न्यायालय ने नामांकन पत्र रद्द किये जाने को चुनौती देने वाली बीएसएफ के बर्खास्त जवान की अपील खारिज की

2020-11-24T20:58:50.527

नयी दिल्ली, 24 नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2019 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी की सीट पर सीमा सुरक्षा बल के बर्खास्त जवान तेज बहादुर का नामांकन पत्र रद्द करने के फैसले के खिलाफ दायर अपील मंगलवार को खारिज कर दी। इस अपील में याचिकाकर्ता ने वाराणसी संसदीय सीट से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निर्वाचन शून्य घोषित करने का अनुरोध किया था।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमणियन की पीठ ने तेज बहादुर की अपील खारिज करते हुये कहा कि इसमें कोई दम नहीं है और न्यायालय वाराणसी संसदीय सीट से निर्वाचित मोदी को नोटिस जारी करने की आवश्यकता महसूस नहीं करता।

पीठ ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुरू में ही तेज बहादुर चुनाव याचिका खारिज कर सही किया था।
शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के पिछले साल छह दिसंबर के आदेश के खिलाफ तेज बहादुर की अपील पर यह फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने तेज बहादुर की चुनाव याचिका इस आधार पर खारिज की थी कि वाराणसी संसदीय क्षेत्र से मोदी के निर्वाचन को चुनौती देने का उसे कोई अधिकार नहीं था क्योंकि वह न तो उस क्षेत्र का मतदाता था और न ही प्रत्याशी था।

पीठ ने अपने 13 पेज के अपने फैसले में कहा, ‘‘याचिका के कथन से पता चलता है कि अपीलकर्ता (बहादुर) के पास कार्रवाई की कोई वजह नहीं है, जो उसे वाद करने का अधिकार देता है। यह प्रतिपादित व्यवस्था है कि जब किसी व्यक्ति का कोई लेना देना नहीं हो या इसके कानूनी दावे के समर्थन में समुचित हित नहीं हो तो मुकदमा करने का उसे कोई अधिकार नहीं बनता है। मुकदमा करने का अधिकार वाद हेतुक (कॉज ऑफ ऐक्शन) का अभिन्न हिस्सा है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए, हमारा मत है कि पेश चुनाव याचिका को शुरू में ही एकदम सही खारिज किया गया था। अत: सिविल अपील खारिज की जाती है।’’
निर्वाचन अधिकारी ने पिछले साल एक मई को समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बहादुर का नामांकन पत्र खारिज कर दिया था। बहादुर को अप्रैल, 2017 में जवानों को घटिया भोजन दिये जाने की ऑनलाइन शिकायत का वीडियो वायरल करने के मामले में बर्खास्त किया गया था।

सीमा सुरक्षा बल से बर्खास्त तेज बहादुर ने उच्च न्यायालय में अपनी चुनाव याचिका में मोदी का निर्वाचन शून्य घोषित करने का अनुरोध किया था क्योंकि निर्वाचन अधिकारी और चुनाव पर्यवेक्षक ने अपने अधिकारों का कथित रूप से दुरूपयोग करके गलत तरीके से उसका नामांकन पत्र खारिज किया था।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि तेज बहादुर ने दो नामांकन पत्र दाखिल किये थे। पहला 24 अप्रैल, 2019 को और दूसरा 29 अप्रैल, 2019 को और निर्वाचन अधिकारी ने इन नामांकन पत्रों को अवैध पाया था क्योंकि इनके साथ यह प्रमाण पत्र संलग्न नहीं था कि उसे भ्रष्टाचार या शासन से विश्वासघात करने के लिये सेवा से बर्खास्त नहीं किया गया है। जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत यह प्रमाण पत्र अनिवार्य होता है।

न्यायालय ने इस तथ्य का जिक्र किया कि नामांकन पत्र में एक प्रश्न यह भी है कि क्या प्रत्याशी को भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के पद पर रहते हुये भ्रष्टाचार या विश्वासघात के कारण बर्खास्त किया गया है?
न्यायालय ने यह भी पाया कि निर्वाचन अधिकारी ने तेज बहादुर को पिछले साल 30 अप्रैल को दो नोटिस जारी किये थे जिनमें नामांकन पत्र के साथ आवश्यक प्रमाण पत्र संलग्न नहीं होने का जिक्र किया गया था।

पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग से यह प्रमाण पत्र लेकर पिछले साल एक मई को सवेरे 11 बजे तक जमा करने का समय तेज बहादुर को दिया गया था। अनिवार्य प्रमाण पत्र संलग्न नहीं होने के आधार पर निर्वाचन अधिकारी ने उसका नामांकन पत्र रद्द कर दिया था।

न्यायालय ने कहा कि अपील के मेमो में घटनाक्रम का जिक्र है, जिसमें अपीलकर्ता ने यह कहा है कि उसने अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से निर्वाचन आयोग के कार्यालय से यह प्रमाण पत्र प्राप्त करने का प्रयास किया लेकिन इसमें इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया कि क्या यह प्रमाण पत्र हासिल किया गया।’’
न्यायालय ने कहा कि अगर ऐसी स्थिति है तो यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ता के पास नामांकन पत्र दाखिल करने, अगले दिन इसकी जांच की तारीख तक अनिवार्य प्रमाण पत्र नहीं था और न ही चुनाव याचिका दायर करते वक्त यह था।

शीर्ष अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 81 का उल्लेख करते हुये कहा कि इसमें प्रावधान है कि चुनाव याचिका कोई भी मतदाता या ऐसे चुनाव का कोई प्रत्याशी दायर कर सकता है।

इस मामले में वाराणसी संसदीय सीट के लिये चुनाव में अपीलकर्ता (बहादुर) वाराणसी संसदीय क्षेत्र में पंजीकृत मतदाता नहीं है क्योंकि उसने स्वीकार किया है कि वह हरियाणा में भिवानी, महेन्द्रगढ़ संसदीय सीट का पंजीकृत मतदाता है। उसका सारा मामला इस सवाल पर है कि क्या वह प्रत्याशी है और क्या वह उचित तरीके से नामित प्रत्याशी होने का दावा कर सकता है।

न्यायालय ने कहा कि अब सवाल यह है कि क्या अपीलकर्ता (बहादुर) इस चुनाव के लिये उचित तरीके से नामित प्रत्याशी होने का दावा कर सकता है तो इसके जवाब नकारात्मक हैं। न्यायालय ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 33(3) के तहत बर्खास्त अधिकारी के लिये नामांकन पत्र के साथ यह प्रमाण पत्र संलग्न करना अनिवार्य है कि उसे भ्रष्टाचार या विश्वासघात के आरोप में बर्खास्त नहीं किया गया है।

पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति में हमें इस अपील में दम नजर नहीं आता और प्रतिवादी (मोदी) को नोटिस जारी करना जरूरी नहीं समझते। अपील में कोई भी कानूनी सवाल या तथ्य नहीं उठाया गया है और अपील स्वीकार करना न्यायालय के लिये व्यर्थ की कवायद करना होगा।



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PTI News Agency

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