‘भारत विरोधी नेपाली प्रधानमंत्री’ ‘ओली ने बहुमत खोया : भविष्य दाव पर’

5/7/2021 5:05:22 AM

भारत और नेपाल का रोटी-बेटी का नाता है परंतु प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ‘ओली’ ने सदियों पुराने इस रिश्ते में दरार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ‘ओली’ ने नेपाल के घरेलू मामलों में मनमाने निर्णय लेने के साथ-साथ चीन के उकसावे पर भारत के तीन इलाकों ‘लिपुलेख’, ‘कालापानी’ व ‘लिपियाधुरा’ पर दावा जताने के अलावा अनेक भारत विरोधी पग उठाए। उसने भारत विरोधी अनेक बयान दिए और नेपाल में कोरोना के प्रसार के लिए भी भारत को ही जिम्मेदार ठहराया था। 

बहरहाल, नेपाल पर कब्जा बनाए रखने की रणनीति के अंतर्गत जब  ‘ओली’ ने 20 दिस बर, 2020 को नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी से नेपाल की संसद भंग करने तथा 30 अप्रैल व 10 मई, 2021 को देश में चुनावों की घोषणा करवा दी तो उसके विरुद्ध देश में रोष भड़क उठा। ‘ओली’ के इस कदम को असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक, निरंकुश व जनादेश के खिलाफ बताते हुए रोष स्वरूप ‘नेपाल क युनिस्ट पार्टी’ दोफाड़ हो गई।

विपक्षी दलों ने इसके विरुद्ध सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने ‘ओली’ को झटका देते हुए प्रतिनिधि सदन बहाल कर दिया। इस बीच जहां एक ओर प्रधानमंत्री ‘ओली’ अपनी सरकार बचाने के लिए जोड़-तोड़ करने लगा तो दूसरी ओर देश के 85 प्रतिशत हिन्दू मतदाताओं को प्रभावित करने के उद्देश्य से स्वयं को एक हिन्दुत्ववादी नेता के रूप में पेश करने के लिए धार्मिक अनुष्ठïानों में भाग लेने लगा। 

इसी रणनीति के अंतर्गत जनवरी में वह काठमांडू के ‘पशुपति नाथ मंदिर’ में पत्नी राधिका के साथ पूजन के लिए गया। उसने वहां पूजा-अर्चना करने के अलावा देसी घी के सवा लाख दीपक जलाए और मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए 108 किलो सोने की खरीद हेतु 30 करोड़ रुपए देने की घोषणा भी की।

के.पी. शर्मा ‘ओली’ इससे पहले कभी किसी मंदिर में नहीं गया था। उसके इस कदम को उसके विरोधियों ने संविधान पर हमला बताया क्योंकि देश के संविधान में नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का दर्जा दिया गया है। इसी रणनीति के अंतर्गत उसने काठमांडू से 150 किलोमीटर दूर ‘चितवन’ के माडी क्षेत्र में भगवान श्री राम, सीता और लक्ष्मण की प्रतिमाएं प्रतिष्ठिïत करने के समारोह से पूर्व 20 अप्रैल को इन प्रतिमाओं को अपने सरकारी आवास पर मंगवा कर उनके पूजन-अर्चन में समय बिताया। 

‘ओली’ की विचारधारा में अचानक हिन्दुत्व के प्रति यह झुकाव ऐसे समय में आया जब देश में 2008 से पहले की एक हिन्दू राष्टï्र की स्थिति बहाल करने की मांग पर बल देने के लिए प्रदर्शन अभी भी जारी हैं। इस तरह के हालात के बीच सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए प्रतिनिधि सदन में विश्वास मत प्राप्त करने के लिए अचानक 3 मई को ओली ने 10 मई को संसद का अधिवेशन बुलाने की घोषणा कर दी। उस समय जबकि ‘ओली’ के विश्वास मत प्राप्त करने में 5 दिन ही बाकी थे, एक नाटकीय घटनाक्रम में उसके विरोधी पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व वाली सी.पी.एन. (माओवादी सैंटर) द्वारा 5 मई को ही ‘ओली’ सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर देने से उसने बहुमत खो दिया है। 

सी.पी.एन. (माओवादी सैंटर) के मु य सचेतक देव गुरुंग ने संसद सचिवालय के अधिकारियों को इस आशय का पत्र सौंपते हुए ‘ओली’ पर देश के संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा है कि इससे देश की स प्रभुता के लिए खतरा पैदा हो गया है। उल्लेखनीय है कि 275 सदस्यों वाले प्रतिनिधि सदन में ‘ओली’ की पार्टी के पास 121 और प्रचंड की पार्टी के पास 49 सदस्य हैं। चूंकि प्रतिनिधि सदन के 4 सदस्य निलंबित हैं अत: विश्वासमत प्राप्त करने के लिए ‘ओली’ को कम से कम 136 वोटों की आवश्यकता है। अत: इन हालात में अपनी सरकार बचाने के लिए ‘ओली’ के पास अब 15 सांसद कम हो गए हैं। 

इसी बीच 5 मई को ही ‘ओली’ ने मु य विपक्षी नेता एवं नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष ‘शेर बहादुर देऊबा’ से सरकार बचाने के लिए समर्थन मांगा लेकिन नेपाल कांग्रेस कुछ दिन पहले ही दूसरे दलों के साथ मिल कर अपने तौर पर सरकार बनाने के इरादे की घोषणा कर चुकी है। ऐसे में लगता है कि अब ‘ओली’ की कुर्सी खिसकने ही वाली है परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह राजनीति है और इसमें अंतिम समय पर हालात कौन सी करवट लेंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता।—विजय कुमार 


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