‘नेपाल का हो रहा चीन से मोहभंग’ भारत के लिए एक अवसर!

punjabkesari.in Wednesday, Apr 29, 2026 - 03:27 AM (IST)

भारत के पड़ोसी नेपाल में गत वर्ष सितम्बर में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी  तथा कुछ सोशल मीडिया साइट्स पर लगाए गए प्रतिबंधों के विरुद्ध हुए जेन जैड (युवा पीढ़ी) के आंदोलन के बाद 5 मार्च को हुए ‘प्रतिनिधि सभा’ के चुनाव में 182 सीटें जीत कर वर्तमान प्रधानमंत्री ‘बालेन शाह’ की ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ ने स्पष्टï बहुमत प्राप्त कर लिया। 27 मार्च, 2026 को ‘बालेन शाह’ ने देश के सबसे छोटी आयु के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने के कुछ ही दिनों के भीतर नेपाल में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अब तक का सबसे बड़ा अभियान छेड़ दिया। इस उद्देश्य के लिए ‘बालेन शाह’ की सरकार ने 5 सदस्यीय न्यायिक पैनल बनाया है जो 2006 से लेकर 2025-26 तक सार्वजनिक पदों पर रहे लोगों की सम्पत्ति की जांच करेगा। इसके तहत जांच के दायरे में सभी पूर्व 7 प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, संवैधानिक पदों पर बैठे 100 से अधिक लोगों और वरिष्ठ नौकरशाहों के अलावा उन नेताओं को भी लाया जाएगा जो अब जीवित नहीं हैं। 

‘बालेन शाह’ की सरकार के इन्हीं फैसलों का परिणाम है कि उनके शासन के लगभग एक महीने के भीतर ही उनके 2 मंत्रियों श्रम मंत्री ‘दीप कुमार साह’ तथा मनी लांड्रिंग के आरोपों में घिरे गृहमंत्री ‘सूदन गुरुंग’ को अपने पदों से त्यागपत्र देना पड़ा है तथा अनेक लोग कैद किए गए हैं। हाल के वर्षों में नेपाल में चीन की बढ़ती भूमिका आॢथक सहयोग से परे जाकर रणनीतिक और राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है। पूर्व प्रधानमंत्री ‘के.पी. शर्मा ओली’ के कार्यकाल के दौरान नेपाल ने चीन के साथ कई समझौते किए जिन्हें आॢथक स्वतंत्रता की दिशा में क्रांतिकारी कदम के रूप में पेश किया गया था। परन्तु अब नेपाल की नई सरकार ने चीन के साथ किए गए उन समझौतों की भी गहराई से जांच करनी शुरू कर दी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ओली के शासनकाल में शुरू की गई चीन से जुड़ी कई योजनाएं बिना किसी स्पष्ट कारण के क्यों रुक गईं।

‘बालेन शाह’ सरकार ने यह भी घोषणा की है कि इन परियोजनाओं की पूरी समीक्षा होने तक चीन के साथ किसी भी नए समझौते पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। चीनी परियोजनाओं की जांच से नेपाल सरकार यह यकीनी बनाने की कोशिश कर रही है कि भविष्य में कोई भी विदेशी निवेश नेपाल की सम्प्रभुता और राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध न जाए। जहां तक भारत-नेपाल सम्बन्धों का प्रश्र है, ऐतिहासिक रूप से भारत के साथ नेपाल के रोटी-बेटी के गहरे संबंधों के बावजूद समय-समय पर दोनों देशों के बीच सीमा विवाद आदि मुद्दों पर तनाव देखा गया तथा दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव आता रहा है जो पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा के कार्यकाल में चरम पर पहुंच गया था परंतु नेपाल के अधिकांश शासकों द्वारा भारत से सम्बन्ध संतुलित रखने की कोशिशें जारी रही हैं। चूंकि नेपाल में चीन की भूमिका अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है और चीन अब नेपाल के आॢथक फैसलों और राजनीतिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर रहा है। 

हाल-फिलहाल की बात करें तो पूर्व प्रधानमंत्रियों ‘पुष्प कमल दहल प्रचंड’ तथा ‘सुशीला कार्की’ के अंतरिम प्रधानमंत्री काल में नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद भारत के साथ संबंधों में संतुलन बनाने की कोशिश की गई। पुष्प कमल दहल प्रचंड की 2023-2024 की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ऊर्जा और व्यापार समझौते भी किए गए। नेपाल सरकार द्वारा चीनी परियोजनाओं पर रोक लगाने का कारण चाहे जो भी हो, इसे भारत के लिए एक मौका ही माना जाना चाहिए। नेपाल सरकार के साथ विवादों के बावजूद भारत अभी भी नेपाल का बड़ा व्यापारिक भागीदार तथा उसे सहायता प्रदान करने वाला देश बना हुआ है। अत: भारत सरकार को नेपाल की चीन से बढ़ती दूरी का लाभ उठाने की भरसक कोशिश करनी चाहिए।-विजय कुमार   


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