भारत में गाड़ियां राइट-हैंड-ड्राइव क्यों होती हैं? इसके पीछे की वजह जानकर चौंक जाएंगे

punjabkesari.in Wednesday, Feb 04, 2026 - 12:31 PM (IST)

नेशनल डेस्क: जब हम सड़क पर गाड़ी चलाते हैं। तो यह हमें बिल्कुल सामान्य लगता है कि स्टीयरिंग दाईं ओर होता है और वाहन बाईं तरफ चलते हैं। लेकिन दुनिया के कई देशों में इससे बिल्कुल उल्टा सिस्टम अपनाया जाता है। सवाल यह है कि भारत में राइट-हैंड-ड्राइव (RHD) व्यवस्था क्यों है और आज यह भारत के लिए फायदेमंद कैसे साबित हो रही है।

क्या होता है राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम?
राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम में वाहन का स्टीयरिंग दाईं ओर लगाया जाता है और ट्रैफिक सड़क के बाईं तरफ चलता है। दुनिया के करीब 75 देश इस सिस्टम का पालन करते हैं। भारत के अलावा यूनाइटेड किंगडम, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण एशिया के कई देश इसी श्रेणी में आते हैं। अनुमान के मुताबिक, दुनिया की लगभग 30 प्रतिशत आबादी RHD सिस्टम में यात्रा करती है।

भारत में कैसे शुरू हुई यह व्यवस्था?
भारत में राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम की शुरुआत ब्रिटिश शासन के समय हुई। 19वीं सदी में जब भारत में मोटर वाहन आए, तब ब्रिटेन में पहले से ही बाईं ओर चलने की परंपरा मौजूद थी। यह परंपरा पुराने यूरोप से जुड़ी थी, जहां लोग घोड़ों पर चलते समय सुरक्षा के लिहाज से बाईं ओर रहते थे ताकि दायां हाथ हथियार के लिए खाली रहे।

ब्रिटिश दौर में बनी परिवहन की नींव
ब्रिटिश राज के दौरान भारत में सड़कें, ट्रैफिक नियम और वाहन डिजाइन उसी व्यवस्था के अनुसार बनाए गए। धीरे-धीरे यह सिस्टम देश की परिवहन संरचना में पूरी तरह बस गया। आज़ादी से पहले ही लोग इसी व्यवस्था के अभ्यस्त हो चुके थे, इसलिए इसे बदलना आसान नहीं था।

आज़ादी के बाद क्यों नहीं बदला सिस्टम?
1947 के बाद भारत के सामने विकल्प था कि वह अमेरिका और यूरोप की तरह लेफ्ट-हैंड-ड्राइव सिस्टम अपना सकता है। लेकिन सरकार ने मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने का फैसला किया। वजह यह थी कि सड़कें, ट्रैफिक संकेत, ड्राइविंग ट्रेनिंग और वाहन निर्माण सब कुछ पहले से RHD पर आधारित था। पूरे सिस्टम को बदलने का मतलब होता भारी खर्च, नई ट्रेनिंग और शुरुआती दौर में सड़क हादसों का खतरा।

सुरक्षा और सुविधा को दी गई प्राथमिकता
सरकार ने यह माना कि निरंतरता बनाए रखना ज्यादा सुरक्षित और व्यावहारिक है। अगर ड्राइविंग साइड बदली जाती, तो करोड़ों ड्राइवरों को दोबारा प्रशिक्षित करना पड़ता और भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती थी। इसलिए मौजूदा व्यवस्था को ही बेहतर बनाना सही रास्ता माना गया।

भारत को कैसे मिला औद्योगिक फायदा?
समय के साथ यही फैसला भारत के लिए रणनीतिक लाभ में बदल गया। आज भारत राइट-हैंड-ड्राइव वाहनों के बड़े मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों में शामिल है। चूंकि बड़ी संख्या में देश RHD वाहन इस्तेमाल करते हैं, भारत उनके लिए एक अहम उत्पादन और निर्यात हब बन गया है।

एक जैसे स्टैंडर्ड से आसान एक्सपोर्ट
भारत में बनने वाली गाड़ियां यूनाइटेड किंगडम, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और एशिया के कई देशों में निर्यात की जाती हैं। एक ही स्टीयरिंग स्टैंडर्ड होने से डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया सरल रहती है, जिससे समय और लागत दोनों की बचत होती है।

कम लागत, ज्यादा प्रतिस्पर्धा
RHD सिस्टम पर आधारित मजबूत सप्लाई चेन, कुशल वर्कफोर्स और तकनीकी अनुभव के कारण भारतीय वाहन कंपनियां कम लागत में गाड़ियां बना पाती हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की गाड़ियां ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनती हैं।


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Content Editor

Mansa Devi

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