार में पाॢटकुलेट मैटर, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक मौजूद हैं। संयुक्त राष्टï्र ने भी चेतावनी दी है कि इसका सीधा असर साफ पानी, लोगों के लिए जरूरी हवा और भोजन पर पड़ सकता है।इसराईल के हवाई हमलों के बाद तेहरान में ऑयल डिपो के टैंकरों से उठे घने काले धुएं के गुबार से वहां भारी धुआं छा गया। इसके बाद ईरान की रैड क्रिसेंट सोसाइटी ने लोगों को हवा में मौजूद जहरीले प्रदूषकों से बचने के लिए अपने घरों के अंदर ही रहने की चेतावनी दी।
इस धुएं में फाइन पार्टिकुलेट मैटर और सल्फर डाइऑक्साइड के साथ-साथ जहरीले वोलाटाइल ऑर्गेनिक कम्पाऊंड और अन्य खतरनाक प्रोडक्ट भी शामिल हो सकते हैं जो खासकर शिशुओं, वयस्कों और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों की त्वचा और फेफड़ों में गहराई तक जाकर सांस और दिल की बीमारियों, आंखों और गले में जलन के खतरे, सिरदर्द और सांस लेने में दिक्कत को बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों ने यह चेतावनी भी दी है कि बमवर्षा की शिकार होने वाली मिलिट्री और एनर्जी साइटें तथा तेल भंडार वर्षों तक पर्यावरण में बनी रहने वाली गंदगी छोड़ सकती हैं तथा हवा में जहरीले प्रदूषकों के गुबार आस-पास के इलाकों में फैल कर सड़कों, छतों, मिट्टी और फसलों पर जमा हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, टी.एन.टी., जिसका इस्तेमाल हथियारों में होता है और जिसे एनवायरनमैंटल प्रोटैक्शन एजैंसी ने इंसानों के लिए कैंसर पैदा करने वाला माना है, मिट्टी में रह सकता है, जिससे पेड़-पौधों और इंसानों की सेहत को नुकसान पहुंच सकता है। सिर्फ फारस की खाड़ी ही खतरे में नहीं, पर्यावरण प्रदूषण का असर अब तुर्कमेनिस्तान, कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, चीन और श्रीलंका तक फैल गया है, जो पश्चिमी अफगानिस्तान व पाकिस्तान को भी प्रभावित कर सकता है। हालांकि भविष्य में इसे साफ करने या मैनेज करने की हमारी क्षमता बहुत सीमित होगी। इसीलिए प्रथम विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्टï्र में कानून बना दिए गए थे कि आम आदमी तथा पर्यावरण के लिए दीर्घकाल तक खतरा पैदा करने वाले किसी भी उपाय का युद्धों में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। परंतु ईरान-अमरीका संघर्ष से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि किस प्रकार अपनी स्वार्थ पूॢत के लिए सिर्फ किसी एक देश का नहीं, बल्कि सारी दुनिया का नुकसान किया जा रहा है।
वायुमंडल में काफी समय तक रहने वाली ये विषैली गैसें यदि वर्षा होने पर तेजाब बन कर पानी के अन्य स्रोतों में जाएंगी तो इस विषैले पानी से वैसी ही क्षति हो सकती है, जैसी चेरनोबिल परमाणु संयंत्र की लीकेज से हुई थी, तो क्या विश्व अब ऐसे युद्ध लड़ेगा जिनके समाप्त हो जाने के बाद भी विनाश जारी रहेगा?
