ओपेक से अलग होना यू.ए.ई. के अलावा भारत के लिए भी लाभदायक
punjabkesari.in Monday, May 04, 2026 - 03:27 AM (IST)
1960 के दशक में ‘पैट्रोलियम निर्यातक देशों के हितों की खातिर ‘ओपेक’ का गठन किया गया था। ‘ओपेक’ में पहले तो 5 देश ईरान, ईराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला थे, परंतु अब 11 हो गए हैं, जिनमें अल्जीरिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबोन, ईरान, ईराक, कुवैत, लीबिया, नाईजीरिया, सऊदी अरब और यू.ए.ई. (यूनाइटेड अरब एमिरेट्स) शामिल हैं। ‘ओपेक’ का उद्देश्य अपने सदस्य देशों द्वारा तेल की बिक्री की मात्रा पर सहमति बना कर तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों को प्रभावित करना है। जब वे अधिक तेल बेचने पर सहमत होते हैं तो उनका लक्ष्य सप्लाई को अधिक बनाए रख कर कीमतों को कम रखना होता है और जब वे सप्लाई को कम करते हैं तो उनका उद्देश्य कीमतों को ऊंचा बनाए रखना होता है।
‘ओपेक’ से पहले के समय से ही यू.ए.ई. के पास बहुत अधिक तेल का भंडार था। यह ‘ओपेक’ समूह का चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। इसने 2025 में प्रतिदिन 3.1 मिलियन बैरल तथा ‘ओपेक’ समूह के मुखिया सऊदी अरब ने प्रतिदिन 9 मिलियन बैरल से अधिक तेल का उत्पादन किया। यू.ए.ई. का कहना है कि ईरान के सर्वाधिक निकट होने के कारण ईरान-अमरीका युद्ध का सर्वाधिक दंश उसे ही झेलना पड़ा है तथा अमरीका के जितने भी सैनिक अड्डे थे, उन सब पर हमला करने के लिए उसे ही निशाना बनाए जाने के कारण उसका बहुत नुकसान हुआ। यू.ए.ई. के अनुसार उन्हें ‘ओपेक’ के सदस्य देशों से कोई विशेष सहायता भी नहीं मिलने के कारण वह 1 मई, 2026 से ‘ओपेक’ से नाता तोड़ रहे हैं और भविष्य में अपनी मनचाही मात्रा में तेल का उत्पादन करेंगे और ‘ओपेक’ के आदेश स्वीकार नहीं करेंगे। ओपेक से बाहर निकलने के बाद यू.ए.ई. प्रतिदिन लगभग एक मिलियन बैरल तेल का उत्पादन बढ़ा सकता है। अकेले आगे बढऩे की यू.ए.ई. की योजना को ‘ओपेक’ के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। यू.ए.ई. ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को लेकर बहुत अस्थिरता है तथा अमरीका और ईरान के बीच युद्ध के कारण तेल की सप्लाई में सबसे बड़ी कमी आई है।
कुछ समय पहले तक ‘ओपेक’ तेल उत्पाद देशों के सबसे बड़े संगठनों में से एक था परंतु अब कनाडा, अमरीका आदि सभी देशों द्वारा तेल का उत्पादन शुरू कर देने के कारण तीसरे स्थान पर आ गया है। हालांकि रूस इसमें शामिल हुआ था परंतु ‘ओपेक’ में अमरीका द्वारा नियम डिक्टेट किए जाने के कारण कि अमुक देश कितने तेल का उत्पादन करेगा, रूस ने इससे मुंह मोड़ लिया! यही कारण है कि अपने तेल का उत्पादन करने के लिए अमरीका ने इन देशों को तेल का कम उत्पादन करने का फरमान सुना रखा है। 2024 में यू.ए.ई. द्वारा ब्रिक्स में शामिल होना और अब 1 मई को ‘ओपेक’ छोडऩा यू.ए.ई. का बहुत बड़ा निर्णय है। उसके इस कदम से अमरीका के हाथ से तेल उत्पादन के मामले में सारा संतुलन निकल जाएगा। यही कारण है कि 1 मई को इसराईल ने यू.ए.ई. को बहुत सारी सैन्य सहायता भेजी है। इसराईल ने उसे आयरन डोम वाली सुविधा तथा स्पैक्ट्रो नामक एडवांस्ड सॢवलांस सिस्टम दिया है जो 20 किलोमीटर दूरी से ही आ रहे हमलावर ड्रोनों, विशेष रूप से ईरान की मिसाइलों तथा शाहेद ड्रोन को पहचान कर हवा में ही भस्म करने में सक्षम है।
हालांकि इसराईल ने यू.ए.ई. को तोपें भी भेजी हैं, परंतु यू.ए.ई. का कहना है कि यह सहायता बहुत देर से आई है जिसका कोई लाभ नहीं। बेशक अतीत में ‘अब्राहम समझौतों’ में इसराईल के साथ यू.ए.ई. और सऊदी अरब आदि सब देशों के साथ संबंधों में सुधार हुआ था परंतु यू.ए.ई. के शासकों का कहना है कि जब उन्हें सहायता की आवश्यकता थी तब तो कोई उनकी सहायता को आया ही नहीं और अब वे इस सहायता का क्या करें और उन्हें तेल का उत्पादन भी नहीं करने दिया जा रहा। यू.ए.ई. के शासकों को शिकवा है कि अमरीका-ईरान युद्ध को शुरू हुए 2 महीने हो चुके हैं और यू.ए.ई. ताबड़तोड़ एक के बाद एक हमले झेल रहा था। यू.ए.ई. के शासकों का कहना है कि वे 1970 के दशक से अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे, उसे इस युद्ध में भारी क्षति पहुंची है और अब जबकि तेल की कीमतों में तेजी आ रही है तो वे इसका लाभ क्यों न उठाएं।
विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का भारत को लाभ हो सकता है। 2024 से ब्रिक्स का हिस्सा बना यू.ए.ई. अब अधिक सक्रिय होना चाहता है तथा भारत को उसी भाव पर तेल की सप्लाई करने को तैयार है जिस भाव पर हम लेना चाहते हैं और जो भाव यू.ए.ई. के लिए भी लाभदायक है तथा भारत को उससे तेल लेने में आसानी भी होगी। ‘ओपेक’ कोटा से मुक्त होकर संयुक्त अरब अमीरात उत्पादन बढ़ाने की उम्मीद रखता है। रुपए में व्यापार की संभावना और आपूर्ति में अधिक लचीलापन आ सकता है। भारत के लिए प्रमुख लाभ तेल आयात बिल में 85 प्रतिशत तक कमी हो सकता है। इससे न केवल द्विपक्षीय संबंध मजबूत हो सकते हैं, बल्कि यह भारत के डालर मुक्तिकरण प्रयासों का संभावित रूप बन सकता है।
