जानिए, भगवान विष्णु को किसने दिया था सुदर्शन चक्र

Wednesday, November 1, 2017 3:52 PM
जानिए, भगवान विष्णु को किसने दिया था सुदर्शन चक्र

भगवान विष्णु के हर चित्रपट व श्रीस्वरूप में उन्हें सुदर्शन चक्र धारण किए हुए देखा जाता है। सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अमोघ शस्त्र है। सुदर्शन चक्र अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाने वाला एक एेसा चक्र है जो चलाने के बाद अपने लक्ष्य पर पहुंचकर वापस आ जाता है। अधिकतर लोगों को इसके रहस्य के बारे में नहीं पता है कि भगवान विष्णु को यें सुदर्शन चक्र किसने भेंट किया था। किंवदंती है कि इस चक्र को भगवान विष्णु ने गढ़वाल के श्रीनगर स्थित कमलेश्वर शिवालय में तपस्या कर के प्राप्त किया था। यह चक्र भगवान विष्णु को ‘हरिश्वरलिंग’ से प्राप्त हुआ था। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि इस चक्र ने देवताओं की रक्षा तथा राक्षसों के संहार में अतुलनीय भूमिका का निर्वाह किया था। आईए इसके बारे में विस्थार में जानें कि कैसे शिव शंकर ने भगवान विष्णु को वरदान में दिया सुदर्शन चक्र


पौराणिक कथा
एक बार भगवान विष्णु, शिवजी का पूजन करने के लिए काशी आए। यहां उन्होनें मणिकार्णिका घाट पर स्नान करके भगवान शिव की विधि पूर्वक अराधना शुरू की। वे हजार नामों से शिव की स्तुति करने लगे। वे प्रत्येक नाम पर एक कमल पुष्प भगवान शिव को चढ़ाते। तब भगवान शंकर ने विष्णु की परीक्षा लेने के लिए उनके द्वारा लाए एक हजार कमल में से एक कमल का फूल छिपा दिया। शिव की माया के कारण विष्णु को यह पता न चला। एक फूल कम पाकर भगवान विष्णु उसे ढूंढने लगे। परंतु फूल नहीं मिला। 


तब उन्होंने सोचा कि मेरी आंखें ही कमल के समान हैं इसलिए मुझे कमलनयन और पुण्डरीकाक्ष कहा जाता है। एक कमल के फूल के स्थान पर मैं अपनी आंख ही चढ़ा देता हूं। ऐसा सोचकर भगवान विष्णु जैसे ही अपनी आंख भगवान शिव को चढ़ाने के लिए तैयार हुए, वैसे ही शिवजी प्रकट होकर बोले- "हे विष्णु। तुम्हारे समान संसार में कोई दूसरा मेरा भक्त नहीं है"। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीहरि के समक्ष प्रकट होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। 


तब विष्णु ने दैत्यों को समाप्त करने के लिए अजेय शस्त्र का वरदान मांगा। तब भगवान शंकर ने विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान किया और कहा कि तीनों लोकों में इसकी बराबरी करने वाला कोई और अस्त्र नहीं होगा। विष्णु ने उस चक्र से दैत्यों का संहार किया। इससे देवताओं को दैत्यों से मुक्ति मिली तथा सुदर्शन चक्र उनके स्वरूप के साथ सदैव के लिए जुड़ गया। तब से यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी बैंकुठ चतुर्दशी के नाम से प्रचलित हो गई। इस दिन विष्णु पूजन उपरांत शिव पूजन करने से बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।



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