युगों से तपस्वियों को आकर्षित करता आया है ये तट, इसके किनारे स्थापित हैं 28 तीर्थ

Thursday, March 16, 2017 10:13 AM
युगों से तपस्वियों को आकर्षित करता आया है ये तट, इसके किनारे स्थापित हैं 28 तीर्थ

एक किंवदंती के अनुसार उज्जयिनी में अत्रि ऋषि ने तीन हजार साल तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों को ऊपर ही उठाए रखा। अपनी तपस्या पूर्ण होने के बाद जब उन्होंने अपने नेत्र खोले तब देखा कि उनके शरीर से प्रकाश के दो स्रोत प्रवाहित हो रहे हैं-पहला आकाश की ओर गया और चंद्रमा बन गया और दूसरे ने जमीन पर क्षिप्रा नदी का रूप धारण किया। क्षिप्रा को सोमवती के नाम से भी जाना जाता है।

‘क्षिप्रे: अवे: पत्र:’

 

महाकाल पर क्षिप्राभिषेक कथा
हमारा इतिहास नदियों के प्रवाह से रचा गया इतिहास है और उनके तट हमारी परम्परा के विकास की कहानी कहते हैं। क्षिप्रा भी मानव के जीवन का पर्याय है। वह किसी पर्वत के गौमुख से नहीं धरा के गर्भ से प्रस्तुत होकर धरातल पर बहती है इसलिए वह लोकसरिता है। इसके प्रभाव में हमारे लोकजीवन के सुख और दुख के स्वर घुले-मिले हैं। अपने आराध्य महाकाल का युगों से अभिषेक करते हुए यह हमारी आस्था की केंद्र बन गई है। हर बारह साल बाद इसके तटों पर जब आस्था का महामेला सिंहस्थ कुंभ महापर्व के रूप में सजता है तो यह साधना, तपश्चर्या और पवित्रता के उद्घोषक के रूप में हमारे मानस को फिर जागृत करने लगती है। चर्मण्वती जिसे आज चंबल कहा जाता है, क्षिप्रा इसकी सहायक नदी है। मार्कण्डेय पुराण में इन दोनों नदियों का उल्लेख आता है। स्कंदपुराण के अनुसार क्षिप्रा उत्तरगामी है और उत्तर में बहते हुए ही चंबल में आ मिलती है।


क्षिप्रा का उल्लेख यजुर्वेद में भी है। वहां क्षिप्रे: अवे: पत्र: कहते हुए वैदिक ऋषियों ने क्षिप्रा का स्मरण किया है। इसका उल्लेख महाभारत, भागवतपुराण, ब्रह्मपुराण, अग्रिपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण तथा वामनपुराण में भी है। क्षिप्रा की महिमा का संस्कृत साहित्य में खूब उल्लेख है। महाकवि कालिदास ने क्षिप्रा का उल्लेख करते हुए लिखा है-‘क्षिप्रावत: प्रियतम इव प्रार्थना चाटुकार’ और महर्षि वशिष्ठ ने क्षिप्रा स्नान को मोक्षदायक मानते हुए क्षिप्रा और महाकाल की वंदना कुछ इस प्रकार की है-


महाकाल श्री क्षिप्रा गतिश्चैव सुनिर्मला।उज्जयिन्यां विशालाक्षि वास : कस्य न रोचते।।
स्नानं कृत्वा नरो यस्तु महान धामहिदुर्लभम्। महाकालं नमस्कृत्य नरो मृत्युं न शोचते।।


क्षिप्रा का उद्गम और घाट
अनेक कथाओं की जननी ऐसी क्षिप्रा उज्जयिनी को तीन तरफ से घेर रखा है। वह दक्षिण-पूर्वी छोर से नगर में प्रवेश करती है। फिर वह हर स्थान व मोड़ पर मनोहारी दृश्य स्थापित कर लेती है। त्रिवेणी का तट हो या चिंतामण गणेश की ओर जाने का मार्ग, वहां क्षिप्रा की सुंदर भंगिमा के दर्शन होते हैं। महाकाल तथा हरसिद्धि के आशीर्वाद से वह अभिशक्त होती है और भगवान महाकाल के समक्ष उसकी उत्ताल तरंगें मानो नर्तन करती हैं और दुर्गादास की छत्री की ओर बढ़ते हुए वह चक्रतीर्थ पर काशी के मणिकर्णिका घाट का स्मरण कराती हैं। वह भर्तृहरि गुफा, मिच्छदर, गढ़कालिका और कालभैरव क्षेत्र को पार कर सांदीपनि आश्रम और राम जनार्दन मंदिर को निहार कर मंगलनाथ पहुंचती है तथा इस मार्ग में वह गंगाघाट से गुजरती है। आगे बढ़ कर सिद्धवट की ओर मुड़ती है और फिर कालियादेह महुल को घेरती है। क्षिप्रा का यह रूप युगों से तपस्वियों को आकर्षित करते आया है और ये तट इतिहास में अमर हो गए हैं। क्षिप्रा के किनारे 28 प्रमुख तीर्थ हैं। इनमें कर्कराज, नृसिंह तीर्थ, पिशाचमुक्ति तीर्थ, गंधर्व तीर्थ केदार तीर्थ, सोमतीर्थ, चक्रतीर्थ, कालभैरव तीर्थ, मंगल तीर्थ और शक्ति भेद तीर्थ मुख्य हैं।



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