शत्रुघ्न सिन्हा और मेनका गांधी ने डॉ. मुकेश बत्रा की पुस्तक ‘Toxic’ का किया विमोचन
punjabkesari.in Thursday, Oct 01, 2026 - 06:34 PM (IST)
नई दिल्लीः दोस्ती, करुणा और आधुनिक जीवन के बढ़ते दबावों से जुड़ी चिंताओं के बीच अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा और मेनका गांधी ने डॉ. मुकेश बत्रा की नई पुस्तक ‘Toxic: Stories, Science, and Remedies for a Cleaner Mind, Body and Spirit’ का विमोचन किया। यह पुस्तक डॉ. मुकेश बत्रा ने स्वामी शैलेंद्र सरस्वती के साथ मिलकर लिखी है। ब्लूम्सबरी इंडिया द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का विमोचन नई दिल्ली स्थित द ललित में आयोजित एक कार्यक्रम में हुआ।
डॉ. मुकेश बत्रा के साथ अपनी पुरानी दोस्ती का जिक्र करते हुए शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा, “Once a friend, always a friend.” उन्होंने स्नेह के साथ कहा, “यह सिर्फ दोस्ती की बात नहीं है। हम दोनों मिलकर एक mutual admiration society बनाते हैं।” उनकी बातों ने कार्यक्रम में एक व्यक्तिगत गर्माहट जोड़ दी। पुस्तक के विमोचन के दौरान आधुनिक जीवन में लोगों पर बढ़ते मानसिक और भावनात्मक दबाव तथा उन समस्याओं पर चर्चा हुई, जिन्हें कई बार लोग पहचानने या व्यक्त करने में भी कठिनाई महसूस करते हैं।
मेनका गांधी ने भी डॉ. मुकेश बत्रा के प्रति अपने स्नेह और सम्मान को व्यक्त किया। उन्होंने उन्हें एक बेहतरीन इंसान बताते हुए कहा कि वे लंबे समय से उन लोगों और जीवों की मदद करते रहे हैं, जिनकी आवाज अक्सर सामने नहीं आ पाती। उन्होंने डॉ. बत्रा की करुणा और दूसरों की मदद करने की भावना की सराहना की। मेनका गांधी ने यह भी बताया कि होम्योपैथी उनके जीवन में एक खास स्थान रखती है और वह इसका इस्तेमाल पशुओं के उपचार में करती हैं।
डॉ. मुकेश बत्रा के अनुसार, ‘Toxic’ लिखने के पीछे उनके आसपास की दुनिया और लोगों के भीतर चल रही परेशानियों को समझने की इच्छा रही। पुस्तक के विमोचन के दौरान उन्होंने प्रदूषित हवा, भोजन और पानी को लेकर बढ़ती चिंताओं, डिजिटल निर्भरता और भावनात्मक समस्याओं पर बात की। उन्होंने कहा, “इसीलिए मैंने Toxic लिखी—एक डॉक्टर के रूप में किसी मरीज का निदान करने के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता के गवाह के रूप में जो धीरे-धीरे खुद को विषाक्त कर रही है। कभी प्रदूषण के जरिए और कभी अपने ही विचारों के जरिए।”
डॉ. बत्रा ने उन लोगों का भी जिक्र किया जो “बहुत ज्यादा चिंतित, बहुत थके हुए या अपनी परेशानी को स्वीकार करने में बहुत शर्मिंदा” होते हैं। उनके अनुसार, अपनी भावनाओं को दबाकर रखना, रिश्तों में तनाव और लगातार कुछ और हासिल करने की इच्छा आज के जीवन का हिस्सा बनती जा रही है। पर्यावरण प्रदूषण पर बात करते हुए डॉ. बत्रा ने रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को स्वास्थ्य के लिए टहलने की सलाह देना आसान है, लेकिन जब बाहर की हवा ही प्रदूषित हो तो यह सलाह भी मुश्किल हो जाती है। उन्होंने पानी, भोजन, प्लास्टिक और प्राकृतिक संसाधनों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर भी चिंता जताई।
मानवीय इच्छाओं पर बात करते हुए डॉ. बत्रा ने मिर्जा गालिब की मशहूर पंक्ति “हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी” और आज के दौर में लोकप्रिय वाक्य “दिल मांगे मोर” का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि लगातार कुछ पाने और हासिल करने की इच्छा कई बार लालच में बदल जाती है और इंसान के जीवन से संतोष की भावना कम होने लगती है। कार्यक्रम में मौजूद शत्रुघ्न सिन्हा के संदर्भ में डॉ. बत्रा ने मनोरंजन जगत से जुड़े भावनात्मक दबावों पर भी बात की। बॉलीवुड से जुड़े अपने लंबे चिकित्सकीय अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पर्दे पर दिखाई देने वाली चमक-दमक के पीछे कलाकारों को प्रतियोगिता, दर्शकों की प्रतिक्रिया और सार्वजनिक आलोचना का दबाव भी झेलना पड़ता है।
उन्होंने कहा, “God sits in the box office every Friday.” इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने उस अनिश्चितता की ओर इशारा किया, जिसमें किसी फिल्म की सफलता का फैसला रिलीज के बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है। डॉ. बत्रा ने चिकित्सा पेशे की जिम्मेदारियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि डॉक्टर के लिए हर मरीज अपने साथ एक नई जिम्मेदारी लेकर आता है। उन्होंने मनोरंजन और चिकित्सा के क्षेत्र की तुलना करते हुए बताया कि दोनों ही जगह लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव इंसान पर मानसिक और भावनात्मक असर डाल सकता है।
स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने चर्चा को व्यक्ति के आंतरिक जीवन की ओर मोड़ते हुए कहा, “यह सिर्फ हमारे शरीर की बात नहीं है। हमें अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए।” पुस्तक के विमोचन का यह कार्यक्रम डॉ. मुकेश बत्रा के साथ उनके करीबी लोगों के रिश्ते और उनके मानवीय पक्ष को भी सामने लाया। शत्रुघ्न सिन्हा की पुरानी दोस्ती और मेनका गांधी द्वारा डॉ. बत्रा के समाज और बेजुबानों के प्रति योगदान की सराहना ने कार्यक्रम को एक व्यक्तिगत आयाम दिया।
‘Toxic’ के जरिए डॉ. मुकेश बत्रा ने शरीर और पर्यावरण के साथ-साथ मन, भावनाओं और रिश्तों से जुड़े उन पहलुओं पर भी ध्यान आकर्षित किया है, जिनका असर व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है। पुस्तक का विमोचन इसी विचार के साथ हुआ कि बेहतर जीवन के लिए बाहरी दुनिया की स्वच्छता के साथ अपने भीतर की सोच और भावनाओं पर ध्यान देना भी जरूरी है।
