इजराइल में सत्ता बदले तो भी नई सरकार के लिए भारत से रिश्ते मजबूत रखना जरूरी, जानें देश हित में क्यों अहम मोदी-नेतन्याहू की दोस्ती ?

punjabkesari.in Saturday, Oct 31, 2026 - 06:10 PM (IST)

Jerusalem: इजराइल में अगली सरकार चाहे जिस गठबंधन की बने, उसके सामने भारत के साथ मजबूत रिश्तों को कायम रखने की बड़ी जिम्मेदारी होगी। भारत और इजराइल के संबंधों को केवल रक्षा सौदों, व्यापारिक समझौतों या नेताओं की मुलाकातों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। दोनों देशों के बीच भरोसे, ऐतिहासिक जुड़ाव और साझा रणनीतिक हितों की भी अहम भूमिका है। यही वजह है कि इजराइल में अगली सरकार के गठन से पहले भारत के साथ रिश्तों के भविष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है। द टाइम्स ऑफ इजराइल के ब्लॉग में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच व्यक्तिगत दोस्ती ने दोनों देशों के संबंधों को मजबूती और नई पहचान दी है। हालांकि, इस रिश्ते को केवल दो नेताओं की केमिस्ट्री या व्यक्तिगत करीबी के रूप में देखना सही नहीं होगा। लेख के मुताबिक, यह दो ऐसे देशों के बीच भरोसे का रिश्ता है, जिनका इतिहास, सभ्यतागत निरंतरता और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां कई मायनों में एक-दूसरे से मिलती हैं।

 

दोस्ती से आगे है भारत-इजराइल का रिश्ता
लेख में कहा गया है कि भारत और इजराइल दोनों ने कठिन ऐतिहासिक दौर के बाद आधुनिक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई। दोनों देशों को अपने-अपने क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियों और आतंकवाद से निपटना पड़ा है। भारत में कोच्चि, मुंबई और अन्य स्थानों पर यहूदी समुदाय सदियों से भारतीय समाज का हिस्सा रहा है। इसे दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी बताया गया है। रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग इसी भरोसे की बुनियाद पर आगे बढ़ा है। लेख का तर्क है कि दोनों देशों के बीच समझौते इस विश्वास के बाद आए, न कि विश्वास समझौतों की वजह से बना। भारत और इजराइल के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध वर्ष 1992 में स्थापित हुए थे। लेख के अनुसार, मोदी सरकार के आने से पहले भी दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग जारी रहा। हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में इस साझेदारी को अधिक सार्वजनिक पहचान मिली और इसकी गति तेज हुई।

 

भारत के साथ रिश्तों पर सभी दलों की सहमति जरूरी
लेख में इजराइल की अगली सरकार को आगाह किया गया है कि वह भारत के साथ संबंधों को नेतन्याहू की व्यक्तिगत विरासत समझने की गलती न करे। यदि भारत के साथ दोस्ती को किसी एक प्रधानमंत्री से जोड़ दिया गया, तो सत्ता परिवर्तन के साथ यह रिश्ता भी घरेलू राजनीतिक विवादों में उलझ सकता है। इसके बजाय इसे इजराइल के राष्ट्रीय हित का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि सरकार बदलने के बावजूद साझेदारी कायम रहे। लेख में सुझाव दिया गया है कि इजराइल की अगली सरकार को भारत के साथ संबंधों को दलगत राजनीति से ऊपर रखना चाहिए। इसके लिए विपक्षी दलों और गठबंधन के नेताओं को भी भारत से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए। संसदीय प्रतिनिधिमंडलों के आदान-प्रदान, नियमित बैठकों और साझा यात्राओं के जरिए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को इस साझेदारी से जोड़ने की सलाह दी गई है। इसके अलावा भारत से जुड़े मामलों के लिए एक स्थायी व्यवस्था बनाने और रक्षा, व्यापार तथा अनुसंधान के क्षेत्रों में कई वर्षों की योजनाएं तैयार करने की बात कही गई है। इससे भारत को भरोसा मिलेगा कि इजराइल में सरकार बदलने के बाद भी समझौते और सहयोग प्रभावित नहीं होंगे।

 

लेख में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारत और इजराइल के बीच मजबूत संबंधों का मतलब यह नहीं है कि दोनों देश हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एक जैसी राय रखें।भारत के खाड़ी देशों और ईरान के साथ भी महत्वपूर्ण संबंध हैं। उसकी विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। वहीं, इजराइल की अपनी सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में दोनों देशों के विचारों में कभी-कभी अंतर हो सकता है। लेख का कहना है कि मजबूत साझेदारी की पहचान यह नहीं है कि एक देश दूसरे की हर बात का समर्थन करे, बल्कि यह है कि मतभेद होने पर भी बातचीत और भरोसे का रास्ता खुला रहे। लेख में भारत-इजराइल संबंधों को केवल सरकारों और राजधानियों तक सीमित न रखने पर जोर दिया गया है। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, अस्पतालों, तकनीकी कंपनियों, किसानों और सांस्कृतिक संगठनों के बीच सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।

 

छात्रों के आदान-प्रदान, संयुक्त शोध, पर्यटन, साहित्य के अनुवाद और चिकित्सा तथा जलवायु के क्षेत्र में साझा प्रयासों को दीर्घकालिक साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।लेख के अनुसार, भारत और इजराइल की अगली पीढ़ी को यह रिश्ता किसी खास राजनीतिक दौर की देन नहीं, बल्कि दोनों देशों के लिए स्वाभाविक रूप से उपयोगी साझेदारी के रूप में मिलना चाहिए। अंत में लेख का निष्कर्ष है कि मोदी और नेतन्याहू की दोस्ती की असली सफलता इस बात से तय होगी कि दोनों नेताओं के सत्ता से हटने के बाद भी भारत-इजराइल संबंध कितने मजबूत बने रहते हैं। इजराइल की अगली सरकार के सामने चुनौती इस व्यक्तिगत भरोसे को दो देशों और उनके नागरिकों के बीच स्थायी रिश्ते में बदलने की है।

 


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Content Writer

Tanuja

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