न भूकंप आया, न बर्फ की झील फटी... नेपाल बाढ़ की असली वजह सामने आई, भारत को लेकर आई बड़ी खबर

punjabkesari.in Thursday, Aug 27, 2026 - 09:29 PM (IST)

काठमांडू : नेपाल में हाल ही में आई अचानक बाढ़ को लेकर शुरुआती जांच में भूकंप और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) समेत कई तरह की आशंकाएं जताई गई थीं। हालांकि, सैटेलाइट तस्वीरों और भूकंपीय आंकड़ों के विश्लेषण के बाद बाढ़ की संभावित वजह सामने आई है। जांच के मुताबिक, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास स्थित लिरुंग ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर करीब एक किलोमीटर नीचे घाटी में गिरा था। इसके साथ बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा भी नीचे आया, जिसने नदी के प्रवाह को प्रभावित किया और अचानक तेज बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई।

इस घटना ने तेजी से गर्म हो रहे हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और बदलते तापमान के कारण भविष्य में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। इसका असर नेपाल के अलावा भारत के हिमालयी और मैदानी इलाकों तक भी पहुंच सकता है।

भूकंप नहीं, ग्लेशियर टूटने से पैदा हुआ कंपन

बाढ़ के दौरान धरती में कंपन दर्ज किया गया था। इसी वजह से शुरुआत में इसे भूकंप से जोड़कर देखा गया। बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने भूकंपीय रिकॉर्ड की दोबारा जांच की और पाया कि उस क्षेत्र में कोई भूकंप नहीं आया था। USGS के अनुसार, रिकॉर्ड किया गया कंपन ग्लेशियर के टूटने और उसके साथ नीचे की ओर खिसके मलबे की वजह से पैदा हुआ था। यानी भूकंप को बाढ़ की वजह मानने की शुरुआती आशंका सही नहीं निकली।

ग्लेशियर का हिस्सा करीब एक किलोमीटर नीचे गिरा

नेपाल-तिब्बत सीमा के पास लिरुंग ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर घाटी में गिरा। इसके साथ बर्फ, पत्थर और भारी मलबा भी नीचे आया। सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियर से घाटी तक एक नया निशान दिखाई दिया है, जो इस घटना के रास्ते की ओर संकेत करता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लेशियर के भीतर पहुंचने वाला पिघला हुआ पानी बर्फ और जमीन के बीच पकड़ को कमजोर कर सकता है। इससे ग्लेशियर का कोई हिस्सा अचानक खिसककर नीचे गिर सकता है। हालांकि, लिरुंग ग्लेशियर के टूटने की सटीक वजह जानने के लिए अभी और अध्ययन किया जा रहा है।

देखते ही देखते कई गुना चौड़ी हो गई नदी

ग्लेशियर से नीचे आया भारी मलबा नदी तक पहुंचा, जिससे नदी का प्रवाह प्रभावित हुआ और पानी तेजी से नीचे की ओर बढ़ा। बाढ़ की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नदी का दायरा कुछ ही समय में कई गुना बढ़ गया। स्याफ्रुबेसी में नदी किनारे की बस्तियां भारी मलबे की चपेट में आ गईं। बेट्रावती बाजार में नदी की चौड़ाई करीब 90 मीटर से बढ़कर 490 मीटर तक पहुंच गई। वहीं, बिदुर में नदी का दायरा लगभग 100 मीटर से बढ़कर 549 मीटर हो गया। इससे नदी के आसपास बसे इलाकों में भारी तबाही हुई।

क्या फिर आ सकती है ऐसी बाढ़?

इस घटना के बाद वैज्ञानिकों की चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। नेपाल-चीन सीमा के ऊपरी इलाकों में अब भी बड़ी मात्रा में मलबा जमा होने की आशंका है। अगर यह मलबा पानी के रास्ते को रोकता है और बाद में अचानक टूटता है, तो नीचे की ओर एक और तेज बाढ़ आ सकती है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के क्लाइमेट एंड एनवायरनमेंटल रिस्क्स लीड छियांगगॉन्ग झांग ने भी ऐसे संभावित खतरों को लेकर चेतावनी दी है।

तेजी से गर्म हो रहा हिमालय चिंता का कारण

वैज्ञानिक अभी इस घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं मान रहे हैं। हालांकि, बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और ग्लेशियरों के भीतर पानी पहुंचने जैसी परिस्थितियां जोखिम बढ़ा सकती हैं।नेपाल की इस घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि हिमालय में बर्फ, पानी, चट्टान और मौसम एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। पहाड़ों में होने वाली छोटी-सी घटना भी नीचे बसे इलाकों में बड़े पैमाने पर तबाही ला सकती है।


सबसे ज्यादा पढ़े गए

News Editor

Parveen Kumar