संगीत की धुन से दोबारा बोल सकेंगे स्ट्रोक के मरीज, IIT दिल्ली ने विकसित की हिंदी स्पीच थेरेपी
punjabkesari.in Wednesday, Jul 29, 2026 - 01:51 PM (IST)
नई दिल्ली: स्ट्रोक मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। अब उन्हें दोबारा बोलने की क्षमता हासिल करने में मदद मिलेगी। दरअसल, आई.आई.टी. दिल्ली के शोधकर्ताओं ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली और मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (I.H.B.A.S.) के सहयोग से मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी (M.I.T.) का पहला हिंदी संस्करण विकसित किया है।
मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी एक संगीत-आधारित उपचार है, जो स्ट्रोक से उबरने वाले व्यक्तियों को दोबारा बोलने की क्षमता हासिल करने में मदद करता है। यह प्रायोगिक अध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका अफेजियोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। भारत में स्ट्रोक विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है और इससे उबरने वाले अनेक व्यक्तियों को बोलने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। स्ट्रोक आने के बाद कई व्यक्ति धाराप्रवाह बोलने की क्षमता खो देते हैं, जबकि वे भाषा को समझने में सक्षम होते हैं। हैरानी की बात यह है कि वे वर्षों से परिचित गीतों को अब भी आसानी से गा सकते हैं।
मरीजों के जीवन में आएगा बड़ा बदलाव
मरीज की अपनी भाषा की ध्वनियों और संरचना के अनुरूप तैयार की गई यह उपचार पद्धति देशभर के मरीजों और उनके परिवारों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। अन्य तकनीकों के अलावा, मेलोडिक इंटोनेशन थेरेपी पश्चिमी देशों में व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली एक संगीत-आधारित चिकित्सा पद्धति है। इसके अंतर्गत धुन और लय का प्रयोग किया जाता है और इसके माध्यम से मरीजों की पहले जैसी संगीत क्षमता तथा बोलने की क्षमता को धीरे-धीरे फिर से विकसित किया जाता है। यह थेरेपी अंग्रेज़ी और अन्य पश्चिमी भाषाओं में दशकों से उपयोग की जा रही है, लेकिन अब तक इसका कोई मान्य हिंदी संस्करण उपलब्ध नहीं था। इस स्थिति को नॉन-फ्लुएंट अफेजिया (गैर-धाराप्रवाह अफेजिया) कहा जाता है और यह स्ट्रोक के बाद होने वाले सबसे अधिक कष्टदायक प्रभावों में से एक है। इसमें मरीज सतर्क रहते हैं और बातचीत को समझने में सक्षम होते हैं, लेकिन वे शब्दों को बोल नहीं पाते। परिवारों के लिए अपने माता-पिता अथवा जीवनसाथी को किसी का नाम लेने जैसी साधारण बात कहने के लिए संघर्ष करते हुए देखना अत्यंत पीड़ादायक होता है।
धुनों और लयों को भी दोबारा तैयार किया गया
हिंदी करोड़ों लोगों की प्रथम भाषा है। हालांकि, भारत में उपलब्ध अधिकांश अफेजिया थेरेपी सामग्री अंग्रेजी से ली गई है। इसका अर्थ यह है कि थेरेपी में अभ्यास की लय और धुन उस भाषा से मेल नहीं खाती, जो मरीज वास्तव में घर पर बोलते हैं। इससे हर वर्ष स्ट्रोक से उबरने वाले लाखों हिंदी भाषी व्यक्तियों के लिए उपचार में बाधा उत्पन्न होती है। टीम ने थेरेपी का हिंदी में अनुवाद और अनुकूलन करके शुरुआत की, जिसमें केवल शब्दों का अनुवाद ही नहीं किया गया, बल्कि भाषा के अनुरूप धुनों और लयों को भी दोबारा तैयार किया गया। हिंदी के अपने विशिष्ट उच्चारण, तनाव (Stress Pattern) और लय होते हैं, इसलिए अभ्यासों को प्रभावी बनाने के लिए इन्हें ध्यान में रखना आवश्यक था। इसके उपरांत, स्ट्रोक से उबरने वाले छह हिंदी भाषी व्यक्तियों ने थेरेपी लेना आरंभ किया। प्रत्येक मरीज को प्रशिक्षित स्पीच थेरेपिस्ट द्वारा 45 से 60 मिनट के 40 सत्र दिए गए। सभी छह प्रतिभागियों ने पूरा कोर्स सफलतापूर्वक पूरा किया। सभी ने उस स्तर को पार किया जिसे चिकित्सक "क्लिनिकली मीनिंगफुल" (चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण) सुधार कहते हैं, अर्थात ऐसा परिवर्तन जो दैनिक जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इस शोध का नेतृत्व करने वाले शोधकर्ताओं में से एक, प्रो. राहुल गर्ग ने कहा, "मरीज अब लंबे वाक्य बोल पा रहे थे, अधिक सहजता से बात कर पा रहे थे और उन्हें अपने जीवन की गुणवत्ता में सुधार महसूस होने लगा था। इस थेरेपी का उन पर कोई भी नकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं दिया।"
शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि ये शुरुआती परिणाम हैं। आई.आई.टी. दिल्ली के एक अन्य प्रमुख शोधकर्ता प्रो. एन. एम. अनूप कृष्णन ने कहा, "ये परिणाम केवल छह मरीजों पर इस थेरेपी के उपयोग से प्राप्त हुए हैं और इन्हें अंतिम प्रमाण के बजाय एक मज़बूत प्रारंभिक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। टीम डिजिटल उपकरणों पर भी काम कर रही है, जिससे यह थेरेपी विशेषज्ञ अस्पतालों से दूर रहने वाले मरीजों तक भी पहुंच सके।"
